।लडुन। ऋग्वेद

(ऋग्वेद की सम्पूर्ण शाकज-संद ता” का दिन्दीभाषान्तर)

धर ०5५ ॥ऋ

भधान्तरकार और सम्पादक,

पर्डित रामगोविन्द तिवेदी, वेदान्तशास्ी ६६ इिन्दी-विषूएपुरा णु १7 ह। ईश्वर-

८वेदिक साहित्य”, पक परिचय लेखक,

सिद्ि”, “शर्जाषें प्रध्वद, “महासती मदालसा” आदि # ४.र्य-माइला” (बनारस), रवश्वदृत” (रंगून, बम), “सेना- पति? (कल्कचा), “गन्ना” (सुलतान*'ज, भागलपुर) थादि के ८जीता-प्रचारक महामण्डल” (मो रिशेस)

पूवे सम्पादक, “सनावन-घर्म-मद्दाभण्डल”

के जन्मदावा, (डरबन, दक्षिण अफ्रोका) के संस्थापक खझौर आजीवन सभापति तथा भारत-५भं-भंद्दामएडले (बनारस) के मद्दापदेशक)

जओ मिल # का

प्रकाशग; 5 पे हक 26 पट ललटन्टकेर इंडियन प्रेस (पकित . इन0), लिमिटेड, प्रयाग ५६ ज४ढ

40056 0७0॥०७७६

गुदक--पी० एड० बात, इंब्यिद प्र, ठिपिट॥, पथ

श्रीमाव्‌ ठाकुर कन्हैया सिंह (गहमर, जिला गाजीपुर)

| वशणछ है | ॥)

(22००: 27 अल मे अत

जो उदात-मना, उदार दानी ओर पह्ृदयता की मूर्ति है, जो विद्यायियों, विद्वानों ओर कल्ाविदों के श्राभ्य-स्थल हैं, जो आदशे शासक और आदशे-चरित है, जो वैदिक वाह्मय के परम भक्त थ्ोर राष्ट्रभाषा ईिन्दी क्रे अनन्य अनुरागी ईं,

उ्ने

चत्रिय-कुल-भूषण, परदु:उकावर, परोपकार-अत-निरत, धर्म-प्राण, प्रसक्ष- बदन, भारत प्रकार के आय-कर (इनकम-टंक्स) विभाग के डाइरेक्टर और गहमर (जि० गाजीपुर) के निवासी

श्रीमान ठाकुर कन्हैया सिंहजी के कमनीय कर-कमलों में सप्रेम समपित

--रामगोविन्द >िवेदी

वेद के स्वरूप पर तोन मत-वाद

विद' घातु पे वेद शब्द बना हूँ। लैटिन भाषा में विद धातु को '५0९7०' धातु कहा जाता हू। इसी धातु से अंग्रेजी का ॥0९9& शब्द भी निकला हैं। जेद शब्द के लिए ठीक अंग्रेजी शब्द '|507 है, जिसका अर्थ दर्शन! हूँ जिन्हें यह महान 'दशेन ८आ, उन्हें ऋषि कहा जाता हूं। ऋषि मन्त्र-द्रष्टा हैं। ऋग्वेद के एक मन्त्र (“हिन्दी ऋग्वेद, हि १३३६. मन्त्र ४) में मन्त्र-द्रष्टा' ऋषि का स्पष्ट उल्लेख है एक दूसरे मन्त्र (१३२४.३) में तो और भी स्पष्ट कहा गया हँ--“ऋषियों ने (समाधि-दश्शा में) अपने अन्तःकरण में जो वाक्‌ (वेद-बाणी) प्राप्त की उसे उन्होंने सारे मनृष्यों को पढ़ाया !' ऋग्वेद के प्रख्यात क्रौषीतकि-ब्राह्मण (१०.३०) और एंतरेयब्राह्मण (३.९) नाम के श्रन्थों का भी मत हैं कि वेद-मन्त्र देखे गय हैं॥' बैदिक संहिताओं में ध्रक्‍्तों के ऊपर जिब ऋषियों के नाम थाये जाते हैं, वे मन्त्र-प्रणेता नहीं, मन्त्र-दर्शक हूँ। थास्काचाय ने अपने निरुक्‍्त (नैगम काण्ड २.११) में लिखा ई-- ऋषिदंशंनात स्तोमान दद्श ॥” अर्थात्‌ ऋषियों ने मन्‍्त्रों को देखा) इसलिए उनका नाम 'ऋषि' पड़ा। कात्यायन ने अपने सर्वानिश्रमसूत्र' में छिखा हे-“द्रष्टार ऋषय: स्मरत्तार: ।” आशय यह कि ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा वा स्मर्ता हैं, कर्ता नहीं। कहा जाता हूँ कि “आकाश म॑ व्याप्त नित्य शब्दों को कण्ठ, ताल, जिह्ठा आदि के द्वारा जैसे अभिव्यक्त किया जाता हूँ, बसे ही शब्दमय नित्य बेद को ऋषियों ने समाधि द्वारा अभिव्यक्त वा प्रकट किया ! वेदान्त- दर्शन के शारीरक-भाष्य' (२.३.१) में शंकराचाय ने वेद-नित्यता- प्रतिषपादक अनेक तरक्कों और वचनों को विन्यस्त किया हैं .

