डरवध्वनि

जंखध्वनि

सुमित्रानदन पत

राजकमल प्रकाशन

पटना दित्तो-६

प्रकाशत्र

राजपमठ प्रव्राहन प्रा० खि० हरियांगज हिल्ली

वापाराइट

सुमित्रानटन पत

प्रथम सस्वरण

१९३१

छः

मद्रश

सम्मरन मद्रशात्य

प्रयाग

जआावरच

रिपामा साश्या छिल्टा *

मूल्य १५०० रु०

मित्रवर ई० चेलिशेव को सस्मेह

भूमिका

शखध्वनि के अन्तगत मेरी इधर की नवीन रचनाएँ सगटीत है। इन रचना मे मुग्यत नय जागरण के स्वरा को तथा विश्व जीवन के भीतर उत्य हो रहे नये मनुप्यत्व की रूपरेखाआ की अभिव्यक्ति मितरी है। कुछ रचनाजा मं बतमान यग जीवन वी विसगतिया के प्रति मर मन की प्रतिक्तयाएँ तथा कुछ में मर व्यक्तिगत सुख दुख की अनुगूजा का भी वाणी मिली है।

सह भग्रह मैंने पिन्रयर ई० चेकितेव का समपित जिया है। अपनी पुम्तव सुमिनानदन पत्त--तथा आधुनिक हिन्दी कविता परपरा और नवीनता मे उन्होने मेरे काव्य का जिस आतरिक सहानुभूति के साथ गमीर आालाचनात्मक आययन करने का प्रयत्न क्या है उसके लिए मैं उनके प्रति इसन हूँ। हिन्टी के प्रगतिशील आलांचका की तुलना उनकी दप्टि अधिक व्यापत गमीर तथा सारग्राही पाई जाती है। उहान मारतीय जीवन सघप संदम प्रगतिशीलता को जिस रुप परिमाषित किया है और विटेशी होन पर भी भारतीय जागरण क' आह्वान को जिस प्रवार समझन की चैप्टा वी है वह उनकी अतदप्दि तथा प्रतिभा का परिचायक है। यदि वे मेरी नवीन चेतनामूलक' सास्क्ृतिक रचनाना का--जिह आध्यात्मिक रचनाएँ भी वहा जाता है--यथाचित मूल्याक्न नहीं कर सके तो मैं इस उनकी सीमा कहकर माक्सवाद ही वी सीमा वहूँगा, जिससे उनता भूथाकन एवं विचारात्मक दप्टिकाण अनुप्राणित रहा है, एवं जिस वाता यबरण मे उनव जीवन तथा मन वा निर्माण हुआ है।

भमावसवाद मे चेतना तथा पदाथ जथवा जातर तथा बस्तुगत दप्टिकाणा के सवध बही से एक प्रकार वा उल्झाव पटा हो जाया है जहा से मावस हागर के सिरक बह सते दान का रा बल खडा करना चाहत है। "सस तव था पदियमी भआटवाट--जा हांगल टिखर पर पहुँचा मिलता है--मरे ही परा बरू खथ हो मरा पर भारतीय चेतममूलक देष्टिविदु म--जा पत्म्या यृथ्वा के अनुर॒प सदव ही परा वे बल खडा रहा है--काइ सद्धातिक या व्यावद्यरिपा आपरर उपस्थित नटी हाता। भारत जावन बाघ तथा नतिक सास्पृतित मायताएँ परिस्थितिया के भधान रट कर सलव हा उनसे उपर आत्मदाय की व्यापक दृष्टि अनुप्राणित रही हैं। भारतीय सस्द्ृति जीवन मूय चाह व्यवितिगत हा या सामाजिए मानवांय मूया के आश्िित रह हैं ओर वे मानवाय मूय निरतर आध्यात्मिक आतर मूल्या पर ऋ्ारित रह है।

मूल्य सदी इत जटिट एवं गूइ समस्याआ का सर्ों के आायर पर सुएयाते

रू

ही धष्टा यराया ख्यय है। आगागी बुछ होएया ये भीयर जिश्य जीयन जा हा प्रदण बरगा उसती बयारिए' जुमी ही मूल्य सयधी चैग आझाति या विरक्‍्स्ण गर सगी। दस युग या मूस्योतव-सपं विशंग ये िए भी जार दृष्टिया से निर्णाया हगा। तमी मरी रगगाआ मे सं चानात्मा संघर्ष ये पल पिद्ला था मू याया भा समय हा सरगा। यर गर मु इसटिए टिसना पल रहा है कि मायसवाही दृष्टिराण पर आधारित जाशपा था मरी पिछठ सीन चार दया वा रखायाआ से विशेष संयंघ रटा है। हस सरध मे छारा वी मूमिय़ा मे भी मैं विस्तार से अप विशार प्रस्तुत बर जता हूं।

माउस वाह वेयढ मपुष्य के एविहासिर विशास का ही उस सपूण विरास मानता है और उसम भी उसे एविरालित मोतिर वितास बा जिस पर उसके अनुसार मानवीय सामाजिर एवं सास्ट्तित सघा वी श्रणी निमर रहती है। मरी टप्टि एतिहासित' वियरास जायत मह्त्यपूण एवं इस यंग या प्रमुस सचरण होते पर भी मनुष्य वे समटिंएय तथा राश्िवाचत परिक्रास ही वा द्यातर है। गर्बागीण मानवीय मल्या विरारा के टिए जय प्रकार के उतने का महत्पपूण ऊध्व-”प्टि उच्च मचरण भा आवश्यत्र है।

जिस प्रवार मध्ययगीन भारतीय अध्यात्म जीवन अय स्तरा वी उपेशा बर, आपात्मित' विवास का ही सानय वित्रास वा सर्वोपरि लश्य भानता रहा उसी प्रगार एतिहारिय' भातिकबाट सामूहित्र भौतिय उन्नयन वा ही सानव वित्रास वा चरम ल्ट्ष्य मानता है। भरे ही मौतिव समृद्धि की आवश्यरता इस बचानित' यंग मे विकासामस देशा के टिए ग्रोण नहा समझी जा सदती हो पर है यह एकागी हप्टि ही। मध्ययुगा के चिन्तका एतिहासिव सघरण एवं एतिहासिक वम की उपेक्षा कर विचारा मावा का रद्रियो से आत्मा को देह तथा आध्यात्मिकता को मौतिक्ता से वियुवत कर दिया था वतमान युग मी भातिकता को अध्यात्म से इद्रिय जीवन वा जातर मूल्या तथा दह को आत्मा या पठाथ को चेतना विच्छित करने का प्रयत्म करता है। मूत्यगत हाशनिक दष्टिया की रस एसागिता का समाधान केवल तकवुद्धि के बल पर नही क्या जा सकता वे कार की कसौटी मं वसी जाने पर ही समग्र रूप परली जा सस्ती हैं।

यह निविवाद है कि दच्वानिक उपलधिया के इस युग जन समूह के एतिहासिक विकास तथा एतिहासिक कम का सिद्धात अत्यप्रिक महत्व रुपता है। कयावि इतिहास ही मनुष्य का निर्माता नहीं (हीगछ) जीवित शिक्षित जन-पमाज भी इतिहास का निर्माता है (माक्स)। शिक्षक को शिक्ित तथा शिखित का लिधक बनना होता है। दस दप्टि क्राति का भी इस युग म॑ अपना महत्व है।

बडे दब

किन्तु विश्व सम्यता तथा रित्य जीवन जब जिस माट पर पहुँच रह है उसम मानवीय वियास के लिए लोना ग्रृणात्म+ तथा राशिवाचत वेयक्तिय लथा सामूहिक हप्टिया वी भिठत अनिवाय प्रतान हांतो है जा दप्टिया अभी अध सत्य ही वा बाना पहने हुई है भारतीय जतर॒प्टि अथवा जापनिषदिर दप्टि हीगट के भाट्यवाल्-जा पाश्चात्य दाशनिक चिता वा चिसर है और जा *तिहास वी भी एक प्रकार उपेशा नही करता --तथा माक्स के भौतिक्वाद एवं इतिहास सयधी टप्टिकोण-- दाना को ही अतिकम कर मनप्यत्व का पूणता एवं मनुष्य समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सवाधि के उच्चतर अतरिक्षा के सूध्मतम एश्वयों वी आर भी ध्यान आर्कापत वरती है जहाँ किमी प्रजार वो एशणिता के एिए स्थान नही रहता आर जा सपूण मानव जीवन के विकास वा झृश्य है। जाज वी टाब्टावली भ, मनुष्य अतन पूजीवाटी व्यवित वी दवाई है ऐतिहासिक भातिक्वारी समूह वी वकाई वह उस पूण चैतय की "फ्राइ है व्यक्ति आर समाज तथा उन दोना का विकास जिसके अविल्छित अग हू। मनप्य-जीवय सवधी ऐसे सर्वागीण तात्विवः सत्या को वूर्जवा विचारा के साथ प्रतित्रियावादी चूडे वी टाकरी डालने का प्रयत्न वर हम उनके प्रति बवर अपन अचान हा वा प्रदान करत हैं। मुसे पश्चिम के उत जाथुनिक्तम दाशनियां वा जिन्तन-दटान भी जघरा प्रतीत हाता है जिन्हात ऐतिहासिर कम की महत्ता को भुला लिया है और जितम पाजाटिविस्टस स्टकच्युरलिस्टस रिवीजनिस्टस दकजिस्टनशियल्स्टिस आदि रूडार्फ स्टमटर से प्रत्यल अप्रत्यश् रूप प्रमावित, सभी प्रकार के भध्यवर्गीय विचारक तथा बौद्धिक सम्मिरित ह। एतिहासिक विवास कम अत्यत आवश्यक है पर ऐतिहासिक सचरण ही वा मानय शिकास के समग्र सय का दपण नहीं माना जा सकता वह कवट मानव विक्रम के रिए सामूहिक पीठिया भर भ्रस्तुत करता है। भारतीय चतय सबधी दप्टिकाण जमी जउता ही है वह अमा पश्चिमी सम्यता «था वनानिक' युग की फसौटी नही कसा जा सका है। अभी तो होगल के आदेश बाद तथा मावस-एगिल्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का ही युग जीवन तथा विचार जगत म॒ सघप चल रहा है। अब ससार के देश जब परस्पर निकट आन एवं एक पूण सयाजित बिन्व॒ जीवन तथा मानव सस्क्ृति वा निर्माण करन वा प्रयत्न कर रह हैं और भौति+वाद अपनी अति स्पधा वारण ध्वसात्मक तथा अतियात्रिक्ता व. धारण सहज मानवांय विश्राम का वाघर बनता जा रहा है, भारतीय चततय सयधां मागलिक दप्टि निएढ भविष्य मे ब_जन टहिताय बहुजन सुखाय, विश्व जीवन भू» «

# कैंके

अवतरित हाकर उपस्ता आयाय एवं अमिन्न अग बन राजंगी। जाज वे सथयर वि*व विना' ध्वसास्त्र इसा समावना थी जार इगित बरत हैं। संत्य अहिसा के प्रतीय माया का उत्य भी जा भविष्य मे वि्य जीयन स्तर पर सायकता आप्ल कर सकेगा--दसी की सपुष्टि बरता है।

मित्रवर चरिजेत वा मरा रचनाआ मे अमित्यात आठ आर ययाथ वा समवय अममव प्रतीत होता है। पर मैं दसता हूँ वि आज के महान सत्राति युग विश्व जीवन घीर घीरे सा महत सयाजन वी आर अग्रसर हा रहा है आग्रामी दशवा मे यह प्रवृत्ति जौर भी स्पप्ट हा जाएगी। वस मारतीय दप्टि

यह समावय वाई नयी वस्तु नहीं है। समी महान विचारर आर कवि विभिन्न

युगा मे इस प्रकार सास्शृतिय समन्वय की आर प्ररित हुए है। तुटसा और बवीर यग भी दसी उतठाहरण है। आदश और यथाथ एक हा सत्य के दा पथ एक हू मुद्रा दा मुख है। जिस प्रयार कली स्वमावत फू मे विकसित हाती है उसी प्रकार यथाथ वा जाट मे परिणत हांना हाता है। जा सवध एक प्रवुद्ध सतुलिति समाज वतमान वा भत्िष्य से होता है यही यधाथ वा जादथ से भी है। ऐतिहासिक यथाथ वा सचरण मी जा जीवित दीक्षित व्यक्तियां द्वारा सचा ल्ति हांता है. लश्यामुख अथवा आदर्गोंमुस ही होता है।

फिर भी डा० चेटियाव वी पुस्ता' से सब मिलाकर मेरी रचनाआ को सम झने पाठका का अधिक सहायता मिलेगी। हमारे प्रगतिशीठ आलोचको को मेरी रचनाओं का समस्त भावट”न जो क्वल प्रतित्रियात्मक ही लिखाई देता है उसका बहुत बडा भाग मि० चेलिशेय का मारतीय जीवन सघप के सदम प्रगति शील प्रतीत होता है। मरा माव टन मावसवाट का खडन कर उसकी पूति करता है और मर॑ काव्य उस पूर्ति का रूप मरी चेतनात्मक रचनाआ म॑ मिलता है। इन रचनाआ क॑ सबघ म॑ चेलिलाव क॑ दप्टिकाण की दुहाई देकर हिठी के कुछ प्रगतिशील तांता पडता ने उनके प्रतिक्रियात्मक हांन की दुदुमी नए सिर से पाठना शुरू कर दी है। तमासिक जालाचता क्‌ १३वें अक मे लेनिन जम शती का एक आलाचनात्मक उपहार शीषक ल्ख इसका एक उदाहरण हूं।

यद्यपि प्रस्तुत सग्रह की रचनाआ का चलिशव की पुस्तक से काई साधा सवध नही है फिर भी उनके दप्टिकोण के सवध अपन विचार प्रकट कर उतकी व्यापक सवल्नापूण दष्टि दिए उह घयवात लेना म॑ अपना क्तय समझता हु।

१८। बी वे जीमाग इलाहावाट _समित्रानदन पत र५ १२ ७० हर

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बह अनगट पापाण १९७१

दवायान

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अति यात्रिक्ता सप्टि तत्य

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हनमत्‌

पवित्रता

कला का सायकता दीप्त भावना झिदु और जगत्‌ उहापाह

भूख

छुम क्षण

शखनाद

ब्घूप वा टवडा

मारत

पूण क्षण

कवि धम सत्रमण

युग रमणी वस्तु बोप विकास क्रम जाटी का घाडा अमीप्सा अनुपमा

स्तुति प्रति पावन अवाधता थथाय और आद”शण मरा जग

मुखर

सक्त

धरम

मन का साथा

५२ ५३ पड $ ५६ ५८ ५९ ६० ६१ 234 ६३ दि ६५ ६६

युग गाया जावन मुत्त मध्य स्थिति फूठ फट अतजग

मृत्यु

यत्र नगर चिडिया की समा भाव सिद्धि पत्थर मे फ> समाधान प्रपडियाँ

एक सत भात्म घुरी जतर्यात्रा आत्म परिचय आत्म दप विद्युत युग स्त्री

जपित जीवन जीयने उत्लास सजन दायित्व भविष्यवाणा मधु पसडिया सूय बाघ सु»म बाघ जयनाद

नमन आकाता प्रतीत कश्मीर

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साल्य स्पण संयुक्त भात्म माह मरी वीणा सुपण

मव चतन भात्म कथा जायउन बाघ हस ध्वनि क्राति युग भारत भू राजू

सक्ट मनोमाव प्यार सतुरन “यम्ित चतना साथकता निर्षोष पुरस्कार मायाजाल पूण बाघ अतप्ति

पूण समपण अविच्दिन्न कत्तव्य मनोव्यथा प्रतिक्रिया वियतनाम लेनिन प्रति

१३२ १३४ १३६ १३९ श्ड१ १४५ १८५ १४७ १४९ १५१ १५३ १५५ १५९ १६० १६१ १६२ १६४ १६५ १६७ १६९ १७० र७१ १७२ १७३ (७४ १७९ १७६ (७८ १८३ श्टर३

वह अनगढ पापाण संड था--

मने. तपकर, सॉँटकर, भीतर कही मिमट कर,

उसका रूप निखारा,

तद्तू. भाव उतारा, शशिमुस॒ का सौदय सँयारा। छोग उसे

निज मस वतलाते, देस देख कर नहीं अथधाते,--

वह तो प्रेम , तुम्हारा श्रीमुस तमय अतर को देता सुख ]

शसध्वति

१९७१

सूथ मुठ थीसवी टाती के वन दिग्‌ भास्वर जाओ हें नये वपष, अवतरण प्रो घरा पर सोलो परिक्सित राष्ट्रा बे जडता वें बघा, मनृध्यत्य में जो जन भू पर सव से निधन दानवीय ध्वसास्त्रो का वर जो नित सचय वैचानिक कौझल का बरते घोर अपत्यया

तोडो बदु शसला देय जजर भृजन वी, सुलभ मे जिनको सुविधा अन्न वसन जागन की प्राप्त नही शिक्षा सस्क्ृति वो साधन विक्सित-- क्षुधित अविकमित देश्व तुम्हारे प्रति आशावित!