ऋग्वेद में एक स्थल (१३५९.९) पर कहा गया ट्ूँ-- सवोत्मक पुरुष (परमेश्वर) के संकल्परूप होम से थुकत मानस यज्ञ से ऋग्वेदादि प्रकट हुए। बुह्ादारण्यकोपनिषद वेद को भगवान वा। ब्रह्म का श्वास मानती है। नित्य वस्तु का वास नित्य हाता ही #; इधलिए वेद नित्य है। यहाँ श्वास का अर्थ ज्ञान भी किया जाता है। फढत: ईश्वर के समान उसका ज्ञान भी नित्य हैं। ऋषियों को तप:पूत त्रमाविदेशञा

( हर; 9)

में ईश्वरीय प्रेरणा मिली, जिससे उनके निर्मल अन्त:करण में वेदमस्ध्रों का अवतरण हुआ।

कहते हैँ, महाप्रल्यावस्था में वेद अव्यक्त रहता है, जिसे सप्टि के आदि में ब्रह्मा प्राप्त करते हें। ब्वेताश्वतरोपनिषद्‌ (६.८) में कहा गया हे--- यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मे ।” अर्थात्‌ जो (परमेश्वर) सृष्टि के आदि में ब्रह्मा को उत्पन्न करता ओर उसके लिए वेदों को भेजता हे ।' वंशब्राह्मण तथा संस्कृत के अनेक ग्रन्थों में यही बात कही गई है। महाभारत, श्रीमद्भागदत आदि ने इस बात का पूर्ण समर्थेन किया हैं।

यह भी उल्लेख मिलता हे कि अजप्रिन ऋषि ने तपोबल से, प्रसाद-रूप में, वेदों को पाया कहीं अंगिरा ऋषि का पाना भी लिखा हुँ। मणिकार के मत से मत्स्य भगवान्‌ के वाबय बेद हैं।

साख्य और योग दर्शनों का मत है कि विद-कर्त्ता का पता नहीं चलता; इसलिए वेश अपौरुष है| न्‍्यायशास्त्र बेद को आप्त और प्रवाह-नित्य मानता हे--कूटस्थ नित्य नहीं। वैशेषिक दर्शन अर्थ-रूप वा शान-स्वरूप वेद को अपीरुषेय मानता हे। यही मत बैयाकरण कैयट का भी है

परन्तु कट्टर नित्यतावादी मीमांसाशास्त्र है। उसका अभिमत है कि वर्णों की उत्पत्ति नहीं होती, अभिव्यक्ति होती है कण्ठ, ताल आदि अभिव्यञ्जक हें, उत्पादक नहीं। मीमांसाकार जेमिनि शब्द के साथ ही शब्दार्थ को भी नित्य मानते हें

आयंसमाज के स्वामी दयानन्द सरस्वती बेद के शब्द, अर्थ, छब्दार्थ-संबंध तथा क्रम आदि को भी नित्य मानते हैं। स्वामीजी का मत हूँ कि वेद में अनित्य व्यक्तियों का वर्णन नहीं है।' प्रक्रति- प्रत्यय के अनुसार चलनेवालछी "पैग्रिक शैली ही आयंसमाज में बेदार्थ करने को उपयुक्त शैली मानी जाती है। स्वामीजी बेद में आये धामों को ऐतिहासिक और भौगोलिक मानकर यौगिक अर्थों में लेते हैं। वे वेद के वसिष्ठ को ऋषि नहीं मानते, वसिष्ठ शब्द का अर्थ प्राण करते हैं। इसी तरह भरद्वाज का अर्थ भन” और विश्वा- मित्र का अर्थ कान! किया गया है। स्वामीजी के मत का समर्थन भनुजो में भी किया हें---

सर्वेदां तु नामावनि कर्माणि पृथक पृथक्‌।

द्

वेदशब्देभ्य एवादो पथक्‌ संस्थाइच निर्मम ॥” (मनुस्मृति १.२१)

३.)