सजन शख फूक्ो हे, अतस्वर से मुखरित, नव जीवन उमेपा से जन-मन हो प्रेरित शात घरा देशों वो हा स्पघा-सघपण, राग-देप वो भरें हृदय वो रवत खवित ब्रणां

बाल दूत, वितान ज्ञान में भरो सवुल्भ, नग्री चेतना का प्रतीक हो जन ग्रागणां

१०

रे शखध्वनि

देवोत्थान

जवबभती से हम मानव में दानव को करते आए अभिषेक्तिता

गहन मनोवज्ञानिक स्तर पर पश्॒ प्रवत्तिया को जन जन वे जीवन मन मं करते थाए. स्थापित! जगले कइ दराब सभयत बीतेंगे अब देवा से फिर मानव अतर को करने में मडित-- सानवीय जीपन को भावी प्रा स्वग में करने पृण्०. प्रतिप्ठित!

कितना काय अभी करना ह-- सोच सोच पर विस्मय से अभिभत वभी हो उठता अतरा सुदर बाह्य ॒प्रद्ृति जग,-- इससे भी सदरतर मानव का अतजग-- सत्म विभय से भास्वरा

शखध्वनि श्र

अतर्मुख हो हमें सोजना आत्मिक वैभव-- उसे अवतरित करना भू जीवन में अभिनयां

डर में अतहित शोभा के भुवन अग्रोचर इद्रलोक की सपद्‌ भी जिन पर न्योछावर!

इद्रचाप पुल पर चलती अप्सरा मनोहर

सजन चेतना नभ में स्वप्लिल नृपुर ध्वनि वर!

मूक अचेतनवन उपचेतन लोका के गह्दर जाग गद्य तद्गा से मत में भरते ममर्रा

देवो का हो स्वय महत--

पर जन धरणी पर रचना हमको. मानवीय

नव स्वग मतत्तर--

मन के पशु को,

दानव को कर झन उनमित-- आओ, भूजन,

करें विध्व जीवन नव निर्मितां

(३ शखध्वनि

सक्राति

पीरे पत्तो में सरुपेट दी तुमने पाडुर विश्व प्रकृति की देह--घूल से सेजो क्षितिज मुख! मुक्त दिगवर अतरिक्ष दिखता चिन्तन रत, सुदर लगता मौन दृष्य सहार सृजन वां

यह शिव का हो महा श्मशान---शू य, भस्मावृत , जहा जगत-जीवन लेता नव जम निरतर-- वरद अप्टमुस तत्वों वी पावन छाया में! गर्भित विश्व प्रकृति---भावी की स्वणिम कोपलछ जाग रही स्वप्निल' तद्गा से, युग चेतन हो!

मानव के अतजग में भी गृूढ अगोचर महा त्राति अब मची हुइ--चेतना विटप में नग्न ह्ास विधटन का पतचर छाया दारुणां अब बुध में देंस पाती सन वी आँखें-- अधवार ही भाव मूल्य वनता जाता जवां

मृत्यु जास सक्य-हिम जजर, आस्था विरहित देख पाते छोग ओट में दिगू विनात वी नया मनुज छे रहा जम अब नये प्िश्व में!

शखध्वनि

चाँद

मुर्ये नहीं अच्छा लगता कि चाद में जावबर चंद्र पटाट का खाद, ब्रूर भू मानव सोचे शरक्नि का चादी के देषण सा हँसमुस आवत >> घायल वर उसका कोमल उर लाह नसां से

जाज पृूणिमा का, सरोज सा फुत्ल सुधाकर क्तिना सुदर रूगता राजहमस सा तिरता रजत नीर सलिला में--्वप्ना के सुरधत पर खोले स्वणिम अतरिक्ष वी दरद विभा में सभव , दूरी के कारण ही, उसके विक्षत

यौर अग में लगी खराब नहीं दिखती हो

वह स्वरगिक सौदय कल सा, उसी भाव से स्नेह सुधा रस वृष्टि +र रहा भू-जचल में,-- भूल रक्‍तगप्रिय बबर नर वो उत्पावा कॉ+ जा धरती का दय दुस वा नरवा बना अब चद्र लागा में नीड बसाने का साहस कर स्पर्धा का अभियान वहाँ ले जाता ग्रतितां

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श्ष्‌ शखध्वनि

अति यात्रकता

निमल अब जाराश घरा दि ज्योति स्नात सी सुदर ट्गती! बीत गए झड झया के दिनां निखर उठी अब सूप्टि सद्य जमे नव विशु सी! चशात समीरण--श्वास रोक एकाग्र समाथित! पत्र अक्पित, नम्न क्षितिज, हरिताभ घुले तरू--- ऐसा उज्वल स्पश विश्व का मिला पहिले। सभव, आधी पानी दुर्दिन से पीडित जग ऐसी सौम्य पवित्र मने स्थिति अनुभव करता!

वतमान झड अधघड तूफानो का युग भी रौद रहा अब मनुज जगत्‌ को--अपनी यात्रिक छौह भयकरता मे--ध्वसात्मक ठापा से जट्टहास फरता ककाठ खडा यत्रा का परिवर्तित हो रही पीठिकझा--भू जीवन वी--- उद्देलित चेतना --चतुर्दिवु उथर पुथल सी मचती जाती,--जड यात्रिक्ता का आडबर बढ़ता जाता! सिमट रहा जन जगत्‌ विवश्ञ हो , सर्पो वी ऐंठो प्स्मी सा! देश विपले पाशा में क्‍सते जाते हें, भौतिकता के जद बिद्युत्‌ दगा से प्रेरित | --क्हा आज जग, क्धिर मनुजता, क्या ध्रुव लूदय | -न समझ पा रहा मनुज बुद्धि हत। दानव-से सगणव यत्र ही सचारिति कर पाएँगे सभय भविष्य में मनुज नियति वो जग जोप्नन को | स्वय मनज वन रहा यत्र प्राविधिक तन कौदछ में दीक्षित!

या सभ् गैर आत्म-ोध सः भमिफ्ररित ह। अब घुछ् के उप्र यक्र युग को बे विचरण गए क्षित्तिजा की निमल्ता में

यात्रिक्त्ता घूमा मे 5 मुक्त विश्व में

मनुप्यत्य को को ऊपर स्थापित करत

और तड़ित अपु के अस्चा वी रकम सीचकर सोजे अतमुंर जीवन-पीदय धाति सपा

शखध्वति

कितु, एक अज्ञेय सत्य जो व्याप्त चतुदिक्‌ मिलता मुझे निसग जगत्‌ में,--अभिव्यकत सभवत नही हुआ मनुष्य में! वह हैं भूमा का विराट सौदय अनामय जो पावक स्पर्सो से छकर मनुज प्रहृति को तीथ स्नात, तमय, अत द्धित कर देता--निज असीमता की पवित्रता में सद्यस्मित ( वही शुश्र सौदय मुझे क्श्ता आकपषित,--मौन समाधित! सभव, इस सामूहिक सस्कारो वे युग में उस विरादता से वचित रहे मानव जगा

चेजप्पाय

कला की सार्थकता

गंड्टस युग अब वियमान साहित्य, का सें,-- अभिवादा यरता मा! सयेदगा बह रही उपेक्षिता, दल्ति। विदृता ये प्रति--अस्रय जा वबाछतीय यह सभी भाँति--भू जी वुरूपता मिटे, हटे दारिय, छोंटें दुर्नि वो बादल! पकट्स प्रमुख प्रतीक आज विकलांग जगत वाया

देख सो सौदय अखुदरता मे भी सन वयावि असुदरता केवल सकीण दप्दि मर बैव्टस हो क्दम--सव उछ ही सुदर जग में विकसित हो भू मन, व्यापवा सौदयन्योध हो, कलम दृष्टि नव रूप करे निर्माण विश्व का-- सभी समान,--वहे जग में विषमता का विर्षा

पर, गुलाव का मूल्य इससे कम हो सकता -- गुण विश्विप्टला सदा समादृव होगी जग में! सौपुमाय, सौदय, सुरुचि, सस्वार सद्ष्मतम जम विकास के शाइवत श्रेष्ठ प्रतीक रहेंगे जगत चक्र में। साधारणता की झोभा में अवगराहन बर--मूल्य समन्ष पाएगा. हृदय अधिवः सत्तम का,--जो विवास का लक्ष्य निरतर!

रष

शखध्वनि

अत बेंबटसो वी वहमत नी जनन्थुग भू पर आभिजात्य गरिमा, अतशोभा के कारण, गौरव मिलता सदा रहेगा गण विशिष्टता को-- विभूति जो!

गृण वरिप्टूय अल्पमत होनें पर भी विजयी होगा सतत,--सजन क्रछा क्री साथकता जो!

शसध्यनि २६

दीप्त माबना

आज भावना वद्धि-किरण से आलोक्ति हो परिणत होती नयी चेतना में जीवन की,-- जीव प्रकृति वी छूघु सीमाआ यो अतित्रम कर!

प्राणभावना, गत जीवन वी रुचियो, सस्वारा से प्रेरित, भले सहन अभिभूत हृदय करती हो जन का, बड़ा मुकुर में अतिरजित हो--और लोवप्रिय भी प्रतीता हो,--मनृप्यव्व वा परिप्कार वर नये सनुज को जम नहीं दे सकती वह व्यक्तिगत जह॒ता, रागद्वेप, सुसदुख, मानसिक जीव प्रत्रिया अभिव्यक्त भर करती वह जो ग्रौण सत्य हु विरह मिलन सबेग, प्राइतिक प्रवृत्तिया ही मुखरित होती उससमें,--बासी भाव मूत्य जो!

बुद्धिस्पश से ही चिहद्दीपित राग भावना नयी पीठिका प्रस्तुत कर सकती जीवन की -- भू विकास के लिए परम अनिवाय चरण जो -- आज विक्व मन को होना सवाग समावित

लक लए

२७ शखध्वनि

डिद्ु और जगत्‌

लिशु समान छगते हा,--कितु पृथरू स्वभाव ले पैदा होते वे | ---अयोघ, हा, भेठें सभी हा! निज रुचि-गुण अनुरूप स्पण पा वाह्य जगत्‌ का विविध रूप से मूत्याक्न करते वें उसका-- मित्र धारणा बना विश्व के प्रति अनुभव से!

सघपण बरते अविरत वे जग जीवन सें-- उसे बदलना कठिन जानकर स्वय बदलते, निज स्पभाय रुचि का भी मूत्य समझ इस नम में। इडने छोडनी पड़ती उनको वे सव स्थितिया वहिरतर वी--जो दुगम पथ वाघा बनती -- जिह्ठें हटाना सभव नही व्यक्ति के वर पर

स्वग दया भी नहीं सहायक होती! उसको बाह्य भोग से आत्म योग समधिक अयस्कर कही छिपा साक्षी अतर में उनको चुप आत्म अनात्म, असत सत वी. पहचान यताता,--- सत्म बोध दे व्यक्ति विश्व वे सेंग दइपर का!

शोप सपदा जनुभय पक्‍व वृद्ध शि्व उर में रह जाती जो,--पह असग चेतय सत्य वी, जो उसवा चिर साथी रहता अतिम क्षण तका

धराष्यति २८

ऊहापोह

ऐसी भी होती मन की स्थिति कभी विसी दिन जव वि विरोधी दृष्टिगोण दो उभर चित्त में गूढ समस्या वन, करते आतात बुद्धि को! मंगल झनि हो खडे सामने नूर परस्पर !

ऐसे दुक्षण में सम्यकः क्‍तव्य समझना सहज नही होता! दुबिधा में पड जाता मन बडा कठिन होता अपना विद्लेषण करना यह स्वभाव वी सीमा होती और शक्ति भी, जब कि गहन मथन करता मन--भू जीवन वे दरद्घों में उल्मा--अ्रकाश पाने को नूतन

समाधान मिलता सदा ही आत्म-तुप्टिकर सुधी गतागत पर सोच करते-नगीता वी सूक्ति सात्वना देने में जब सफल नम होती-- तुम पर देता छोड समस्या का निदान मा

मौन प्रतीक्षा करता हृदय प्रपन बोध की, चित्त शात हो स्वय प्रश्न का बनता उत्तर!

डे शखध्वनि

मूख

मुखस्खा गेहें को बारी ह्प हरित - रामाचित |

घरती से रज देह सीच कर सूय क्रिण से दाक्ति खीच कर होती वधित, रस पोपित

एक वात बतठा दू गोपन-- पृथ्वी सूय-प्रभा से भले ग्रहण करती मे पोपण,--

अपने ही अस्तित्व बोध से मे उमपित,

अपने ही भीतर से रहती सहज उत्लसित

घुटनों घुटना पहुँच मनुज के जय अत्हृड युवती सी करती ताक झाक मे वाहर-- मुंय्े सुनाई पडता--दुस्‍्तर उदर उदर हा उदर!

सोच मग्न, विस्मितन सी होकर वहती मे भन हो मन--इह्पर!

यह मे कसा करती अनुभव जीव घारिया का क्रिट जो मानव

शसध्यति औ०

जिसने रत समाज, सम्यता, सम्दति+-- महते विय इतिहास लिप साहित्य पा जिमगी डूनि,८ घम नान पितान मनुज गौरयत उद्घापन, अतरिद्ष अभियान साहमसिवता का द्यातव --

क्ुद्र पेट वो बल वह बृप्ति सा रेंग धरा पर प्रणत गिडग्रिडाता घिधियाता नंगा पेंट दिसा करा

तप्त विश्व के सभी चराचर सदियों से बेवल भूखा नर!

हम मानव वो सवधन हित करती अपना जीवन अपित-- शस्य श्यामला घरा उबर उपजाती नित अन जपरिमितां

फिर भी पेट नही भरता मानव वा. भूसा-- प्ु॒ पक्षी रहते प्रसय खा मसा सूसा)

साद्य पदाथ जगत में अगणित भूख नहीं मिटती सानव वी किंचित !

३१ शखध्यनि

बुछ रहस्य होगा ही इसका ग्रोपन-- साथ समस्या पर में तब से करती आइ चिन्तन!

मुयको. छगता-- मात्र पेट वी भूस नहीं यह निश्चय, उसको मनुज तृप्त कर मक्‍ता उपजा भू से जमित अन भडारा में कर सचय।!

चिर अतृप्त पर पेट स्पाथ का वह कभी भर सकता, अति भोगी रे उददर लोभ का जो अघाते थक्‍ता! दोना क्षुपधा अचेतन मत की, क्या कर सकती घरती, जीवन बी तप्णा अथाह वह नहीं कसी से भरती! दानवीय उर देय त्रिभुवत की लक्ष्मी हर सकती, नाखीय तम गत अमरो की सपद्‌ तर सकती!

भू मंगल वे हित तन मन--दोनो हो को खेती जावश्यक , जन उगाएँ-- साथ निराएँ मन से तृप्णा बे सर कक!

शखध्वनि रे

वितरित हो जन में श्रम फ्ल घरती वी मिटे.. पिपमता,

विकसित हो आत्मिक._ बल,-- सित सयम से आती समता!

मे मुख्या सोने की बाली प्राण हरित, रोमाचित-- क्ह्ती-- निज. जीवन वर अपित--+ बहिरतर सपनमनुज हो जात्म बोध से प्रेरित!

३३३ शखध्वनि

शुभ क्षण

घायल सत्र जग, घायल जब भय से जन वा मन, छाए है. दासण विनाश के दानव दिग्‌ घन! क्या तोरपें तलवारें व्यर्थ बरेंगी लडकर? सुल्ग रही विद्रोह वह्लि अब भीतर बाहर!

अधवकार-घन उगल रहे उग सूरज वे कर

बदल गई युग दप्टि---मूल्य भी गए सब विसर | उदय हो रही अभिनव सवेदना हृदय में-- मिलता सूक्ष्म प्रकाश नथा उसके आशय में

शस्तरा का बल स्वय पराजित--जानें निश्चय , सभव भले विनाश, उनसे सभव दिगूजय ! जम ले रही नयी शक्ति ज्योतित कर अतर, मानवीय जो, नम्न,--सूद्ष्म प्रज्ञा की सित वर!

अहकार से मुक्त, दप दशन से विरहित, मनुष्यत्व॒ ये शाश्वत मृत्यों से संयोजित ,-- सहज वोध से समय रही वह जन जन का मन, आलिगन में वाघ समग्र धरा का जीवन!

सोल अंधेरे में प्रकाश का नव बातायन मनुज नियति का देती बह साथकता नूतन घायल जग, घायछ आशका से जन का मन, नव श्रभात के सूर्योदय का भी यह शुभ क्षण!

शख६ वनि

प्से उछ ताडना-.. राघ वर जीण विद्प मन मे भरना जलब आस्था कायौयन __ नये मूय के प्रति

सद्धापित कर जन अवरत

रे५

यश्षध्वनि हे नहीं बह, अतध्वनि, पनरित भू - अवर! उल्ते अर्था को अन्त स्तर पर नियृढ सतह वह प्रत्तीक भर... नाद मत नि झत्द दिग्तर! जा5फर ही श्स विश्व सागर से निसत, यपत ध्वनि बरणों 7 जीवन मुततरित,..

उसे प्यार रज से लेटा चुपक! वह उड कर किरणा के रोमिल पत्र खोल' तरु प्र चढ़ ओझल हो सकता फिर अमित नीर- में छोग समझते मे उसको व्यक्तित्व दे रहा क्छा स्पन्न सेत मुझको लगता

वही कला को देता निज व्यक्तित्व स्वय व्यक्तित्ववान्‌ ज्योतिमय जो!