तात्ययें यह हैँ कि बैदिक शब्दों के आधार पर ही संयार के प्राणियों के नाम, कर्म और व्यवस्थापन अलग-अलग किये गये।'

फलत: यह कहा जाता हैँ कि वेद में उर्वशी, पुरुरवा, नहुष, ययाति, यम, सुदास आदि के जो नाम और कर्म आदि कहे गये हें, वे नित्य हैं, नित्य इतिहास हैँ, पौराणिक इतिहास नहीं हैं। पुराणादि ने इन नाम-कर्मादिकों को छेकर इतिहास की रचना कर डाली-- वेद में तो अनित्य इतिहास हैँ और इन नाम-कर्मादि का ऐति- हासिक ताताय॑ ही है इसलिए लछोकोक्‍्त विषय वेद में हे ही नहीं ॥।

बेद का एक नाम श्रुति हे कहा जाता है कि परमात्मा से ऋषियों ने, समाधि-दरशशा में, बेद का 'श्रवण” किया; इसलिए वेद का माम श्रति पड़ा। इसी आन्तरिक ध्यनि को, संसार के कल्याण के लिए, ऋषियों ने विश्व में प्रसारित किया।

शंकराचार्य ने वेदान्तदर्शन (२.३.१) में भरत्यक्ष और अनुमान प्रमाणों का खण्डन फरके शब्द प्रमाण को स्थापित किया हू पाण्ड्‌- रोगवाला व्यतित संसार को प्रत्यक्ष पीछा देखता है और हरा चश्मा- बाला विश्व को प्रत्यक्ष हरा देखता है; परन्तु सारा संसार तो पीछा हैँ और ना निखिल विश्व हरा। इसलिए प्रत्यक्ष-प्रमाण दोष-दुष्ट है। इसी तरह बादल देखकर बृष्टि होने का अनुमान होता हूँ, परन्तु सभी बादल वर्षा नहीं करते पर्वत के वाष्प की धर्जाँ समझ कर आग का अनुमान कर लिया जाता है, जो केवल अभ्रान्ति है। अतएव प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण दूषित हें। वेद और ऋषियों के शब्द ईश्वरीय ज्ञान और योग की प्रक्रिया से विशुद्ध हैं; इसलिए प्रामाणिक हैं। क्षुद्म मानव-बुद्धि अज्ञेय और अनन्त काल के तत्त्वों का कैसे प्रत्यक्ष कर सकेगी और असीम समय के तथ्यों की कैसे अनुमिति करेगी ? इसीलिए गीता में भगवान्‌ कृष्ण ने कहा है---“कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करने के लिए शास्त्र प्रमाण हैं।” (गीता १६. २४)

हमारे रामस्त शास्त्र बेद को नित्य मानते हें। वैदिक साहित्य से छेकर तन्त्रशास्त्र तक वेद-नित्यता का प्रचण्ड उद्घोष करते हूँ थे स्पष्ट कहते है कि विद ईश्वर की ही तरह नित्य है, शाश्वत हैँ, अपौरुषेय है और ऋषियों ने तपःपुत्र अन्तःकरण में बेद को उसी रूप में प्राप्त किया, जिस रूप में--छन्द, वाक्य, शब्द और अक्षर के रूप में--बह इन दिनों उपलब्ध हैँ।' अनेकानेक आर्तिक बेद को हिरण्यगर्भ-((१05797९ 8228 )-सम्भूत कहते हें। बेदिक संहिताओं के प्रसिद्ध भाष्यकार सायणाचायें ने लिखा हुँ---

( ४)

“प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायों बुध्यते। एन विदन्ति वेदेन तस्माद्‌ वेदस्य वेदता।” अर्थात्‌ प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा जो उपाय अगम्य है, उसका उद्बोधन कराने में वेद का वेदत्व हे। मनूजी ने एक स्थान पर लिखा हँ-- “मूतं॑ भव्य भविष्यं चर सर्व वेदात्प्रसिद्यति तात्पय यह हैँ कि भूत, भविष्य और वर्तमान--सब कुछ वेद से ही प्रख्यात हुआ हँ--बेद से ही ज्ञात हुआ हें . इससे विदित होता है कि वेद से भ्रविष्य और वतंमान विषयों का भी ज्ञान होता है। स्वयं ऋग्वेद के मन्त्र (पृष्ठ २९, मन्त्र ११) में कहा गया हँ--- ज्ञानी पुरुष वर्तमान और भविष्य की सारी' घटनाओं को देखते हैं।। फलत: वेद त्रिकाल-सूत्रधर हुँ और ज्ञानी ऋषि भी त्रिकाल« दर्शी और मन्त्र-द्रष्टा हैं। ऋग्वेद के भाष्यकार सायण, वेंकट माधव, उदगीथ, स्कन्‍्द स्वामी, नारायण, आनन्दतीर्थ, रावण, मुद्गल आदि ने भी वेद-नित्यता का प्रबल समर्थन किया हूँ। अनेक शास्त्र शब्दस्फोट, वाक्यस्फोट आदि का सहारा लेकर वेद को नित्य मानते हें मीमांसाकार जैमिनि ने लिखा हे--शब्द सदा रहता है, उत्पन्न नहीं किया जाता। उच्चा- रण के पहले झष्द अव्यक्त रहता है, उच्चारण से व्यक्त होता हे। उच्चारण के अनन्तर भी शब्द रहता हे, अवश्य ही अव्यक्त हो जाता है; परन्तु विनष्ट नहीं होता। इसीलिए ग्रामोफोन के रेकार्ड में भरे हुए शब्द महीनों और वर्षों बाद सुनाई देते हें। शब्द बनाओ' का तात्पर्य दब्द बनाना नहीं हे, ध्वनि करता हें। नित्य शब्द ध्वति के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। जैसे व्योम-स्थित सूर्य को, एक ही समय, अनेक मनृ्‌ष्य, अनेक स्थानों में, देखते हें, वेसे ही नित्य वर्णा- त्मक शब्द को, एक ही समय, अनेक स्थानों में, अनेक मानव सुनते और बोलते हें शब्द के अनित्य रहने पर उसे अभिव्यक्त करन के लिए कोई ध्वनि भी नहीं करता; क्योंकि नित्य और अव्यक्त की ही अभिव्यक्ति होती है--अनित्य की नहीं। कोई भी नहीं कहता कि 'आठ बार शब्द बनाओ।' सब यही कहते हँ कि आठ बार शब्द का उच्चारण करो।' यह अनादि-कारू-सिद्ध व्यवहार भी' स्पष्टतया शब्द की नित्यता बताता हेँ। शब्द का उपादान कारण भी कोई नहीं है। ध्वनि से अभिव्यक्त शब्द ध्वनि से भिन्न हैं। ध्वनि तो केवल अभिव्यंजक हैं और शब्द अभिव्यंजनीय। ध्वनि का ही उपादान कारण वायु

( )

है, शब्द का नहीं। फलतः शब्द नित्य हैं। भ्रम, प्रमाद, इन्द्रिय- दोष, विप्रलिप्सा आदि के कारण मनुष्यादि के शब्द अप्रमाण है और ऋषियों के विमरू अन्त:करण में उतरे वैदिक शब्द दोष-शून्य और प्रमाण हैं।

जैमिनि का मत हुं कि शब्द ही नहीं, शब्द-शब्दाथें और वाक्य- वाक्यार्थ का बोध्य-बोधक संबंध भी नित्य है। यह भी स्वाभाविक हे, सांकेतिक वा कृत्रिम नहीं हैं। शब्द नाम हे, अर्थ नामी हें, शब्द संज्ञा है, अर्थ संज्ञी है, शब्द बोधक हूं, अर्थ बोध्य हैं। यह अनादि-परम्परागत हूँ। ध्वन्यारूढ़ वर्ण, पद, वाक्य सुनने के अनन्तर श्रोता के अन्तः- करण में जो अर्थ-प्रत्यायक ज्ञानमय वर्ण, पद वाक्य उदित होते हें, प्रस्फुरित होते हे, वे ही प्रस्फुरित, अमूत्तं पदार्थ स्फोट होते हैं। स्फोट निराकार वर्ण, पद, वाक्य को प्रतिच्छाया है अथवा स्फोट ही अनादि- निधन और वर्ण, पद, वाक्य नामों का नामी (नामवाला) हूँ। झब्द असंख्य है, अर्थ भी असंख्य हें।