प्ूरण में ल्पिट श्री बुभ्न घूष का दुक्डा उह रे स्वयप्रकान्च अखेड प्रकाश्नवान्‌

र्रे७ शखध्वनि

भारत मू डैग युग की आस्था की डमंगा रही अब, सा घीरण भी जन खोने अपना जत-नवस्थ्रष्ट्र निम सम्मुख मानप्रीय आदश्षवाद मप्र सपता !

ओधे मुह बिर पश्चिम के गगमग प्रभाव में

अब अनुक्रण करते नव शिक्षित पग पग पर,

भूछ गई भू अपना अतर-आलोक्ति गुख, प्रतिदिन

जीवन स्थितिया होती जाती

शराम्यनि झ्८

पूर्ण क्षण

एया मीन एघु ओस,-हेंसी यो, आँसू को वी, पॉप रहा पत्ते में मस्तट में गिर थरथर उसे देखा रहा एपटर मे जाने वा भाष सिंधु सा मिद्य मूर्त उसमें उर जीसर

छोटा मा बह एप क्रिण से स्मित-गुर दीपित, एवं मूबा क्षण, एए सत्ययण उसमें जीवित छोड पत्र-यरतर पिर मौन, वियार मस्त सी वह सो गया गगन में बायर वाष्प जलशित

बह सो गया? नहीं,--प्रिदयास होता मंतर की बह अनत वा यात्री, बह तण कण परसहचर। आता जाता रहता वह उड यभी ध्योम में यभी उतर भूपर फिर हँसता रोता क्षण भर

भूत अमूत सहज होता वह भाव उत्टप्तित, सृजन वा का गूृढ़ रहस्य विद" सा गोपन “० उस पर श्री सौदय समस्त सूप्टि का बेद्धित, बह हिमालय से छोटा--वह क्षुद्र तुट्टिंत कण

हूघु हिम कण या गीत-पक्ति रचना कमी सभव

यदि आत्म तमयता में हो का निछावर ? कहा स्रोजते शाश्वत मे, अव्यय, अनित में-- एवं ओस कण, एवं पूण क्षण में भी रावर

३९ शखध्वनि

कविधर्म

सच कहना ही जग में कवि का घम हैं, उसमे नहीं कोई माने या पहचाने , बाहर का जन-घोष नहीं कवि वी वाणी, भीतर स्वर जगने पर वह लगता गाने!

वह यथाथ वे माप तोछ की तुला नही,-- भाव वदलता रहता जिसका दिन प्रतिदिन, मानव आत्मा वी गरिमा का ज्ञान उसे जिसमे साथक होते जीवन के पल छिन।

शब्द नहीं हू जहा, भाव भी मूक जहाँ, वह अवाक्‌ नीरवता को देता वाणी,+- सोइ रहती जग के कोलाहछ में जो निराकार वी प्रतिमा गढता कत्याणी।!

आदोल्ति जन सागर जव भरता मगजन ध्यान मोन सुनता युग परिवतन के स्वर, सौम्य चद्र सा सूक्ष्म ज्योति बरमाता वह जन धरणी वो नय्र जीवन ज्वारों से भर!

मिखिल विपमताएँ स्वर-लय में बँघ जाती बनता युग-समगीत जगत्‌ का सघपण, क्टु_ यथाथ ढल नए विश्व आदतों में संगट घन यन वर्साता नव भाय-सुमनां

डर झखध्वनि

सक्रमण

विस्तृत लगती रुद्ध दिया, आइचय चकिति सा अपर, सदियों का दारिद्यय देत्य अय जगता अँगडाइ भरा

करवट लेता जन भ-जीवन,

मन सिवु आदोल्ति, अधकार की गुहा घरा की

अब घीरें. आरोक्ति

प्राणा में रस ज्यार, चेतना में प्रभात का स्पदन नयी एकता में बँधने को मानव का खडित सन!

नव सौदर्यों मेप

मनोनयनां को रसता विस्मित, निख्वर रहा मानव का मुख

नव॒ गरिमा रेखा महडिता खोल दिए उपचेतन

निशचेतन ने गोपन गह्ृर रुकी हु३ई थी विश्व प्रद्ृति

क्य. हो उसका म्पातरा

घसध्वनि धर अनगढ़ पाषाणा रस मणि रा को छाट सेंजोपर नव भूत्या पे वैभव से गढना मानव का अतरो यह महान सत्राति काल सुनता फिर डमरू स्पन, परिवतन सेलता फाग; युग बरता ताडइव नतन।

खडे सामने जम मृत्यु,

विप अमत, भीम औ” सुदर, विजय पराजय, ह्ाास प्रगति वा

रूपक |. दृश्य भयवारं

जीवन सघपण को देती

नयी शा. लोकोत्तर सृजन चेतना के सुनता मं

दिड मादन वशी स्पा!

८३ शखध्वनि

युग रभणी

आज सभी केतो में स्त्री नेतत्व ग्रहण कर आगे बढती--लाघ देहरी घर आगन वी -- डाक्टर, इजीनियर, प्रश्ासक, प्राध्यापक वह पुस्पष वग से होड रही युग-जीवन वी

पर्वतरोही, सनिक, कुशल यान चालनाः यह, युग प्रबुद्ध, शिक्षित, समाज निर्माता नारी, वह स्वतन, नर की समयक्षी, नेता, मत्री, अवरा अब सपा पहलाने की जधियारी!

पुरुषा के गुण आत्मसात करती वह प्रतिदिन, यन्र सम्यता वी भी मांग यही निमयप्र, क्ल्तु कहा वह सुघर शील सुपमा की प्रतिमा जतसवेनन गरिमा उर में भरती तयस्मप्र

फूट चाद, पिक मृग, चलोमि झप-निखि/ प्रद्नतरि # श्री शोभा उपकरण प्रणत थे जिसे स्म्मन्‍:

वहा अनियचनीय नील सा उर खिसना

उम्बना,

मर्यादा का मधुर मुक्ुर स्मित छात्र मान रू

निसिर सम्यता बनी प्रसाथन युय न्‍#+ >5 पर जन सौदय खथ्रों गया-प्रमद >मकह भोग तत्प वह मात्र--त श्रद्धा क्र >> 22 हृदय-सत्य हा साय-सम्मान्ण- साउना

शखध्वनि

बस्लु बोध

जय बहरे सूदम डञ्ह

क्र काव्य यौन

जास,

वस्तु जगत चाहिए सभ्य नर को अब, भाव गीत से ऊय गया उसका मन

रवीद्र संगीत भाता उर को हृदयो को हिलाता गायन, कक्‍्ट्पना की उड़ान पर हसते, स्थूछ भगुर वे प्रति आक्पणा

तुच्छ कुत्सित ययाथ को सेवक, अब सौदय बोध का दपण, गध प्रति जध प्राण मन प्रेरित अनास्था, संशय वे उर में ब्रण।

परिवतन युग गुह्म अचेतन से जग घणित विक्षृतिया उमड रही मन में उन, विधटित मूया के ह्ासोमुख युग मे स्पधा वृुत्सा का उर में चत्ता रण

भाव भूमि नव उदय हृदय में होकर जनर में सतुल्न भरेगी नूतन, नये सत्य का ज्योति स्पश पा जन मन मनुप्यत्व वो प्रति होगा नेत्र चेतल

वस्तु जगन की सीमाएँ अतिक्म कर भाव योपथ नये भरता उर में स्पदन।

शसब्वनि

विकास क्रम

मानवीय सवेदन शूय घरा जीवन जव+- निखिर यत्र सम्यता, विव्व वी अतुल संपदा पूति नहीं कर सकती इस दारुण अभाव वी!

एक ओर भू के असस्य जन गण का जीवन विगत युगा की रुढ़ि रीतिया में पथराया मनुज चतना के विकास पथ का आअवरोधक! और दूसरी ओर आमसुरी भौत्तिक युग के विपुल पिभव, सुख सुविप्रा का आकाक्षी मानव भोगवाद वे. पीछे पागर, प्रहिर्शात हो, भल गया--वरहुविधि स्थापित स्वार्थो से जजर, वह प्रतिनिधि भावी नव भू जीवन विकास का ,-- क्टु स्पर्धा से दहन त्य विक्रय के जग में!

मनुप्यत्व से परिरहित नरूपणु विचरण करता भग्न प्रा पर,--अतर्मूल्यो से वियुकतत कर इंद्रिय. जीवन का भगुर सुख मध्य युगा ज्यों विभकत था भाव-वोध इद्रिय जीवन से।

लौह यात्रियों वी सतति रोपॉट, सवत्य स्थान ग्रहण वर रहे मुफ्त मानय्र आत्मा वय निर्मित कर परिवेश जटिल इतन्िम स्थितिया का, जय्ड मनुज जोवन को यत्रा वे पजा में।_. इश्यर ही रक्षक अब हृदयहीन सानय था!

शख“बनि

भीम भयकर मोड ले रही मनुज सम्यता दुबल हृदय तनिक क्त्पना भी कर सकता जीवन की उस नयी भूमिका का--गत सीमित अम्यासां में वधा मनुज-मन अक्षम उसके।

पिघल माम जाएँगे जय के विधान सय भाव ऊष्णिमा में वह नव प्राणिक जीवन वी-- महत ज्वार उठ विध्बव चेतना वे समुद्र में प्लावित कर देगा सक्‍त तट विगत युगा वे -- महत सौरय साभाग्य मनुज बे लिए सुरक्षित

४3 शखध्वनि

लाठी को चोडा

छुटपन में मुसका प्रिय था छाठी का घोडा उसने तथ से मेरा साथ नहीं ही छोडा! उसको कभी लगाता पडा ने कस कर कोटा आगन में भागता स्वयं वह ढीठ निगोडा! घोडा कहिए, वायुयान या उसका हाथी ऊपर नीचे मुय्ने घुभाता जीवन साथी

धुसता वह मुझको छे मन के गहन वना में,

संघर्पो के खदक करता पार क्षणा में! रजत प्रमारा में आत्मा के मुझे उडाता,-- घोभा का वेभव मेरे उरमें भर जाता!

वह अनिद्य सुदरी कमी वा नव यौयन में भाता चुपत्रे प्राणा के जपटक आगन मे! सारे जग में मिटी वह नव युवती खुदर, क्वारा हो में रहा, खोजता उसे निरतर।

स्वगिवा ऐंश्र्यो वा मन में भर सम्मोहन सोले उसने कितने चितन वो वबातायनां कहाँ कहा में नहीं गया हैं उम पर चइकर विद्युयर॒ गामी पसा से कर पार दिगतरा वचपन से वह रहा सदा मेरा प्रिय सहचर उच्च चेतना शिखरा का रोही दिग्‌ भास्वर!

शसध्वनि ध्ट

उसी मनोगति से बहू अब भी उड़ता निस्‍्वर स्वयय सपदा भू पर वरसाने वो तत्पर

जन मन के दारिदय दुस में बार अयग्राहन निज उर के शोणित से घोता भू का आनन

के

इद्रधनुप वन छूता जीवन के दिगत स्मित धरा स्वग रचना बे प्रति निष्ठा से प्रेरित | नया क्षितिज खोलता मुख्य आखो के सम्मुस नव प्रवाश, उल्लास, प्रीति के प्रति कर उमु्स बह शैशव का चेतक, लाठी का प्रिय घोडा नयी दिशाआ को उसने मेरा सन मोडा!

डद शखध्वनि

अमीप्सा

सौदया की सौरभ में

मत को नह॒लाओ , सूट्षम भाव ऐश्वय-गगन में

मुझे. उडाओ ,--

मेरे प्रेमी,

पावनता की छपटो में मेरे तमय तन मन

प्राणा को. लिपटाओ।

कौन भूमि वहरै--

स्वप्नों व॑ पावडे विछाकर जहा विचरते तुम

अतर के तद्गत क्षण में--

जहा कला क्त्पना तूलि से सुजन॒ सत्य को सतत संवार करती स्प्टा बे दपण में!

मुझको नव चेतय विभूति बना श्स अक्ल्प

नव मानव के मन प्राणों में सहज रमाओ!

शसध्वनि ५०

सौ सो स्‍पो में

अमूत श्री श्योभा होती स्परयथ. जहा साकार

समाधित उर चितन में,

अभिव्यवित की इद्रधनुप रत्नच्छायाएँ लोटा सी करती उमेपित उर-आगन मे--

मुझे प्रेरणाआ, उमेपा के उस जग मे नव प्रहप की सित बाहों में भर ले जाओ

स्वंग सुधा वे घट पर घट पीते अधाता जहाँ. युगा ध्यासा निश्चेतन उपचतन

तप्त नहीं हावा तुमसे खबस्प दान पा जन भू गो प्रापा का अशय जाठुह यावरा

जहा प्रतीसा में रा प्रेम मनुज भागी वे अतमुस॒ मति सापाना पर मच उठाना

पर

शरूघ्वमि

मेरे साथी, पावनता की आभा में मेरे तन मत प्राणा को अहरह ल्पिठाओ।

शखध्वनि घर

अनुपमा

वाल भवन में तुम्हे देस कर आज अनुपमे, आत्म पराजित अनुभव करता निज मन में-- क्से तुम्हें उवारें?--माय मु्े सूचता। जह, कसी दयनीय मलिन स्थिति में रटती तुम छोटे वच्चा वी सस्था में पडी उपेक्षित-- मातव उर की सिममता का नरबा द्वार जो!

तुम्हे गोद लेने को आतुर नव से मेरा हृदय तडपता--तुम निरीह सुकुमार वालिफा, हिम निपात असि हृत प्राणो वी कलिका कामल।

तुम हो कुछ अस्वस्थ, चिकित्सक कहते मुझसे एक पर वी हडुडी में सूजन हु सभव,-- इसका उपचार कराऊेंगा, निष्ठा से पालन पोषण का दायित्व सेमाल तुम्हारा साथक समझूगा अपना जीवन, प्रिय दुहिते! तुमसे सुदर कया मुसक्रों नहीं चाहिए

तुम सुदर वन सको हृदय से--पा अनुवूर परिस्थिति, रचिकर शिक्षा दीक्षा --उनत सस्डत शील्न्सौम्य सस्फार ग्रहण कर सका निरतर,-- मन का ही सौदय चाहता हूँ तुमसे

५३ इखध्वनि

स्तुति के प्रति

एक किरण उतरी आगमन में उसको कहता स्तुति मन कस में छाई नीरव उसवी स्मित शव युति!

घरा प्राथना सी वह पावन उठ कर घीरें उपर इल्वर का सुख देख सके अनिमेप हृदय में छवि भरा

उतर वस्त सा देह-बोध छाया सा गिर चरणों पर अपने ही में उसे अनावृत स्थित रख सके निरतर! झूछ फूछ वी जीवन बीथी में विचरे वह निभय,

जग के इन्हों से हो परिचित, भूजन के प्रति सहदय |

चरण चिहक्त जो घरती की

रज में हो उसे जक्ति दीपित हो उनसे युग का पथ

खत्री: लोड शा निर्मित |

शखध्वनि पड

रचना बी शक्तियाँ प्रेरणा पाएँ उसके मुसे से, निज सूख में हो अविच्छित संयुक्त अय वे दुख से!

मन से सुदर हो वह,

अपने कर्मो में सुदरतर, युग प्रवुद्ध हो वुद्धि,

सरल उर जीवन इश्यर वा घर!

देश देश वी भाव विभव सुपमा से हो वह मडित, शोभा प्रतिमा को करता भू मंगल प्रति अपित

दीपशिखा बालिका गेह जो मेंस करती दीपित पृूण योववा उपा वन वह करे विश्व पथ ज्योत्ित!

पु

पावन अवोधता

मुझको लिखता देख, हाथ से बम ठीनकर, मेरी पोती ने ठेढी मढी रेखाएँ

कागज पर कुछ खीच, मोड अपनी प्रिय ग्रीवा, देखा मेरी ओर, दपष से स्फीत दृष्टिसे।

उन विमछ सीलछे नयना से झाँक रहा था विस्मथ का आकाश, अमित विश्वास से भरा, आत्म विजय वे स्मित प्रकाश से विस्फारित सा

शखध्वति

मुर्ध भाव से पीता रहा सरल प्रमनत्रता मे अपछका चितयन की--मन में छगा सोचने वचपन वी पावन अयोधता बसी अदूभुत,

भघुर, कक्‍त्पना प्रिय होती हू!

सहसा भेरा ध्यान गया जपने ऊपर! कुछ सीधे टेढे आखर बागज पर लिख, उनको गीत छद वह,

मे भी सभयते सवच समचता हूँ अपने को, गौरव से फूटा! क्‍या

अब सनुप्य में

शाइवत शैशव कही छिपा रहता, अनस की

भाव मूक्ष गोपन सोहा में?

क्तिना थोडा

मनुज जान पाता आजीवन विद्याजन कर! सदा अगम्य रहेगा ज्ञान, मपुज अबोध शिक्षा पोती वी विस्मित चितवन सत्य था भहत।

शलध्वति पद

यथार्थ और आददर्दा

ज्यो ज्यों देखता निवट से मख यथाय वा आदक्षों का ही प्रेमी बनता जाता मन!

क्दस वी साथवता इसमें वह पकक्‍ज को देता जाम-- अध्यमूख लोचन!

लक्ष्य विना ज्यों माय व्यय ही,

त्या आदक्ष बिना यथाथ का प्रांगण, मानवीय आदेश साध्य---

अनगढ ययाथ जड़,

आत्म प्रगति के क्टक्‍नपथ का साधन!

वहिभभरात युग भोगवाद वे पीछे प्राय खो मानव आत्मा का चिर अजित गोरव परवाज:

नग्न यौन श्षीभा में लिपटा जड यवायव वो वित्ताक्परता देता बहू वितापन

५७

शखध्वर्ति

जीवन सघपण वी करण दुहाइई देकर नारवीय सल कमों में रत भू जन-- राल टपकती मुंह से घन वी वातें सुनकर, ये निरीह का करते शोपण दोहन! समयौता करते रहते आत्मा से प्रतिशण घोषित कर विकसित यथाथ का दशन ,--

क्य्म कूमि ये कदम जग ही भाता इनकी कुत्सित घणित

विकृत के प्रति ही करते आत्म समपण वे यथाथ का भी तो मूत्य भछा क्‍या जाने ?-- उत्जू मीधा करना जिनको प्रतिक्षण,

प्रथम पत्रित में सम्य जनों की स्वय प्रतिप्ठित-- मनुप्यता से वचित जिनका जीवन!

अत, देखता जय

यथाथ वे पक्षधरा को, आदर्शों. के प्रति

समधिक अधपित होता मन-- मत्य यही जीवन यथाथ कय

मानवीय आद्शों का

वन सत्र प्रणत मिहासन!

शसध्वनि बट

मेरा जग

कवि, किस दुनिया में रहते तुमर-- पूछा करते मुझसे सब जन, तुम कोक्लि चातक वें स्वर में गाते रहते क्सिके. गायन?

देखते नहीं, कसा तीसा अब भू पर जीवन सघपण,

प्रतिदिन दुष्कर होता जाता जग में जीवन वरना धारण

धेसने को मानयता का रथ

अब भोतिक कदम में दुगम, प्राणों का दुदम मत्त वृषभ

तोडता रास, पथ कर अतित्रम

हा, कहा गया जीवन सारबि, मच रही पुकार सकल जग मे, अब दिशा हीन भागती बुद्धि, गहरे खाइ खंदक मंग में!

दारिदय दुख का ढो पवत जन हृमि अब जीवन मृत, हत मन, हो विश्व विपमता से आहत विध्वल गरजने को भीषण!

शखध्वनि

अधा सा भटया रहा विवेक शतमुख पथो में ल्क्ष्य-हीन, दिशि रहित ह्वास विघटन तम में प्रज्ञा प्रदीप लो हुई क्षीणा

सबके भीतर अब मूक रदन,

सवर्क उर में नेराश्य घोर, आशाज्काक्षाएँ घूम-शेप,

दीखता विपद्‌ का नहीं छोरा--

चुप रहता, कहता मन में सव ज्ञात मुझे भय का कारण,

शस्मों से समधिक बब्दा से कवि छटता जग जीवन का रण |

अपने मे, अपने जग में रत सघपण का वर विज्ञापन

तुम लाभ उठाने जगती से जीवन +्रा बर शोपण दोहन!

ख्प्टा वे जग में रहता

अब सूजन भूमि मेरा जागन, उपकरण जुटाता रहता नित

जग में आए नव सयोजन!'

कृमि मानव भी मानव वी छृति, युग-जीवन उसका ही दपण,-- लाँध स्वय को, निज युग की जन सृप्टि रच रहा हैं नूतन!

शखध्वनि ६०

निमित करता नव मानव से युग सीमाआ से उठ ऊपर, जो नव प्रवुद्ध मानवता को दे से जम रस वी भूपर!

मे जिस भू पर रहता, उसमे बल तुम वो भी करना विचरण,

मेरे प्रिय कोयल पी-खग भी उस भू का ही करते कीतन

मुझसे चिढते बने मित्र झनु--

हूँ अचेत युग सक्‍ट प्रति, बासुरी बजा मन के वन में

खोजा करता नव स्वर-सगति !

उनको सूक्ष्म का तनिक बोध, वे दवे स्थूल वो पवत से, में एक सास उडा उसे पाता हूँ शक्ति अनाग्रत से

कवि रे भविप्य परी नात दष्टि, देखता जगत वे. आर>+पार,

स्वर स्पश सुधा से जन मन वा जीवन का हरता व्यथा भार

वह ॒वाघ विसगति को लय में

अतजग की कर नयी शोप-- गाता--शुक रोर डुआवा जग का,

दे बुद्धिश्नात को ल्ट्यन्वोध!

६१

मुखर

शखध्वनि

प्राव आख खुली तो खिडकी से आ-आकर चिडिया के कछरव ने अलछस उनीदे मन को मोह सा लिया!

में लगा देखने झुड झुड सतवहिनी जुट मेरे आँगन में चहक॒ रही हू फुदवा फुदक वर हप भरे सैक्डा स्वरा में --- वाद्यदद वजता हो कूठ वोमह क्‍्ठा वा!

अग्रडाइ हे, निसम की स्वर थ्यनिया का

रस लेता जाता था मन में ल्टा, लेटा!

शलघ्वनि ६२

इतने ही में

सतवहिना की मधुर सभा में एफ काब गया वही सी सभयत यह साच

कि चासा वहा पड़ा हू

और चीखने रुगा गटे का फाड वाव वह,+ याय काब वर वाँव वाँव कटु वाँव वाँवां उसयता मुय्र सिमत्रण था वह बायस बुछ का!

पाँव काँय थे उन अनमेर स्त्रा से बुठ़ुयर चहिने घीर ठगी. सिसवन !

अब बठ उतण खूर त्रद्ध तो एसी रयर

मर उर वा टगा. बेयने सीह्श साया सी

मे उठ बढठा-- हा सापन-+- टीड मरासता होंवपा विजयी होतो जग मेंटे सनुक हहय वी मेयर सर्म रगर संगतियां या छिप्र विनम्न पर हज गाद यग मुसर हथा के का जॉगन में!

श्र

आखध्वनि

सस्दृतः सौम्य सुयोग्य सुरुचि के लिए उपेक्षित पीछे हटते जाते, हटते जाते, उपरत, मन के वन में! बटु कदये निमम कठोर जगली काक कक्‍्वश क्‍्ठ स्वर में वबर विज्ञापन. कर निज आसुरी शक्ति का, मुसरित करते अनगढ जग के लोग मच को, आत्मकथा गढ़ लज्जानग्न दप से दक्षिता

विश्व जयी वे निश्चय अप-- पर आत्म पराजित!

इपध्यनि क्र

सकेत

क्या ऐसा हो सकता? जो पहना चाहूँ उसे लिसि कर शब्द दूसरे ही छिस दू कोमछ करतल॒ पर|-- और समझ जाओ तुम मेरे मन का आशय? तुम्हे ज्ञाव और मु्ये भी,-- जो बुछ पहना मुझे चही क्‍या तुमसे बहता? या जो तुमको कहना हो क्या तुम वह बहती?

चंद खोखले

स्थूछ मन स्थितियां के द्योतवा सूक्ष्म भाव जनकहे

समझ में जा जात नि

६५ दइखध्वनि

उहें चाहने पर भी

नही कहा जा सकता! तब वे अपया स्पश

मम या मूल्य

सभी बुछ सो देते हू

मेंधा, प्रवचन

असफड होते सव क्षेत्रों में-- सव॒स्थितियों में

टसीलिए निस्व॒र सकेत सबल हें! जीवनप्रद, प्रेरक हे मुखर बझत्द से |

शवध्यनि ६६

सुर्थे स्मरण हँ-- बचपन में-तव मे क्शोर था-.. में बठा परवत प्रदेश कक... सोचा करता ड्व

कही सुना था

कोइ थुक्‍ती परी, क्शोरी

अचानक आकर फूल स्पश् पा अघुर प्रेम का अर्पित कर देती निज जीवन

या दोना जन एक दुसरे के प्रति खिंच कर कर देते सवस्व निछावर

दर

शखध्वनि

उन्हें मनुज क्‍या यम भी नहीं छुड्ा सकता फिर! पुनजम लेकर भी ये प्रेमी ही बनता

तमय हो जाता तन मन तब अमर प्रेम के स्वप्न छोक में-- तारे भी बुछ नीरब स्वर में ऐसी ही वातें-ली बहते,

मुक्त नील भी

करता सस्मित

मौत समथन | घीरें घीरे

तरण हुआ मां अगणित ग्रथो में बी खोज

जजेय प्रेम वी!

देश विदेशों मे भी घूमा,

मिली अनेक युवतिया भी

सुदरिया--परियाँ--

भावों का आदान प्रदान

हुआ भी बुछ से।

बिन्तु, दूसरी ही अनुभूति हुई कवि मन को!

आत्म समपण करनेवाला सवत्यागी रूप प्रेम का कही नहीं ही दिखा मुझे

शखध्वति

घ्८

बस मूक व्यया, बेंदना, निराज्षा, अश्रु, तप्त निश्वास मिले उपहार रूप में-- आत्म पराजय और ग्लानि भी छायावादी कबियां ने जिस दुख वी महिमा गाइ अस्फुट स्वर में छित हृदय तत्नी में!--

सुज्ञ॒प्रीढ मन बोला मन ही मन भपने सें--

प्रेम कल्पना हैं किशोर मन की, सौवत वी -- हा स्वगिक कत्पता! क्स्तु. बहू इस धरती पर कभी उतर साकार नहीं होती!

मन वृद्ध हुआ अब

वह बहता, कनपना भर हो सत्य वही है; मनुज हृदय को प्रिय भी

कहता आत्म बांध तमय हा--

६९. शखध्वनि

हा, प्रेमी प्रेमिका युय्ल भी वही प्रेम हा

इब्वर को अपित अब भू पर होगा मूतिता तभी स्वग भी साथक होगा जन घरणी पर

झतध्वनि ७०

मन का साथी

पभी सोचता हूँ जब मन में

क्‍या मे एकावी ही आया जग मेँ-- चूला फूटा वे भूमग में

तो, तोता मति वरती घोषण गृह गभीर बने, कहाँ अक्ले आए हो सुम? पूव जम वे क्यों का फल अपने सेंग में लाएं हो तुम! इस जीपन में पूव जाम ही का फल फ़्छता कम विपाक निरतर चल्ता।

रटी रठटाइ वातें सुनकर

मेरा मन बुंढ देता उत्तर पूव जम का यह अनचाहा बोझ भरे ही संग छाया,--

पर जिस पर हू गव मूझे जिससे रहता जीवित जिस प्रति अपित--

3१ चगष्यीी

यर ने थाप पृष्या यो पट आय भरें. का. मसयरन++

जमजात आनद सहज जा बहा

उर में प्रतिपल प्री हूट्य था सयशों

सुख दुस में बंदु दश भुरा बर, राग द्वेंप स्पा ये क्षत भर, मुय्त द्वृदय जो जीवा प्रा उस्ता अभिवादन, रेगता नित नये श्री शोभा से विलय प्रह्ति वा आननाों

मुझ मन से रेजा बाहर भूमा या रस हेता जो भावा वी वाँहा में भर,-- तदागार हो निस्‍्वर! अतर-तमय भूज प्राण मघुबर उठते जीवन-मधथु बरने सचय | नहीं अरेखा आया मे नि सहाय, बेंधघा सू्म आनद सूत्र में जग वो भी अपने ही संग लाया हे. निश्चय!

शखध्वनि > ७२

युग गाथा

इस अवोधता पर जन युग की हेसता मेरा कविन्मन

नर यथाथ वो पीछे पागल खोता जाता आतर सबलल्‍रू, देख विम्व निज जग दपण में

भूल गया अपनापन!

स्थितिया अब उसकी निर्माता जो स्थितियां में नहीं समाता, विजयी स्थितिया, स्वयं विजित वह,

अत वहिर्मंव जीवन |

भोगवाद थे प्रति वह अपित आद्शों को गिनता कल्पित, मृगतप्णा से जीवन कुठित

उर में क्‍्टु स्पर्धा रण!

सामूहिक्ता का वह श्रतिनिधि भूल गया मणि दीप आत्म निधि, यनत्र चक्र बनना उसकी विधि

भौतिक सुख अवल्वन!

रे

चराध्यती ७४

जीवन मुक्त

मे घरती परी घूछ झाइवर खड़ा मुततत जीयने ये लठ पर

मिट्टी वें जड़ मूवा सिलोने

ये भुयकी अब सभी मेंजाने

नयी चेतना पफूप रहा मे इनमें नत्र जीयन स्पटन भर

इनम नहीं मनुष्य सभी जन पशु भी, डृमसि भी अहि भी विप पैन हेख सप्ठि धचित्य यपहुमसी

नथा यांघ जगता उर भीतरा

चाव चलावर, मन ही मन मनुज मूति गढ़ता नव चेतन ,-- अतर का दपषण हो वाहर वाह्य बिकृति भर यने ने अतर

जाणर लहोे. थुनन्आ्दशसित्त अतर का करती उद्ेल्ति, फेना के शिवरों पर चह मं

युग वी में भरता नव स्परोँ

जप

शखध्वनि

जग की सीमाआं में बँध कर मनुज उठ पाएगा उपर, जन भू जीव का खप्टा यह

नव दीपित हो दप्टि दिगतरां

मानवीय वन सर्वे घरा-तरू नयी चेतता वा पा सवा, मेरी नव स्पप्ना वी तरणी

पार गाए तुम्हें डुबो कर!

शखध्वनि ७६

मध्य स्थिति

मने चुना अबर अपने हित, यही मब्य स्थिति सबसे सुदर।

जी करता, होता ऊपर लय भू पर विचरण करता निभय, अतर तुम में रहता तमय--

जाता जाता बाहर भीतरां

हृदय कमठ में स्थित तुम मेरे जग जीवन नित रहता घरे, मुझे चीहते स्नेही चेरे भव विकास अवल्पित जिन पर

साधारण से साधारण

उर में लिए घरा जन के ब्रण,

मुझे हिमालय प्रति हिम वा कण, सत्य अखड, असड़ चराचरा

वद्ध नहीं मुक्‍तत नहीं म,

तुम से चिर संयुक्त वही मा

तुम्हें देखता सदा यही मं मनुजा में तुम मनुज अनावर।

७७

जसध्वनि

आत्म-नम्र सखते तुम मन को,

शान्वत-्गरभित जीवन-क्षण को,

भरते कण्णा से भू-त्रण को ,-- मिटा आत्म-पर वे लघु अतर!

दूर निकट आता जाता नित, जड नव चित््‌-स्पर्शा से प्रेरित , उर को तुम नित रखते विस्मित खोल दृष्टि में नया दिगतरा

चसंध्यति

फ़्ल फल

निनिमेष सौठय

रूप सयोजन श्री टरती मन दीप्त यण सुदर भावा ये

ज्या प्रतीया हा गापन! सौरभ साँसा से भर देते

जन भू उर वा आँगन -- सुधर पर सौदय वबरा के

तुम हा जग में दपणा

फूटा से क्या होगा कवि अपल्पय भर रखते लोचन, रा गधा से हो सक्‍ता क्या जीवत क्य. पोषण? पार हू स्तुत्य--ज्ुवी तर डाल भू प्रति किए समपण, निष्पम वन निधि वे रस करता सहज स्वास्थ्य समधन!

७९

शखध्वनि

“कूठ पूछ है, फर फड है,

तुलना स्देव ही घातर, खुदर को खसुदर के लिए

वरना. दासुण पातका तन मे भोजन वे संग

मन का भोजन भी आवश्यक, सुदरता आत्मा की पोषक,

भू. मागत्थ.. विधायक

“कला पूण यदि अपने में,

वह होगी जन अभिभावक, सुदरता रसमार सप्टि की,

सूक्ष्म. भाव उनायवा प्रेम झक्ति की प्रेरते वह,

जन जीवन अभिमत दायक, सजन कम संचालक,

मयु वे फूलो की मदु सायका”

शगब्जनि ८०

अतर्जग

जय मेरी हत्तत्री में जंगता रस स्पदन तव स्पर सति मेंस उध जाते जठ चता! भरनस जान शूर विपमताआओ वा भूलखण, निलिद जिश्व में जाता आतरिय संलुसतां

अब खुले दिग वातायन में सद्य जागृत नथ प्रभाव मुप्य दिसलाता बिरणा से मडित,-- मसृण रेशोमी आभा जचल से हो आवत अग अग धरती वो छंगने लगते शाभित!

गा उठते खग वद, मत्त नाचता समीरण, डुप्रा कूट, सागर लहर उठ करती मतत, मौन मनरणान्र करते रवि झन्लि तारागण मानव जीवन का करने नव पयलििचन

निम्यय हो जाता तव मेरा अतमन-+- ये प्रकाश, आनद श्याति सौदय वो भुय्त कही मनुज वे अतजग ही में चिर ग्ोपन,/-- प्रेम प्रतीभा वरता जिनवी पथ मे प्रतिक्षण

८१ शखध्वनि'

मत्यु ढक

यह जीवन मिलता महान्‌ हे! इसके सिर पर विधि ने नीर्व नीलमणि जडित मृत्यु मुकुट धर गौरप उसे दिया है,--जीवन प्रति हो सहदय,-- वह फिर में नव जम ग्रहण कर सकता निभय

नब यौवन की मासल शाभा से हो वेष्टित विचरण बर सकता भू पर प्राणा से मडिता ज-म मरण वो आख मिचौनती सें चिर परिचित जीवन रे अविजेय-सत्य जन भू पर निश्चित!