इस तरह अनेकानेक तकों, यूक्तियों और शास्त्रीय प्रमाणों से नित्यतावादी पक्ष वेद की नित्यता का प्रबल समर्थन करता हैँ।

दूसरा मत कहता हैँ कि ईश्वरीय ज्ञान अगाध और असीम है। किसी किसी सत्यकाम प्रोगी को समाधि में इस ज्ञान-राशि के अंश का साक्षात्कार होता हैं। योगी या ऋषि अपनी अनूभति को जिन सब में व्यक्त करता हू, वे मन्त्र हूं। स्फूर्ति दैँवी है; परन्तु शब्द ऋषि

हें।

कहा जाता हैँ कि कोई भी भाषा ध्वनि को प्रकट करने की केवल प्रणाली है और ऐसी श्रणालियाँ वा भाषाएं, विविध देशों में, विभिन्न रूपों में हे। देश-काल के अनुसार विभिन्न उच्चारण-शैलियाँ होती हैं। इनके अनुसार शब्द बनते हैं और मनुष्य इन विविध दाब्दों के विविध अर्थ, अपनी प्रकृति और रुचि के अनुसार, निश्चित करता हूँ। इसलिए कोई भी भाषा नित्य नहीं हो सकती--सारी भाषाएँ और उनके अर्थ मानव-कृत संकेत मात्र हेँ। व्याकरण में शब्द की विकृति (जैसे 'इ' से य' और उ' से 'व' होने से शब्द विकृत होते हें ) होती हैं, और; इस तरह जो शब्द परिवर्तनशील है, बह नित्य हो भी नहीं सकता

यह आएं मत है। इन दिनों इसौ मत का विशेष आ्राधान्य, प्रामुख्य वा प्राबल्य हैँं। नित्यतावादियों से पूछा जाता है कि यदि झज्द- मात्र नित्य हें वो शब्दरप बाइबल, कुरान ओर प्रति दिन गढ़ी जायें-

( )

वाली कजछी, ठुमरी और सवैया भी क्यों नहीं नित्य हें? जब कि न्याय, वेशेषिक आदि शब्द के आधार आकाश (वैज्ञानिक मत से वायु) को ही नित्य नहीं मानते, तब शब्द कैसे नित्य हुआ ? सांख्य- मत से जब प्रकृति की साम्यावस्था में आकाश और वाय्‌ भी नहीं रहते, तब आकाह या वायु का गृण शब्द और शब्द-रूप बेद, छन्दो- रूप में, कैसे रहेगा ?' इसी लिए तो वेद को न्याय कैबल प्रवाह-नित्य

हि]

मानता है. कूटस्थ नित्य नहीं | वैद्ेषिक भी शब्दरूप वेद को नित्य नहीं मानता। योग और सांख्य को वेद-कर्त्ता का पता नहीं चला; इसलिए अपौरुषेय कह दिया--नित्य नहीं वेदान्त भी व्यवहार-दशा में ही बेद को नित्य मानता है; परमार्थ-दशा में तो बेदान्त का केवल ब्रह्म नित्य हे

यह दूसरी बात है कि दैवी शक्तियों की उपासना, सत्याचरण, तपस्या, विविध विद्याओं, विषयों और तक्त्वों का उपदेश वेद में है; दैवी' स्फ्रण है, जानाकर है; इसलिए जञान-रूप वेद नित्य हे। विषय-दृष्टि से वेद अनादि और नित्य हो सकता है; परन्तु शब्द-दृष्टि से तो कथमपि नहीं। अभाव-पूत्ति के लिए मनुष्य भाषाएं बनाता हे ओर भाषाएँ बदला करती हें। तत्सम दशब्द से तदभव शब्द बनते रहते हें। संस्कृत भाषा बदलती-बदलती अपने मूल रूप के अतिरिक्त बँगला, ब्रजभाषा आदि आदि के परिधान में चुकी हैं। स्वयं वेदिक भाषा कितने ही रूप धारण कर चुकी हैे। ऋग्वेद की शाकलरू-संहिता और शुक्ल, यजुर्वेद की माध्यन्दिन-संहिता की भाषाओं में भेद हूँ। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय-संहिता वा मेत्रायणी-संहिता को देखकर कौन कहेगा कि दोनों की भाषा समकालीन है ? द्वापर का अन्त होने पर सूर्य ने याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद की शिक्षा दी। ऐतरेय महिदास को पृथिवी ने ऐसे मन्त्र बताये, जो उन्तके पहले सबको अज्ञात थे। एक वंश के प्रपितामह से लेकर प्रपौत्र तक के मन्त्र वेद की संहिताओं में हैँ। ये सब तो समकालीन हो सकते हैँ और ते इनकी भाषा ही समकालीन हो सकती हैं। फछतः ऋषियों और उनके वंशधरों को विभिन्न समयों में तपोबल से देवी या दिव्य स्फूरत्ति मिली और उन्होंने विभिन्न समयों में विभिन्न भाषाओं में वेद-मन्त्र बचाये।