उदय कमी होते इतात आखा के सम्मुख देख वज्ञ दृढ़ नी” गात्र मन को मिस्ता सुख न्याय यप्टि वर में, करुणा से आदर मयन मन, जीवन सरक्षबन्से छगते वे चिर गोपना

मुत्यु लाए बी दारण स्थिति दुस देती मन का देख मृतत वे हित सतप्त विट्सते जन यो! आँसू मी मुकता लडिया की माला अनगिन मत्यु देव थे वक्षस्थर में पड़ती प्रतिदिन!

शब्रध्वनि

सना अपना का विछोह--भावा का बंधन हेंज होता छित्र, दुल वे टगते दश्षनां पर गरिमा से सहता उसको लगता झाभन, मृंव का दें सम्मान मत्यु का निस्‍्त्रर पूजन

भजीवन में भरन्सुदर मत्यु असशय, उसवा गुर व्यक्तित्व गरभीर, पवित, अनामय मत्यु पार भी मुझ दिखाई देता जीवन, स्वप्त द्वार भर मत्य,--परें जन सहज सतरण!

८२

८३ झखध्वनि

यत्र नगर

भगवन ऐसा कभी हो इस भारत भू में जय घर प्र घर, मजिल पर सौ मजिल उठकर औद्योगिक देगा नगरो सा दारुण दुगम इंटे पत्थरा का निमम गढ़ इसे वना दें,-- टेढे मेंढ़े सर्पलि मार्गों से. गफ्ति!

जहा देखने वो मिलें फूटा के प्रिय सुख, मुखर चरोखा से जारर चिडिया फर-फर ग्रीवा के फयो में मन की व्यथा अजाने उड़ा छे जा सर्वे! जहा खिडती से यरन्यर चादी के थकतों सी यूप हेंसे फ्शा पर!

जहाँ मृवत व्यक्तित्व नहीं साजाय प्रद्वति जा घनो साज सज्जाओं में आधुनिता गहा बी-- हरा भरा मंदू दवट प्रिछा थे हो आँगन में घग पग पर उठता दबता मसमली तय सा! डा ने हो उम्रात नीए घम्ता ने घर से आँसा में वड॒जाता साँसा में चुभता सात अटठवा जाए ज्योस्ना बिजरो के प्रशान में

स्वप्ना थ्थो जायर में मन था उहहे रुचेदे!

खम्वनि

मुक्त प्राणप्रद वहे ने वायु--व्ना वी. सच्य सोरभ-सासा से जीवन मन का विपाद हरी तारा का नभ थुत्ता हा भीतरों सहन में निस्वर सभापण सा करता शरद निज्ञा में!

पड्कतु पापिव श्री सुदर निरुपम निसग को प्रभु, कमी पिच्छिन मनुज से हाने देगा

डे

प्‌ शखध्वनि

चिंडियों की समा

चिदिया वी उस बहत्‌ सभा ने मुझको चुना सभापति ,--

मे भी मन से उडता, गाता, भाई उनकी सगति

कभी बैठ मेरी ग्ोंदी में, क्धा पर, फिर सिर पर,

फरने >झगी मथुर कूजन वे“ भाव मुग्ध स्वर-सहचर!

मिठा मनुज साथी था उनसों थे थी मन में हपित, मेरे भी मणिन्वण वसना- पस फडकते. पुलकिता

सुनता सहज स्फुरित गायन भ, सुनता निस्‍्वर अपर, चदुरू समीरण, मुखर दियाएँ स्वर पर हृइ निछावरा निसिर प्रड्ि करताली देनो, तरवन भरते ममर, घुट जाता उर था विश जय में रवटोन सथपरा

शखध्यति ८६

पूछा मने, उसे गाती तुम रस त्तमय गायन, रत्न्‍र सा जाता काठ भर गति, मोहित हो उठते क्षणी

प्ोले संग, कुछ क्षण तीरव रह, नहीं जानते कारण,

बया उमपित होता अतर-- स्वत फूटते गायन!

तुम्ही बताओ, कवि हो तुम,

क्या गीत झब्द-स्वर साधनरै-- रहा सोचता जाने बच तक

म॑ कर आत्म निरीक्षणी

जान पाया मे भी बुछ भी संजन रहस्य अगाचर--+

विहग उड़ ग्रए थे सव॒वब वे मुझका देख निरत्तरा

नहीं जानता, क्या गाते समझे

गय बुसुम क्या निस्‍्वर/-० मूत्र मंसर--दाना क्या पहले

इसे जानता जतरां

पु] शखध्वनि

माव सिद्धि

फूलो वी आत्मा से सहसा मेरी भेट हुई निजन. में-- उसकी अपलक् श्री शोभा से विस्मय मूड हुआ खण में!

वर्णो की क्रिणो से गुफ्ति तन पर साडी थी त्वंच-कोमरू, कसर पावक वी भधु अरखें चोभित थी स्मित मुख पर निः्चल!

सौरभ वी उमद सासा से

प्राण हो उठे मेरे पुलक्ति, फूछो ने छू मुझे डेंस लिया

प्रीति तडित्‌ से कर तन वेप्टित!

सह सता दीप्त स्पश सख हुआ अक में उनके मछित, कौन पचा सकता छोभा विप शक्ति पात दी खूख से दसिता

चाली पुप्पात्मा, तुम मूछित

जग जे प्रत्ति, मेरे प्रति जागत, चोभा की साधना तुम्हारी

पृूण हुन्‍,--म सिद्धि अववरितिं

शसध्यनि ८८

हृदय चेतना थी पह निमर स्पंगरित] भाव पिभेय से कत्पित तीथ स्नान सा कर मेरा मन देह मुक्त है उठा उारसिता

मुझे देध रस्म स्थिति में बोली वह, स्मति पुएवित मन में, कहा समाधित होते? मझकों स्थापित बरो घरा आऑगन में!

सोचा, जग के प्रति विश्वत रह

मे पूण हो सकता निश्चित, जग जीवन से भाव सिद्धि वो

जरना हांगा मे समावितां

तव से विश्व विसगतियां में

अत शोभा वर सयाजित नव भू जीवन रचना बे प्रति

सजन हप से हूँ म॒प्रेरितां

शलध्तनि

पत्थर मे फूल

दो परापाण सठ सुहृदो-से सटे. परस्पर, ल्टे हू उत् वे जचढ मा

छायाएँ जय बंपती तन पर लगता दोना साम हे रहें,

या आपस में चुपबे से पुमफुमा रहे. दुछां

पदूझतुएँ. आती पर उनमें

कोइ भी परिवतन नहीं दिसाइ पडता!

कोयल गाती,

हारद पूर्णिमा भाती।

फाल्गृुमत वी उमद वंबार

बन में सौरभ बिलराती-- उन पर तनित प्रभाव पडता, कभी दिल ही उडर मचस्ता,-- रत दौडना टूर रहा मल तिराजा वे भीतर!

शजध्वनि ९०

हा, गर्मी में उद्ध गद्ध वुछ देर के लिए वहा ठहरता थबा वर क्षण भर!

सावन भादों में अल्यत्ता

बुछ काइ सी जम जाती खुरदुरे पदन पर!

शेष सनातन जीवन उनका गृह्य मौन में बंदी रहता।

आज जचानक एक जगली पूल

फोड उनकी दरार की

साहस कर उतके सीने से फूट निएल आया लो, बाहर

मिज विस्फारित चकित देष्टि से देस रहा वह

यमज अनमने पापाणां को सोए तदाकार दद्वा में!

प्रतनु बत पर नाच रहा यह भद पयन में-- निज उर का उत्लास

विर्त उन पर उठेलनो

दोना मित्र स्वय भी उुछ पिस्मय बिमूदन्स

दर

शखध्वनि

निविकार नयथनो से देख रहे उसका मुख

मन ही मन ज्यों मीच रहे हो-- हाय विधाता , पत्थर उर में फूछ खिलाना था क्‍या तुमक्री!

शंगाध्यति

क्त

समाधान

समाथात उया सभव मा। के शार परर>-+ जय पति पदशा निसिर बियर जीयने यो!

बाह्य परिम्थितिया पर अयल्यित जाजजीवा, छिदय विगत में मूत-आगग्रत में संघपण,-- स्थाभातित्त अयथे आर्थिथ सास्राजिय परिवतत -- स्त्रग प्रतीक्षा रत--परह बरे घर पर पियरण!

समाधात रभव हैं जब भी मा में स्तर पर यदि प्रयुद्ध मात नितर बर में लें भू शासन को

या फिर कटु सघपण, रण, पिनाश भी सभव, दो दढ शिविरा में विभवत सप्रति वभव, पर विश्यास मुझे, व्यस ढाएगा मानव विः्य संम्पता वा समस्त जा दारुण परिभव

आस्था इत्गर पर मुझको,--उससे सव सभव, वही वदल सकता वबहिरतर जीवन मन को,८ कार सप्टि का साक्षी--प्रगति विकास प्रवतक, इदबर गभित थानों उसे दाजवत-क्षण को!

९३ शखध्वनि

प्रखडियाँ

फ्ल्फ्ट हे!

ये क्वल पखडिया कोमल,

नही पुष्प का सा श्री सौप्ठव ,-+ रग गध रज में मुरझे दल

पिखर गह स्वगिव स्वर सगति रहा वह जत सयोजन , अब न॒पूणता के ये दपण, पृथर्‌ पृथव जीवन क्षण निप्पढी

मपरस वोप नहीं अब अतर,

अनिमिष दृष्टि छूती अवर,

कहा युलाता अब मल्यानिलर बतच्युत,.. पायल अतस्तला

मथुपा से अधर रस चुवित, सासा से थे समीरण सरभित, बेसर अलय हिम जल गुफ्ति,

तार तार शोमा वा आला

शखध्वनि

श्ड

अब ये फूछ बन पाएँगी, मिट॒टो में घर मिल जाएँगी,-- पख्डिया से फूट बनते,

फूलो वे ही पसडि-क्रतलां

फिर भी ये हो सकती साथत

मधुर प्रतीक्षा में रत अपल्क,

नव॑ मु पथ में पलक पावड़े बिछा,--फूल वत सकती अविक्ला य्रे प्रसूस पखखथडिया कोमल

हशरध्यनि ९५

आत्म धुरी छाटी मिट्टी था लव्ट सी धरती चाचा बरती दिशि वे करतल में नित, आत्म सय वी परिश्रमा वरती!

देखा प्रस्ता मे उसत्रा मायन स्यामर हास्य स्मित, देखा बरता भाव प्रवण मन सागर सा आदालितोी

दसा बरता रजत क्रीट हिमाल्य से शिखरा का देखा वरता जधरार से भरे अचतन प्राण गद्दरा को!

मिटटी बे छथदू सी घरती अक गणित के छ्ुद्र पिदु सी पर अपने में गहन सिथ्‌ सी, उसना भी रे अपना जीवन विधि जिसका करता संचालन

९७ इखध्वनि

बुप्टि अवपण झझ्ला उल्का भूमि कप रत जस्थि नित करते मथन,--

लपने उर में

कोटि चराचर जग जग॑ उबर करती धारण

वह तठस्थ हो इन सबसे-- हट्दू सी नाचा बरती नित अपनी ही गति में--

बँघ्‌ भमा वी स्वर सग्रति में!

देस मुझे भत्र भय से जजर कातर ,

नत्यपरा धरती दिगू हपित

जस्य हरित आचरू सेमाल कर कहती--

जग जीवन धारा अनादि से बहती

तुमका यदि अपना जीवन दे कुमुमित जग को करना औरो का दुख हरना--

आत्म धुरी रहो सहज स्थित, जंग जीवन को भी अपने में करो सर्मात्रत,--

शसब्वनि

९८

तभी जगत को तुम यत्किचित अपनी उर-निधि दे पाओगे!--

अपने जीवन में भी इससे साथवता पाआगगे! जात्मच्युत हो अग जग से निगले जायर तुम निश्चय मन में पछताओगे।

शवध्वनि

मै १०० भाव मृत्य होते परिवतित तर रचना प्रति जीयन अपित,-... मिटता जग का उसा जाया उर अत्थ्य

वा बनता दपणा आन को अब वह अविदित क्षण

छ्ट जाएग भ्रव

शसध्यनि १०२

आत्म दे

मेरी रचना चूभती बुछ का

सूक्ष काय वे करती अपना अमदिग्ध अब मेरा अतर

एक सत्य स्वर मुझको जपना

मुस्े छेत्ते जब, बशी सा गा उठता मेरा तमय भन, विश्व विसगति में नव सगति भरता म-+जग के प्रति चेतना

संजन कम मे राफ ने सकता पह मेरे स्वभाव का दपण मे हँसता--जब बहते सुनता लिए हुए मे उनका आसनां

शनु मिन का हो स्पा वश वनता नर अपना ही भक्षक, चिमृख प्रेम वे होता जो जन उसया इब्चर ही रे रक्षक

साक्ष्य सत्य वा पाना जिसको उसको होना. पडता अपित, मूख सत्य को पा भी सकता कितु नहीं पा सकता ग्विता

शखध्वनि १०८

विद्यत्‌ थुग

आज अचानक प्रिजली चली गई जब मुझकी शरण मोमयत्ती वी ऐेनी पडी विवरा हो!

तवी लौ वा स्वरणिम सौम्य प्रताश भर गया चुपके मन में! स्पप्ना का ससार सहज सावार हो उठा नीरव क्षण में

मुख्य शलभ का प्रेम, दग्ध जीवन जावाक्षा, जात्म समपण, नाच उठा आखा के सम्मुख मत्यु झयन को उमुख! प्रेम त्याग ही का हो दपण!

सहज झीलटमय मानवीय सो तगी मु्ये ली,-- कनवा किरण मइझ ने

हि लक है हर

१9

स्त्री भी नत भू खडी सामने, झाज जता सी कपित तन मन स्नेह से ! क्या विजली के दिफ प्रशस्त श्रेप्ठ मामपत्ती वा दीफसिया हो सकती? भू भानव को पथ दलफ

शण्छ

नी

दाखध्वनि

मुरों छोहें का तार वागाया झूप्टा ने तुम झकार वयाया मेरे अतर की, मे समय नहीं पाता था अपनी साथक्ता तुम देह सहज घर छाट भाव मबर स्वर वी!

मे वाघ पाया तुम्हें पुण स्वर-मगति में, मेरी अक्षमत्ता,-भन मुससे कहता निः्चय, भक्‍ार मान तुम रही हृदय की चिर अमूतत , चयन पाइ नहीं प्रणय प्रतिमा शोभा-तमंय

सग्रीत नहीं फटा, उर को बर रस विभोर, स्पर रहा समाया प्राणों ही में भाव-मौन, गूजता रहा कलियों को घेर हृदय-मघुकर चुन पाया सटज नहीं उनमें प्रेयणी कौनसा!

श्री योभा रुत्तिया तुम, मुझको अस्पृत्य रही, बहार वी रस-अवयब सासरू जय सी कोमर, नव भाव रूय घर छूती स्वप्मा के उर को हो उठते प्राण जहाय स्पण प्राशुर चचारो से

दसध्वनि श्ण्८

तुम वाद्य मधुर होती--मन ये तारा को छू

मे अपनी लय में उछ्ें वाध लेता सुसमय, व“पना स्वप्त भी होती, परिचित उनसे

प्राणो से कर लेता उनना अक्षय परिणय

तुम मल्य अनिल सी था, रोमाचित कर जाती

सासा की सौरभ से छू आबुल अतस्तल, ज्योत्त्ना सी छिपकर स्वप्नां में नहल्य जाती

फ्हरा सुपमा वी शीतकू लपटा का अचल

सुदर स्‍त्री भी हू जंग में, मन पुलकित रहता, घेरे रहती स्मृति छायाएँ उर को अनुक्षण, तुम संजन हप के पे खोछ गाती चुपके भावी के श्री सुस्त स्वप्नों से भर जाता मन

१०९ शखध्वनि

अधित जीवन

संघ जाता जन तार हृदय का रस तम्य हो गाने रूगते प्राण स्वय ही नीस्व स्वर में!

जग जीवन के कोलाहरू को लाघ मौन में सूक्षा स्वप्न-झकार फूट पडती अतर में!

काल मृक्‍त से हो उठते क्षण नभ सा बिस्तृत राग-रुद्ध मन, हार विजय सी विजय हार सो लगती जग जीवन-सगर में! दूर बुछ भी ण्गता मग में, निकट सभी वे जय जग में, मन अपने में डूब तैरता निभय सुर्र दुख वो सागर में!

इासध्यतति ११०

जासथा से पा नये सजीउन श्रद्धा के पथ पर चर्ते क्षण, अपित मन जीयवन मे हित

जय भेद वे जुछ वाहर भीतर में!

आएं आएँ वि चराचर पूराने मुखंदे ले सुदर-- जग वो जनपयन में सोया भी रहता मन अपने ही घर में

सुस दुस उर आते जाते घूपछाह दोना ही भाते,-- हैं सुखी

तुम्हारे नाते क्सिमे क्‍या मानू अतर मं

१११ शखध्वनि

जीवन उल्लास

चिडिया गाती मधु बलर भर

छाया गाती कप कप निस्‍्वर,

रवि क्रिणें ज्योति स्पशशों से गाती मन को छूकर!

सभी बस्तुएँ गाती निश्चय)

क्या तुमको सुन होता विस्मयर

सर जग में कहने को आकुल क्यो रस आतुर अतरां

ममर करते रहते तरूदलू,

गघ अनिल फिरती स्मृति चचल,

गूढ सुजन उल्लास सिहरता सपके उर में थर्‌ थर्‌!

आओ, हम तुम भी मिल गाएँ,

अपने मन वे भेंद भुराएँ,

पथर्‌ रहें हम, एक साथ भी, प्रेम प्रतीवा चराचरा

मु्ने मौन नीलिमा ट्याती,

ज्योत्मा स्वप्पा में नहरती,

मे सय से ही परिचित जग में--- एवं सत्य ऐे मां स्पा

शसध्वनि ११२

सृजन दायित्व

कोयल जब गाती वसत में नया फूछ या खिल उठता उपवन में-- विश्य॒प्रद्ृति तब सजनोत्छास प्रकट करती उस क्षण में

कलाकार साहित्यकार का क्या दायित्व भला हो सकता इससे सुंदर रै-- भाभा की अगुलि से छूपर बह संगीत पिरोता जनभ मन में!

सोछ परिस्थितियां के वधन वह रस मक्‍्त चेतना करता तत्क्षण, अतिनम बर यूग वी सीमाएँ अतित्रम कर जग जीयना

वह सौदय प्रकाश प्रम जातद रात जे द्वार खाट कर

जात्मा से सालातू कराता निम्िल क्षद्रताआ से ऊपर सुर दुस ये सागर तरीं

११ शखध्वनि

सहज बोब से उमेपिन वह तक वृद्धि के ज्षितिज छाघ उडता वाणो के राजहस सा छू चेतय. दिगतर-- मानव आत्मा भूजीयन यो छाकर नित्य निक्‍टतर!

और कौन दायित्व लादता

जग उसके कथा पर -- मनृप्यत्व का प्रतिनिधि बन

देता समग्र वह दृष्टि विश्व को,

राजनीति या अथशास्त्र या सामाजिक्ता में भी नयी. प्रेरणाएँ. भरा

कोक्लि जब गाती मधुवन में, नया फूल या

सखिठता घरती मे आगन में-- स्रप्दा तव रस मम्न

निरिल दायित्व मुक्त हो, शान्वत को बॉँयता

सूजन यो क्षण में--

भू जीवन में,

मन में !

शखध्वनि ११४

मविष्य वाणी

मे छाया में बठा उस दिन घरती पर बुछ आडी तिरछी रेखाएँ अगली से या ही सीच रहा था--

और सोचता सा बुछ मन में आर्से अपने मीच रहाथा।

परीच यीच में

इतने में वाना में सहसा

नपुर की स्व्रनि पठी मनोहर" जाँखें सोट, सामने लेखा

एक विलारी को आते श्रीसुदर |

जप जगठिल, शी सयाए रफ्तिम जानने, सहज रजाए स्प्रण तण हरित साठी पहल अग्रा में फटा ये गाने--

बढ गाए पट मेरे नि हाय. घर यर में -- भाटा में सरत सटव. स्मिति मंत्र जधर में--

११

शखध्वनि

कहती हो, बॉचो तो पडित, मेरा करतलछ सत्य हस्त रेखा विद्या या केवल वाग्छछ ?

सुनती हूँ, तुम सामुद्रिक हो, मंत्र सिद्ध हो, अपने मित्रा से प्रसिद्र हो!

मे हूँ धरती, सूयदेव वी परिक्त्मा नित करती

मेरा भाग्य पढो, भविष्य बतलाओ . मेरा,+- दुगम विपम परिस्थितियों ने मुझको घेरा |

सन को कातर स्वर ने छुआ, हृदय विद्रवित हुआ

वय संधि से झोशित प्रिय तन,

खिच जाते थे सहज नयन मत

फूछो का करतल मे थासे रहा देर तक, उसको निरखा परुपा मेने घटा अपर्य

जन-भू जीवन का विवास

नाचा आखा में

शखध्वनि ११६

विश्व सम्यता का इतिहास हृदय में छाया, उड स्मति बे पाखो में |

योछा, में तुम पर हूँ माहित -- कहां, हटो, मत छेडो मुझकों,--- गालो में द्रुत दौडा शोणित *

मे वोला, यो मत सकुचाओ, तुम हो जनगण मन की प्यारी, प्राणों वी प्रिय शोभा प्रतिमा, मुम्ध क्शोरी नारी !

मे करतल पढ चुका ध्यान से, सुनो, भविष्य बताता हूँ निज गुह्म ज्ञान से

जभी तीन रेखाएँ कर में निकली केवल, जन प्राथ मन की द्योतक जन जीवन. सबला!

आयु बुद्धि भावना नाम भी

इनके निशचय भू जीवन इनके ही चिर सुस्र दुख का पिनिमया एक और रेखा

प्रफोप्ट से उपर झ्थ्यार अभी सय अंगुली छाणगौ-- दीप. खतरों

११७ शखध्वनि भू जीवन वो वर शाइवत सौदय प्रेममय

वीति तुम्हें देंगी-- आनद, प्रकाश अनामय

अत स्थित होगी तुम

अधिक. वहिर्मुख विस्तृत,

यही तुम्हारी भाग्य रेस बतलाती.. निश्चित

साथब होगी

सूप देव वी प्रिय. परिकमा, स्वग जिखर चुवी होगी

भू. मानवता बी. महिमा

बारी प्रमुदित-- बाह्य क्षितिज भर छुआ अभी मानव ने निश्चित अतरिक्ष युग कर भू मत में नव उद्घाटित '

तुम बहते, अत शिखरा पर भी विचरण कर स्‍्वग. विभव वस्साएगा भू पर प्रमुद्ध नर घयवाद करती में नत सिर आउऊँगी तुमसे मिलने फिर '

घसध्वान ११८

मधु पसडियाँ

जो विसर गई गयु परसडियाँ

ये प्रन पाएंगी पूर ने अब प्रध बत मूह गें-माग्त में

हँस हेंसे पाएगी झूट ने अब !

सौदय-बत्त मे संयोगित वे दंग ने बरेंगी आपपित, निज उस्सौरभ भूनभ में भर हो पाएँगी स्वय उपद्त !

मधुपात्न वे वन सकते वरतल, अछि वा क्या देंगी आमत्रण ?

उड जाएँगे प्रिय रूप रग, बुम्हलाएंगा शृृमि सा रज तन

स्वर सगति से विच्छित विशृत अस्तित्व विसे लगता झोभन)

सतुल्न चित्त जब खो देता प्रतिकूल उसे लगता जीवन!

फिर भी वे चाहें तो साथव हा पतित उपेक्षित जीवन क्षण-- बन पठयी पावर्ड चिछे प्रणत, जीयन नव मधु को कर जपर्णा

रु शखध्वनि

सूर्य बोध

मे जय छोटा था, क्श्लोर, तय देंस प्रकृति मुख अनजाने हो उठ्वा था सुख से प्रिभोर |

आगन से, तरू शिखरा पर से

मत उडता चुपके अबर में, मौन ज्ात्ति में खो जाता

तिर रहस नील्मि के मरमे |

कोमल पणसों का स्वप्न मीड प्रिय नील शूय था मन का घर!

पिस्मत हो जाता वाह्य विश्व

नामों रुपों का वस्तु जगत-- मन मुक्त नील में होता लय,

वह भी करता मेरा स्वागत !

म॒ मूल प्रकृति से झक््ति खौचता नीठ चाति से प्राण सीचता,--

मेरे मन का सूथय देखता वाह्य सूब को अपस्या लोचन --

१२१ शखध्वनि

सूक्ष्म वोध

में याव पाऊँगा तुमको शतदा की वेणी कर गृफ्ति, साकार नहीं कर पाऊँगा अतर के तारा में झड्त !

शत भावा विस्टग में ने कभी

अँट पाएगी सुपमा अतुल्ति, छवि बिदु समा पाएगा क्‍या

जग जीतन सागर में विस्तत ?

फ्ट पडता बादल अचछ जब

तुम विद्युत गति करती नतन, करपट लेती रस ऊर्जा जय

गिरि बने भू में जगता कपन

ञ्ू इग्रित भर से गृह्य व्यथा गीता में हा उठती छदित, मधु स्पश् सात्र से सम क्‍या

पा जाती स्वर रूय गति अवधित ! छः

इसध्वनि श्२२

सौदय अनावत हो जाए

यदि कला करे तुमबों अक्त, प्रह डूब छाज में तुममें हो

हो जाए निस्तल्त जतहित

तुम उर के वातायन पर

दिखला जानो गुठित आनस, कृत्तकाथ सहज इतने ही में

हो जाएगा जग वा जीवन )

तुम हो, इसका ही सूक्ष्म बोध वनता उर का जक्षय सबरू, जीवन सपपण में भी वजती रहती. अश्वत पायल

स्मति भी जान पाती अब नो हा उठता अतस्तल तमय, उर नम्न आत्म रक्षा के हित तुमकी अधित--इससे निभय

१२३ शखध्वनि

शुश्र हास वन गई बोध मे हाथों में अब

मेरी वीणा

दुसह सात्विक मय में भरी |

बहू मबुर भार वी मुरली जथर. व्वास-मघु, पीवे वाली प्राणो वे वासो वी हरी नि

हृदय चीर कर फट निकलती उससे रहस बेदना गहरी, बया नाद सुन जाग उठेगी सोदड हटोरश चेतना हरी है मेघा में विद्यर्‌ू सी पागल यथा ज्वाल प्राणो में लहरी-- औओ झास ध्वनि, हृदय सोठ कर अपनी वात जगत्‌ से कह री |

शपध्यति

530. 4

प्रतित्यतित हा था पया से अयर या प्रसार तू गह री, या आरूछ, जीवन सागर वी अतल गहनताआ में बह री

राौघ पय वे अपराधा वा

जग परी श्रुद्ध चुनोती सह री, देखें जन, युग ध्यस ढह पर

विजय वैजयती नये पहरी |

श्र इखध्वनि

मम्र

तण वा क्‍या वर लेगी आँघी ? हहगती जाएगी कुछ क्षण फ्वारेगी. पटवा बुध फ्ण, गहरे. मूठ जमाएं.. पद ढह जाएँगे! बाषेगा वह ]

सय्॒ वा मुँह भर देगी आँधी

मौ मौ अहि छोटेंगे भू पर रस्‍मी से बट बंद दिंगू घूसर, मबित होगे. पेन जिले हे उखड जाँय सभव उड़ भूचर। अवस्पथ तर छेगी आबी '

शबिति दप प्रति फेर सौम्य मृस | उसया कया तर लेगी आँघी '

अय सकद में रह वह अशत+

हरानभरा, पहिरे से उततक

जक्ति प्रदान से अपराजित

रहा नम्न, आत्मस्थित, उ्यताण: यही वह गए इसा गाघी !

लसध्यति

यंग अब यह चिविरा में सडित, अस्ख हास्त्र परने में अजित शक्ति हॉकिति से जिजित ने होगी, मानवीय द्रद्यास्त्र अपरिचित | लितते ने तत टिम्मा बाँघी

श्र शसध्वनि

आकाक्षा

मुझे ताजगी, नव जीवन उत्छास चाहिए, जड यथाथ की ठहनी में चेतन स्वप्नों का वास चाहिए

अतिकम करता रहता नित यथाथ अपने. को, भूतिमान करता अमत मन के सपने को

मु्ये स्फ्ति, मत प्राणो में अभिल्‍लाप चाहिए-- विश्व छास विघटन में

नया विकास चाहिए

कौन सत्य हैं, कौन र्प्रप्न पीछे जानोगे , क्या यथा आदश ही पहचानोंगे !

शखध्यनि १२८

मु सत्य दित्र सदर, श्ाति, प्रराग परहिए पतायर प्रन में हेंसना नप्य मधुमास चाहिए !

भाग याग में मर्ज त्याममय भाग चाहिए, वाय व्यस्तता में ध्यानस्थित याग चाहिए !

यंग नें भातिय पिजडे से बंदी जंग का मन- मु चाहिए आव्यात्मिमक नव लाक जायरण

भगुर जग में इश्वर का जविवास चाहिए शाश्वत का सित स्पश्च, दावित, विश्वास चाहिए

श्र शखलध्वनि

प्रतीक

क्से रम उभरते ये आखो के सम्मुख-- ग्गोके थफे प्रतीक भर दग छेते हर, -+ कही इनके आँस कान पुस केवछ हँसते रग हृदय को करते मोहित

कौन चेंतना अभिव्यवत बरती अपने को ! मे केसे समयू रहस्यमय मन वो इस जाग्रन सपने को इत रगो में शाई ने अथ भाव भर क्वट-- ये करते मन प्राण उहतसित !

शपध्वनि

सोज रहा मे

यह प्राण वी किरण मोहती जो मेरा मन,-- रगा में जा बहती प्रतिक्षण मुझसे सकेता में ग्ोपन उर वी बातें अफ्धित |

१३१ चखध्वनि

कहमीर

धरा स्व क्‍म्मीर, प्रकृति का सद्य सौदर्गस्थक, इंदनीह नभ, मरक्‍्त हरित धरित्रो शस्य व्यामल ! गाता सर सरिता झरनो में गिरि वा गीत-मुखर जल, फूछा के स्गों की घादी,-हँसता मुक्त दिगचर !

केसर की रोमाचित जेती अपलूक रखतो लोचन, साँसा में बहता अनाम गधा से गुथा समोरण ' पहुलगाँव, गुठमग मोहते मुग्ध यात्रियां वे मन, निश्चय ही उत्मुक्‍तर प्रति का यह प्रिय क्रीडा प्राण |

याही में सा घरा उठाए नी नयन अवर को , ध्यानावस्थित रखते निजन मिरि तन्मय अतर को! शोभा से दिम विस्मित हृदय नमन वरता इद्यर को , मद देता घिवगार परपर बृमि-से दरिद्र हत मर को !

मुझे स्मरण जाती फिर ग्राम्या प्रकृति प्राम यह जीवित यहा अर्ला माप ही रे अभिगापितत, जीवन-मृत! विडास युग समव, नय जीवन मूस्यों से प्रेरित घरा-स्तर्मे वे योग्य यहा नव मानयता हो विफसित !

शरस्रध्वनि हो

सौन्दर्य स्पर्दा

सौदय लोक का वासी मन गूथा करता झोभा बेणी शोभा आत्मा की सार सुधा, शोभा भूलस्वण सलभ श्रेणी!

जो धम दशन दे सकता

कवि देता वह रस सत्य अमर, चतय अमृत, प्राणां का मधु

शब्दों बी दोना में भर भरा

पहुँचाता झोभा का प्रकाश

वह पण बुटी, घर आगन में, उर का पावक वितरण करता

रस जजुलि भर जन वे मन में

निज अमस्स्‍्वरा के स्पर्शा से भरता जगनजीवन बी कटु ब्रण, दोपित करता अयसाद तमस प्रेरणा किरिण से छू नूतनां

१३३ शखध्वनि स्पर्गिक सपद्‌ थे खोल रुद्े वह जन भू उर के वातायन भावों वे शोणित से करता जडता के शव को नव चेतना

सौदय साधना इच्छू महत्‌ जीवन के विप को वता अमृत, सह घृणा दक्ष, दे सहज प्रेम , पशु को करना होता सम्हेतां

धगणाति १३४

सयुक्त

वागोी लय गाया शा गधों ये पट थात तघ तर टह्यागट ये सय जा वार+- सरित गया कट गठ गाया बन्‍ता तह

जा ग्षात समीरण पी गति में

जा हाति पीर सम में निमा+- चास्तवितय जगा यह हप सर”

याश्रियय मत वब्या था जगहों

प्राण का सागर ग्ह्रता वियुत्प्णी बट रजताज्वछ पीआ रोआ + बूपा से सित सत्र बरों हृदय में कटा

नये या नित जंग जीवा वी

चरती मत प्राणा को मोहित, जड जग वा मुख भी सजन शवित

नये भावा से करती अवितां

शखध्वनि

१५ इस नाम रूप जग में रहना उठ नाम रूप से ऊपर नित अतस्यित स्खता मानव ब्ो से सयोजित!

आनद. वबेंद्र से तण तह्यो के जग के मुझको संदेश नित्य

खग मग मुझसे वार्ते स॒व के आशय में उर परिचित!

सगीत एक ही व्याप्त मौन

तण तर जीवों वे अतर में उस्तुएँ सभी पाती. निस्‍्वर अभियवित उसी अविदित म्वर में

बासी पड सकता जगत्‌. नहीं सजन चेतना वीं विम्वित +

में खोए मानव मेन बो जीउन यापन

दुष्पार. होता

शसध्वनि

आत्म मोह

सुरमा

जो

१३६

विप पी, युग सागर वा विष पी, जीवन के प्यासे मन,

शस्य श्यामल्ा सुधा वृष्दि से तुमे. सीचने. मसक्‍ण!

अतनभ वी उच्च वायुआं की इवासा पी पावन

विप प्रभाव से मूछित मन मे भर फिर नये सणजीवनों

सा मभृह फाड व्यवित करते निज विज्ञापा

मंस्॒क रुप घर, मोह सिधु तर गोपदवत तू अनुक्षणा

जात्म सोह पढ़, दत्य रूप जब घरता दाश्ण भीषण निज जवगुण भी गुण लगते तय पर के गृण भी दृपणा

१३8 शखध्वति ग्राल चजा नर अपने ही से

होता गव-पराजित , अपने को गौरव देने में

खोता गौरप अजित

या लिप्सा भरमाती , कुठाएँ फट पड़ती बाहर, मुट्ठी जब तवः बद तभी तक नर वे हित श्रेयस्करा

आत्मदप से स्फीत उसे छगते जग में सब वामन, वाहू वाह करते मुस्स पर हँसते मन ही सन सत्र जनों

खुल पडता वस्नावृत खूसट हाद मास का पजर, रिक्त आत्मश्छाघा में छिपटा व्यग्य. चिन अपना नरा

अमन अहता पीडित वौद्धिक + स्‍्मायु. पिंड इलथ. केवल, अहमाव से जजर, वाहुर से भी भीतर दुवेदा

दे गथाथ की सतत दुहाइ रोता वह जग बचक, अधकार का भोौत उपासक वन प्रवाश का नसिन्दर्का

शखध्वनि

१३८

तास्तिक बतला अपने को वनता आधुनिक निरतर,

दकियानूसी आस्तिक भीतर पूजा करता पत्थरा

जटिल जगत, मानव स्वभाय उससे भी जटिल. असशय,

सत-समद्ध, विद्या विन्न बन-- जय जीवन प्रति सहृदयां

१२९ इखध्वनि

मेरी वीणा

मेरी वीणा भाव युद्ध का शख्स वन गइ मेरे कर मृदु झकार प्रबुद्ध नाद वन फूट रही जन मादन स्वर में!

में क्या ल्सिता, नहीं जानता,

बिना रखें मानता नहीं मन, मुय्ने लाघ, आते जीवन में प्रेरित शोभापख सूजन-क्षणों

मु्चे देख उमेप रश्मि स्मित स्वथ सहम जाता य्रथाथ जग, उसको. लगता, व्यथ गडाए वह जीवन वें कदम में पगा

ज्या असाथध्य रोगी जी उठता पाकर रस ओपधि सजीवन

मरणोमुस सभ्यता मागती मुझे चित्मती नव 7 दणन

शखध्वनि 9४०

वहिभ्रात जम को देता अत क्द्र--म्वत जालोबित, नयी दिशा देता चेतस को नये मूत्य से बर अभिपेकति

भेले सक्‍डा दादुर ध्वनिया से मुसरित हो युग वा आगन, मद्र मेंघ गजन सुनवर ही भाव पहलछत्रित होता जन वन

क्सिकी प्रतिछवि---नहीं जानता, मेरा मन नव युग वा दपण,

जन भू मानवता को मिलता इसमें विम्वित भावी आना

बहू कोरा परिहास मात्र भगुर गुटधर्मी नव लेखन का,

विना स्पश॒ पाए शाश्वत का आचल पकर्ड मिठते क्षण वा

विश्य हास विघटन के यग में अस्वीकृति ही उसको भाती, जग विकास का पथ, मिटना ही इसमें विघटन वी क्षण थाती।

मेरी वीणा जीवन रण का झख वन गई मेरे कर में-- मानव उर फिर रण क्षेत्र, गाता सन नव गीता के स्वर में!

शखध्वनि १्धर

स्वतत्र चेता, युग वेत्ता, सृजन चेतना प्रेरित,

नये निर्माण घरा पर चलता जीवन मन आदाल्ति

यह सथाथवादी यूग हँसता जिस प्र मन हो सन+- अश्रु स्वेंद श्रम का संघपण वतछाते दुबल. जनां

तिल्वा त्ताउ वना वे करते अह दप विचापित जग का हो दायित्व अखिल उनके क्घा पर स्थापित

भव यथाथ आदक्ष उभय जीवन द्रप्टा के रे कर दोना को सचालित करता वह उनसे रह. ऊपरी

जग जीवन वा स्वप्म छठता जाता मन से प्रततिक्षण कवि क्रषि दष्टि सपरण अनश्नेन-- जगत. भोग रस साधन!

शब'प्रनि रड४

सत्य मरने जीवन पदाथ में दिखलाइ देता तव नूतन जय पद अथ सोलती तुम नये सूक्ष्म हृदय में भर सबेदना

वहिजगत श्र, स्पश तुम्हारा पा

जी उठता वन नव चेतन, मत्यु चिता रूपटा में सुनता

नव जीयन स्फ्लिग जा स्पदनां

शसध्वनि १४६

ओसा वे यन में हेंस उठसे मेरे अतसुप्र वो सित क्षण, प्रिजन निशानपद में सुछ पड़ते तारा-से मेरें दुस वो प्रणा

निसिट विश्व में छगता मुझसा मेरी ही लघु सत्ता प्रसस्ति दपण भर यह बाहर वा जग जिसमें नसशिस प्रतिप्रिम्यित!

मेरी संवेदना चद्र बन भू वा तम करती आलोकित आकाक्षाएँ जुगनू सी उड पथ खोजती नित्य अपरिचिता

तीथ स्नान म॒ रागद्देष वी ज्वाला में करता जीवन बी,

अग्नि परीक्षा देता नित आनोश वल्लि में तप जन मन की!

आत्म कथा मेरी मेंघां के

दया विद्रवित उर में अक्ति, युग समुद्र मथन से ये घन

उमड़े मनोगगन में निश्चित!

मुझको रे प्रिय जन भू जीवन

जन मग्रनवता होगी विकसित, आत्मक्था का उपसहार

सखद आश्ञाप्रद तुम्हें समपित'

दावध्वनि श्डट

सजन चेतना ये प्रियास या जग चिर साशी दपण, भावा, बोचा, व्श्या वा चलता. रहता सघपणा

इसमें डूया, पात्र डय्ता जसे निज अभिनय में-- दगया रहो तटदस्थ साथ ही-- चुभे हाल हृदय में!

सत्य जगत जीवन निश्चय,

भाइवत विश्नास वा प्रागण, इश्बर प्रति आस्था यवि--

जग जीवन वा करो समपण।

झसन्‍्वनि

१४५९ दास ध्वनि मन के वन में जाग लगाती यह गभीर छत मेरी, युद्धोमुल हँत जगत वे लिए इसे जन समझे रण भेरी'

कहाँ खो गया वम्तु जगत्‌ के

जगल में मानव“ लगता दुस, बाहर के उजियाले तम में

कहाँ सोजता वह अपना सूखा

में अपनी ही

वस्तु जगत आमा थी छाया देख प्रतिफणित दौड रहा वह ह्स्तूरी मृग सा अपने हो से हो. वचित!

मनुज सम्यता अनति दूर लेगी नव मोड--त मुसवों सथय+ घुणा हेप भी नही, विश्व में दया क्षमा ही वी होती जया

शखध्वनि १५०

सघपण वे चक्रा को

स्नेहाकत स्नेह भे करना निश्चय, अपनी ही भीपणता से अब

स्वय पराजित अणु वल का भर्यां

खोलो उर के द्वार मनुज, विस्तार वहा भवनों का अगणित, चरण घरेगी मनुज॒ सम्यता नयी भूमि पर क्षतर्दीपितां

जीवन का मुख सहज सवारी राग हेप रज से उठ ऊपर--

मनृष्यत्व का प्रतिनियि हो वह, शिवसुदर से शिव सुदरतरा

अश्रु स्वेद के सधव्ण को आत्म दप्र से दे नव ग्रौरव स्वग व्यय बताओ उसको-- अहम्मयता का जो रौरव

प्यार क्रो धरती को निश्चय, कितु ने तप्णा-कदम में सन, आदर दो जन भू जीवन को रह विश्विप्टता में साधारण!

१११ शखध्वनि

क्राति युग

परहिभ्रात मानव मत को

निश्चय ही अतवबेद्र चाहिए, तभी सम्यता उठ पाएगी

सस्कृति के सित सोपानों परी आत्म सतुल्तव पाएगा

विविध परिस्थितिया में जंग वी, मनुस्यत्व वी परिधि वहिजग,

केद्र | प्रयुद्ध-हृदय वे. भीतर सामाजियता बृहदू. विम्ब

पृथु-उदर जगत्‌-दपण में बिम्वितत मनुज सत्य बा,--आत्मा जिसवी

सारभूत सित प्रतिनिधि निश्चित! सरल नहीं जतोद्वेत होना

जन साधारण ये स्तर पर, प्िजयी होती आत्मबोध पर

वहिर्मुखी. जन-प्रदृत्ति. निरतरा

आज घ्वस हिसा सघपण यो

समुद्र में रत स्नान कर जन मानवता नव समत्व में

येंबती, छूद्ध विपमताएँ तरा-.

शखध्वनि

आत्मतुप्ट अब मन संगठन

गत युग के सानव का वबर, नयी एकता स्थापित कर्ता

युग, समत्व वी सुदढ॒भित्ति परा

महत्‌ जाति युग. मनुज॒ जगत होता आमूल चूल परिवर्तित, जीवन के स्तर पर अमूत आत्मा होगी गुण मत श्रतिप्ठित! वस्तु जगत्‌ भी मातव आत्मा ही का प्रतिविभ्वित मुख दपण, भाव वस्तु या जड चेतन इश्वर ये सप्डि साथ्य औ” साधन!

श्पर

हर शखण्वनि

मारत भू

रूढि रीतियो में पथगाया जब भारत भू का जीवन

रेती करा सागरा

ज्वार नहीं उठते प्राणों में भा वे झति मूख से प्रेस्ति, शक्ति उर में, जीण पुरातन

पद्ठति के तट करे निमज्जित ,-. उव डूब करता दुवाठ मन

भीतर ही भीतर उद्देल्ति!

चर्म विधानों में जक्डा जन भारत का मन पाप पुण्य भय संशय जजर)!

विश्त काट के क्वाला के

पद चिह्नी से तट सेखायित, रत मता, सृत जिशवासा वी

जअध दरारों में भू सडित ,--- शिक्षित नहीं, प्रवुद्ध यही नर

शास्त्र पुराणा वे आफ पड़ित,

शखध्वनि श्प्र

संप्रदाय, प्रावा से उ्य्ति एप राप्ट्र जीयने की जाशा टगती दुष्पारां

प्रतमान भारत वा जीयन

हीन भावना से. उत्पीड्ति, पिपुट प्िदेशा ये वँभन से

प्रौद्धिक प्रग स्ताप जातकित ,-+ अपनी भाषा, अपनी सस्वृति

अपना सयर बुछ यहा अवाछित-- वही समय, भू आत्मा से अनभित , सम्य पश्चिम की कोरी अनुशृति, अजनयर!

पिघटित हाता देश जाज,

जात सटद भाग्य हत बालू का तट, हाय, प्रिपमता,. हिंसा. उढती

रुद्ध हृदय वे मानवीय पढ स्थापित-स्पाथ ग्रसित जन नेता ,--

सनता यह कसी आहठरे--

रत नाति क्‍या निबंट गरजतीर-- चाति | बचाए सत्य-क्ाम तप भू को इशयर

शखध्वनि

राजू राजू छोटा भाथा जय मेरे घर आया, देस पद्रह दिन का हो सभव। बडे प्यार में पाय मेने गे, यह, उसने छीन ल्यि या प्यार, बिना

में चिडिया को उन्ती परछांइ कप जा मास उरता था बह, उसे पकडने।

गति बय अदभुत प्रेमी था वहा! उसके उंगली आप नचाएँ बह कीौनतुक में झपट हाथ पर ज्यली पा में देयोच उसे चवाता छाट तीस प्‌ कभी उल्टकर चिपट गे चपप अपनी चप> पड़नि हे प्रेस्ति-..

भागे

पझसध्वति १५६

एवं बार उते पर संतयहनी यो सार यह लेठा था, छिप खिड्मी पी ऊँसी मुडेर पर, घनी माठ्ती उतिका में पत्ता से आवता उसे नहीं देसता य्भी जय प्रठी देर ता पुत्रारता राजू राजू, पुसी प्री थी योर यार रट गा, (पडोसी हंसत मुष्र पर) पे मुहर से यराट तज उसीते स्पर में-- छा पर द्वुत, म्याउ म्यात यार, पजिनय बरन टगा पूदने यो आँगत परो

ऐस अवसर पर में उठा बसे थी उसी पे. उतारा परता छत ये! 7_रि आउतत हरि क्या नया राजू वे भी असस्य हीरा प्रगग,जा मय स्मरण. हा

एसा शाोद स्थानन था यह महा ये मिहतोा+- जस्मारी में साया, भाजी शी हीण्पा में, घारी 7 पपहोीं यी बड़ी था अर खिपौ-- सभी महरें शर्लश थी अरी गाषा

शघ७

असध्वनि

अगर गिलहरी चचल जउहरी जतु-जगत्‌ बी, फिली चदुलठ भवर--जा कुछ मिले तो अपनी पठ पकठ कर, स्पय नाच सकती पागल सी

चूह॑ वो यहू जिस कौशल से मारा करता ज्मसे उसकी छल्वल भरी चटोर प्रद्ोति का बोध सहज हो जाता! वडी कुदरता दिखाटा विधि ने पित्छी की रचना वी सत्र जीवा में! उस पर अपनी सृप्टि-फला अवसित कर सारी!

कसी श्री सुतुमार छचीली देह उसे दी,

क्तिनी सुदर चित्र सखी सी मुद्राओं में

सोने वी प्रिय कला, स्वच्छ तन रखने की रुचि

दूध मलछाइ आदि व्यजनों का प्रेमी वहा

एक वार वह अधे रात्रि को साने आया, तीन बजे हागे, पद्रह फरवरी रही तब, जाडे के दिन, मेने शोल ज़िवाड, उसे कमरे के अदर गोतल्स मिलाया , दूप पिछाया,भोचा जप वह वबुर्सी पर जाकर सोएगा--वद कर दिए द्वार--विजु वह बार वार गूर्स बर, अपना रोप प्रकट कर पजे से सोलने तगा पट, स्याउ म्याउ क्रो

3

मौत ताचती होगी उसके सिर पर मेने जाने दिया उसे बह पड़ी स्पतत्न प्रद्गति का ढीठ बिन्तु स्नेहीं घिरा था, औ' पटोस में उसकी थी समुरारट वड़ो--उह बह व्याहा, चाहा बवारा था--सुद्य रात्रि जीवन का प्रमी फ्रेंच मैन सा !

शसब्यनि

वह फिर तत् से य्भी नहीं लाठा अपने घर! प्इ दिता तया उसती रहीं प्रतीशा सयवो, इंपर उपर साजा भी-ही ने दिया दिसाई सारा धर खसूना हा गया प्रिना राजू पं

बडा य्रुगा ढछगता अब ऐस बत्रीडा बुशछ सूघर जीवा साथी को सत्र जब भी मुचको लेटा प्रभी दिसाद देता वह उपयन में स्मति की आसा में प्रिम्बित हो --मधुर स्वप्न सा जहा जहा यह साता छिपा टता बुजा में

१५८

बहा कही उसवी छाया अब भी मँडराती,

फूलों वी ढेरी सुफेद|---जबव कभी करण ध्वनि स्पष्ट सनाइ देती आगन से जाती सी

द्वार सोह उसे साजता-पहा गूज्ता

वह अदृश्य स्वर! पर वह वर्पा वा साथों प्यारा राज चला सदा को गया रबग अय, मय्ने छोडनर प्रिय स्मतियो के. क्टक बन में अब कभी छोटेगा मूक सधर स्नेहीं बहू

११९ शसध्यनि

सकट

ज्याति सूत्र सी छुझ् चेतना मनुज में भीतर जिसे विरोधा जे पद का बिकट सामगा करना पड़ता, इस विरादू जग में रहने को! सहने पडते उसे नर आघात. अनेकों जो पर पग मुह बाएं रेते इसे चुनौती -- अधकार को साना गढ़ नियति आमा की

धीरज रुसना ही विपति में मात्र महोपधि जीवन बी सय्‌ स्थितियों में विद्रोहन संभव प्रातर की जिपदाएँ होती कभी ने दुजय, यदि अन स्थित हो चेतस, स्थिर निमल हो मति! सक्‍्ट सभी लिवारण हो सक्‍ते यल्ना से यदि तटस्थ रह, समझ सके हम उनका बारां

भीतर वा सक्‍ट ही वास्तव में सक्‍ट हूँ, विवलित हो यदि नित्त, तस्त उर, मति में हो भ्रम, डिग जाए यदि आस्था, अपने प्रत्ति हो संशय, जीवन पे प्रति रहे प्रेम उत्माह मन में ,-- ऐसी स्थिति में एउप्रही रक्षा पर सफता,-- बट रखा करता भो हैँ, यदि उसे पुकारा!

कल

शसध्यनि

मनोमाव

मर गाए पट दियु उम आए. वाट प्रीज ठीएा थे परती भी अच्छी उबर थी पर जनया आगात ढक्ितियाँ ऐसी. होती जा निचेतन से जगयगार दूषित कर दती चता में पे परोसे मंगल विधान यो!

मे अप क्‍या बांटे बाउं? ता क्या उनसे भी पूरा वी फ्सरें दंग पाएँगो? नहों नहीं -++ मे पूछा बीही बाउँगा जग थे मंग मेंँ--

फटा से वाट नहीं उगे बांटा थी भी मूल रह हागे भरज में, जो पूला से पहिले उप आए, फूला सेंग सीचे जावारा पूछा में भी वादे होते, द्वद्व जंगव यहाँ

पर, फला को ही पयोऊँगा भूउर में, कग्टो वो बिरवा की जड़ें उप्राड फेंका वर फूला के पॉबडे विछाऊँगा पलक-से, सानव भायी का पथ निष्क्टक हो जिससे ,--

विनर सको तुम भू पर नव स्वप्मो वे पग घरों

8 शलध्वनि

प्यार

मुझसे चिहते सुहृद--रुठ़ाता रहता हैं भले पुरे पर प्यार! मुझको बोघ तनिक भी भरे बुरे का, पाप पृष्य का में मन ही मन विचलित हो उठता यनवी फ्टबारें सुन करा

सोचा करता, क्‍या फ्रीचड में प्यार फेक कर दुस्घयोग या अपचय करता में अनजाने दिय प्रेम बारे मुझफों रुगता मुक्त प्यारका अमृत स्पश्े पा, कीचड अपना गदापन पहचान सबेगा, आर खाद बनने का यह्न करेगा, निधि पा अतुल प्रेम वी!

और प्रेम तो अकर॒प हैं ही! वह पन्‍्रज पने, सदुपयोग कर तुच्छ पक या, नया मूल्य दें सकेगा उसे!

लिश्वयप, चभी अपब्यय होता नहीं प्रेष का, वह अभयय हं, रादा छूटाने से बढ़ता हू

नेल्तु आवट आज

अतरित हा महा इट्रिय पथ पर

जे वित को स्वीश्त कस्ता पता पिल्पष चित्त या सुदरा

गये ये फ्िचित सत्यवान 4], मूय हीनता ही

भमाय घन, मुक्ति इसो म,--प्ाप

शसध्वनि

१६३ नयी सम्यता जमे हे रही आज धरा के जन प्रागण.. में+

ल्लरल माँद में पा निहन्ह विचर्ता जग

क्या. करना) स्थातत्य चाहिए,

जीवन वकानन में

सामाजिवता से तुप्ट व्यस्त अगर थाहना ही अयचेतन गह्लर भप टर अश सत्य सब में हैँ मन में तम को होता जीवन पायन |

आज एवं यऊ भोग त्याग में पग पग॑ पर चाहिए सतुदन

१६५ शसध्यति

सार्थकता

घपल्तनि

सूना

भाव

१६६३

सिंध ज्यार सामूहियश जीउन या उठता जाभ पर-- सा बिसर पर मे गति लय में भरता नय चेतन स्पर! पीरा पतचर यन में सरता कसा उगता सुंदर, सा] थयरटा निज जादि म्प में निशयय पूण . दिगयरा

नीठा गगन, ताजने में मिट्ता मन यो सुख, योव से परे कला या घोभा में गुठित मुझ्सा गूगा यहरां को मे गीत सनाता ध्यनि इंगित कर, मन वी अपल्य आसा में अक्षय शोभा चित्रित कर!

अहपार का ममता मणि फ्ण जहि करे उर दशित, साथक्‍ता मानय जीवन वी तुमको हो चिर अंपित!

(६७ शखघ्वनि

निर्चोष

मजन घस्, नये स्तर ध्वनिया से गरभित हो जय जन भू कं मन, ने योप्र ने अकुर फूटें जगें र्धिर में नव सववेदन!

युग समद्र मथन से निकारा

काठकूद जो भीषण. मादन-- उसी मसि में दुपया जेसनी

सृजन जमत मे परता बषण।

ज्येत रृष्ण को सुधा गरल को मिटा घना नत्न ग्स संजीवन, मृत्यु मेंघ फो दुह्दुर परसाता जन-भू पर नव जीवायं

असास्ता से आज प्रशजित

असुर हाक्तित्ाट सचय फिचय, दया समा ही मानवीय उह--

भनुज मनुज के प्रति टो सहदय!

शखध्वनि शषट पैद्ध युद्ध से नही थर्मेंगे,

परणा ने मानव जीवन

हिसा देगी ग्राति ने जग को- प्रेम स्पश्च ही भरता

दश्नन,

उरज्रण | सत की करा समद्धि--असत का

सह निमम सुग-भगु पद छाछन, संत सफत्व झवित सामूहिक युग पथ सक्‍्ट करे नियारण !

१६९

शखध्वनि

पुरस्कार

पुरस्कार भगवान्‌ दिलाएं नहीं क्रेसी को! मित्र शातु हो जाते इससे! और प्रशसक फ़टु आलोचक वन, कृतित्व के साथ आपके रूघु चरित्र को बना दूपणों का पहाड पृथु आत्म तुष्टि पाठ है, तिल का ताड सडा कर!

पप्ठ भूमि गढ नयी आपबी छिद्र भरी दुबलताआ की, राग द्वेप बी! भले वाट दे आप उसे (वह बेंट भी गया, सभी जानेंगे)! पर स्पर्या आत्रोश कभी मिट सक्‍ता इससे!

मूये चुनौती मिलती “वे भी चाहे तो सब पुरस्कार पदविया स्वयथ भी हथिया सबले--

क्वु

खुशामद करना उन्हें पसद नहीं हैँ

पुरम्फार वा दुस्‍्पयोग भर खलता उनवी--

कौन

न्याय कर सकता, कौन वडा सजक है

पुरस्कार पा क्‍या लेखक महान्‌ हो जाता?”

9

में उनका अनुमोदन वस्ता-युरस्कार से लेखक बभी महान्‌ नहों हो सकता निश्चित, चर इतित्व ही झान्वत कोीति स्तभ खप्ठा व! पुरस्कार से इनसो भी भगवान्‌ वचाए

इनयो भी सुनना नपड़े यह सं औरा से!

शखध्वनि १७०

मायाजाल मेरे अपने प्रीच खोसली झूठा वा तुम

जाल तानती रही प्रतिक्षण,

ख॒प्त हो रहा अब पह होभा का सम्मोहन

क्षीण. तुम्हारे. प्रति जाउपर्णा

सण भगुर सुस सभव अनजाने ही तुम नी हा जाआ अतर से आझरट, उठ जाए सहसा मुख से माया वा चीना जअचरा ज्यय सभी हा झूठे छटयट पघिना संय थे रहे नो आस्या या भी सवा

रश्‌ शखध्व॒नि पूर्ण बोध

मने अपनी क्षुद चेतना का रूघु आगन बाइनयाठऊ फर दिया स्वच्छतर, गत स्मतिया के दृह मिटा कर, जीण शीण को जीवन दे फिर नूतनां

अय बहू दिग्‌ दपण सा विस्तृत, निसिश॒ विश्व जिसम प्रतिविम्वित!

जागन नहीं, खेत बहू उबर, घास पात तुण छीलछ प्रीन खर कक्‍्टक दुष्कर

नव शोभा के शस्य वहा मेने रोपे स्मित,- स्वणिम रूपडें. पूट रही जिनसे. सौदय प्ररोहिता खेल नहीं, वह वीज भी स्वम, ऊनन्‍व प्राण अँकुओ में पुलुक्ति नव चैताय क्षेत्र वार विक्सित-- नव भाजों बोघा की मजरियो में अब वह मुत्रुछित,- प्रेम, तुम्हार प्रति चिर अपित, लोप भावना रजित, अत सुरभिता

शखध्वनि श्छ४

अविच्चछिन्न

क्यो हँसते रहते फूल सदा

कोइ रहस्य क्‍या उहें चात? चुप्पी साधे आवाश,

उसे कहनी वह पैसी गढ़ बातरे

चचल.. फिरता वाताम

समा पाती हृदय में भाव गध, गाता सरिता जल वह कल कल

पथ तिरता यिना तरी अनंत!

जलता रहता पावक अहस्ट

जौ ल्‍गी दीप्त उर में परिटेप, पव्त अत वोद्रित

नीरव स्पर में दते गरापन सेंलेश

मे भी सयुक्त निसिट जय से, अचात कप से जाहाहित

१७५

शखध्वनि

कर्तव्य जीना अपने ही में एक महान्‌ कम हैं, जीने का हो सदुपयोग यह्‌ मनुज चघम हे!

अपने ही में रहना एक प्रयुद्ध कहा है, जग मे संग रहने में

सव का सहज भला है

स्त्री का प्यार मिले

जमा वें पुष्य चाहिए नव जीवन वो

प्रेम मिर में इब थाहिए चलानी यन वर

मत नीरस उपदेश दोजिए, लासन्बम अब मर्मेर प्रथम साक्म वीजिए

जध

मन ीः न्य्था

उसी खुदा मन ही मना ऐसी भारत भू में कमा जहा भतलल दारिद्रय स्यि में

ड्वा जन का

जहा व्यय रे से उठ कर

असग्य कर॒ मुझे

भरते. उदर ने दाना पानी सक्ल्प तटा से

जीवन वन! आत्मवोध

ऊध्व आरोहणा ल्हरा

बुलाते, गजन

पाते! फ्नो - से

टक्रात, खिसियाते!

सजक क्या करे? काति ज्यार में उम्रड॒क्रद्ध

लाँघ रु&े जोवन पक

सन की सीमा डुया

जन

नेपायी

(७६

१७७

चिन्तातुर

इंखध्वनि

पद मंद वामी वोसे नेता विच्ब त्रासदी वे अभिनेता -- अन भी नहीं लोक मन चेता -- मूयो वे विप्ल्य में क्व्रि ही सस्कृति वोहित बसे खेता?

रहता मेरा मन ऐसे युग में जमा हूँ मे--

हू

जन भू पर छाया जब विघटन

'छवास,

घ्वस, भौति+ः सघपण,

राजतीति वी प्याली में जय

डूब रहे. आदशग चिर्तनां

भोगवाद के पीछे. पागल

जव चरित्र से हीन सम्य जन!

सोच सोच कहता मेरा मन ,---

व्यय सेय, हास्तास्त, वाहु बल, राप्ट्रा वी कु स्पर्धा निफ्क,-- महाव्राति का युग वहिरतर,

घेर्य चाहिए, दृष्टि, मनायवरी आदाश्ति चेतना - मिथ,

चाहिए बाय सेंग आतमिय सब

सेलध्वनि

श्छ्८

प्रतिक्रिया

लो, स्वत अब दा __ युगा क्‍्य क्षद्र दमित मन गहर उम्रठ रहा अब प्रतिकषण, कट आलोचन, प्रत्यालोचना! हीन भावना ग्रस्त देप से दाघ जसस्टत लेसन वमन कर रहा

अब संडाघ निज अजचेः

जतचेतन की गांपन। _._ वृद्धि हीनता का कर नग्त प्रदशन,

प्रतिभा चित्रा का कर नित्त अवमूृत्यन

१७९ शखध्वनि

वे कुद गाली बकक्‍ते जिसे नहीं छिख पाते-- चणा उगल जो लिखी उससे नहीं अधाते!

वेदा के, तुठ्सी युग मे

दाढुर बटु - ध्वनि कर अब मधुर रव भर

मन के वानो में गातें--

अहकार की घत वर्षा में पेट फुछा गज दभी मेंढक दे मुखर कक स्वर में टर्रातेि

क्षद्र नदी नाले टेढी मेढ़ी गति में वह

यूग के कटे कचरे से

क्

भर भर इतरातें।

बला बोघ, युग मत्य निखिल दुगध से भरो यों भावना की घाटी में गिर सो जाते! खेशे फम्या अपने पर हो उठती दुश्ततर , और आत्म विश्यास प्रवरतर , ल्श्यश्नप्ट टन घनूघरों वो जा बुढित चारा

शखध्वनि १८०

निश्चय, श्रतिभा का विद्युत कण मेरे भीतर होगा मणिफण, जिसके स्पश मात्र से दक्षित विचल्ति हो उठते प्रतिस्पर्धी खा ब्रणा

आत्म विजित शत जिल्ठाआ स॑ क्ट्ता का विप करते वर्षणा

१८१ शखध्वनि

वियतनाम

शूरीरता के नप्रतिम निदशन निःचय , पौरुष तेज प्रतीक, घाय तुम वियतनाम जता निज स्वतनता की बेदी पर हँस हेसकर तुम करते सव आवालवंद्ध मिर्भीक समपणा

जयायी आनामय से ले छोहा प्रतिक्षण अठिग बच्च सक्‍त्य शवित से प्रेरित होवर तुमने, जन स्पथातत्य चेतना वें सरक्षक, रौद दिया माम्राज्यवाद प्रा रण मद दुस्तरो ठहर सता अत्याचारी सत्य युद्ध में जन भू बा उत्तिहास युगा से इसपर दपण, सत्य जयी होता, अजेय जन शबित खोल जो जा मन प्राणा में भरता परह जीवन नूतन

अग्नि शिसा सी तेजस्थिनी स्त्रिया वरी का मान भंग फरती--पिद्ुत असि सी बढ वाहर, साथर स्थ्रीस्य हुजा उनसे, जन भू पथ पावन, चद्दी फिर असुरा यो बलि उती भर सप्परा

दलध्वति

श्र

पाणा से भी प्रिय स्ववनता वियतताम प॥-- हो ची मिह प्रेरणा भर गए शोणित कण में-- मत्युजय संदेश समर में वन उर-सवल प्रति हत्स्पदन के सेंगे गाता जब ग्रण मात्र में!

भे इतिहास नये यग मे ररता प्रवेश जब आऔ अजेय नर सिंह, तुम्ही उसके निर्माता, अध शक्ति का आरा मिछ गई तुम्हें वरण कर, रत पूत भत्र सूयु क्षेत्र, इतकाम विधाता!

जीयन के साधारण सत्या को अतित्रम कर महाब्यस के क्षण जन मंत्र हो अतिचेतन, महानाश के चरण तोड नव सृजन कर स्हा, वितरित जग में अमृत, पृठ में वर विप धारण

१८३ शुखध्वति

लेनिन के प्रति

एफ छातो के बाद जाज भी लगता मन को महापुम्प अवतरित हुए. तुम छोक धरा पर, जन गण वी दारिद्रय दुस दामता मिशा वो कर निरकुश युग युग री पेडिया तोउने!

रद्ध प्रगति, स्तभित थे युग इतिहास के चरण प्रस्तर यंग की रूष्ठि रीतियों में पथराएं,-- जादोल्ति कर लोक चेतना सागर तुमन मज्जित परी गत सीमाएँ जन-मक्ति ज़्वार में!

दिरत्यापी मयप संदशश तुम बिचरे भू पर छिनमित चर जीण आततायी जानधन-- नया मोद दे यनसम्यता को जन युग प्री!

शतिया से पद दछित क्षुधित, लापित असरय जन वग॒ सम्यता में खेंडहर से जगकर सहमसा जीवन-मुकबद छगे बढ़ने पा नया दिला पथ

नव आश्षा'फाक्षाओ के स्वप्नां से प्रेरिता

रक्‍तोज्वल सानव गरिमा के नये यूयसे उदित हुए तुम विच्व लितिज पर महिमा मडित , जनभू के जाने-काने का अधकार हर दिक प्रसण जीवन प्रभाव | जन प्रागण में। घय महामानव, भू पर चरिताथ बर गए बैचानिक युग वा तुम--निखिल "विन का सचय, यत्रो वी सपद वितरित कर जन मगछ हिता

शंखध्वनि ८४

नवोमेप उर में, नयनो में सृजन स्पप्न नव, अग्रणित करूपद सामूहिक श्रम यछू उमेपित बढ़ते जन सस्द्ृति का नव प्रासाद सँजोने!

देव रहा अनतिदूर, भावी आगमन में घरा-स्वग कल्पना घने साकार हो रही-- भू मानवता निकट रही जधिक तुम्हारे

लोक जाति के दूत, जानता सूक्ष्म दृष्टि से तुम गाधी एक हीं सत्य वे शुश्र सस्वरण,-- देह प्राण मन के मानव को उपबृत करने जाए तुम, जन-भू इताथ अब वहि सग्रठित।

मनुज॒ हृदय को उनत करने आए गाघी आत्मा का दे सौम्य स्पश अतमुख सन को-- तुम से लेफ़र महत साध्य, गाघी से साधन निश्चिक विश्व जीवन॑सयोजित हां जन पर वहिरितर वैभव प्रतिनिधि वन (आज विपभी साय घग्ति थिविरा में सडिता ) मनुप्यत्य का हृदय सत्य-स्पदित हो निमम यात्रिकता मे लौह. अस्थिपार में जकड़ा जथन्वाम से मानवीय गांरव हा प्राप्त तगत जीवन को

महाघ्यस बी आटाया से सकते धरा जन पिछ्य थाति के सित सहखदरू पर दिय विस्तृत लोक साम्य सेंग पिस्प ऐक्य का बरेंप्रतिश्थित-- मनुज प्रेम के जालिगन में साथ घरा शो तुम्हें नमन करता टाल, लेनिन, भारत का वयि-- आगि्माव तम्हारा था अनियाय जगत टिलां

राजकमल द्वारा प्रकाशित पतजी की अन्य कृतिया

लोकायतन (सक्षिप्त) ०० लोकायतन २५ ०० अञ्षप्तिषक्तिा ३०० खिदम्बरा १५०० रश्मिबाध २४५० अतिमा ४०० स्वणधूलि भ्रूण कला झोर बूढा चांद ४५० युगवाणी ४०० पल्लव द्‌०० पल्लविनी ११०० शिल्पो ४०० पो फटने के पहिले घ०० किरण वोणा छ०० पुरुषोत्तम राम ३४० पुरुषोत्तम राम (पेपरबक) ३०० +सयोजिता १० ०० +साठ बपष एक रेखाकक्‍न ३००

ऊतारंगिकत पुस्तकें प्रमुपलब्ध है