स्वयं ऋग्वेद-संहिता (शाकल-संहिता वा वत्तंमाव हिन्दी ऋग्वेद”) में तये-नये मनन्‍्त्रों की रचना का अनेक बार उल्लेख है। अभूतपू वस्तु के उत्पादन के अथ में जन, तन्‌, सृजू, तक्ष, कु आदि धा 8 | का प्रयोग होता है इन का का प्रयोग ऐसे स्थानों पर ऐसी हीछी में आया है, जिससे विदित होता है कि ऋषि छोग आवश्यकतानुसार नये-

( )

नये मच्च बनाया करते थे। एक नहीं, अनेक भन्‍्त्रों से ज्ञात होता है कि ऋषि लोग नये-नये मन्त्र बनाते थे कुछ मन्त्र देखिए----'स्तोम॑ जनयामि नव्यम्‌ / (“हिन्दी ऋग्वेद”, पृष्ठ १५३. मन्त्र २)। आशय यह हे कि है इखस्ध और अभ्नि, तुम्हारे सोम-प्रदान-समय में पठनीय नया स्तोत्र बनाता हूँ ।' 'युगे यूगे वितथ्यं मृणदुम्यो रयि यश धेहि नव्यसीम (पृष्ठ ६७२. मं० ५)। अर्थात्‌ प्रत्येक युग में मन्‍्बरात्मक नवीन स्तथ्रोन्र कहनेवाले को, अग्निदेव, धन और यज्ञ प्रदान करो ।/ सायण ने “यगे युगे” का अथ याग-योग्य अग्नि किया हू। शेष एसा ही अर्थ है। ठीक इसौ प्रकार का एक इलोकाद्ध वायुपुराण (५९ अध्याय) में पाया जाता हँ--प्रति मन्वच्तरं चेव श्रुतिरत्या विधीयते।” तात्पयं यह है कि 'प्रत्येफ मन्बस्तर- काछ में दूसरी श्रुति बताई जाती हूँ “ये पूर्व ऋषयों ये नूत्ना इन्द्र श्रह्माणि जनयन्त विध्रा:।” (पृष्ठ ८०१. मन्त्र ९) अर्थात्‌ जितने प्राचीन ऋषि हो गये हैँ और जितने नवीन ऋषि हैँ, सभी, हे इन्द्र, तुम्हारे लिए स्तोज्न उत्पन्न करते हें ।” 'हम इस नवीन स्तुति द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं | (१० ३२५. मं० १)। नये स्तोन्न से स्तुति करता हूँ” (३३६-५)। पूरातत, मध्यतन अधुनातन स्तोत्र” का उल्लेख हे (४००-१३), जिससे ज्ञात होता हो कि तीनों समग्रों में नये मन्त्र बने। ये नवीनतम और शोभन स्तुति-रूप वचन तुम्हारे लिए है” ( (४४७.७ )। नवीनतम' शब्द ध्यान देने योग्य हें। अगल मन्त्र (१०८८.८) में नया सुक्त” तक बनाने की बात दै--सोम, तुम नये और स्तुत्य सूक्‍त के लिए श्षीत्र ही आओ। आगे के मन्त्र (१२०९.२) में तो और भी स्पष्टीकरण हँ--मन्त्र-रचयिताओं ने जिन स्तुति-बचनों की रचना की है, उनका आश्रय करके अपने वाक्य की वृद्धि करो।' फलत: रामय-समय पर मन्त्र बनाये गये हें; वे नित्य नहीं हें। सनातनधर्मियों के प्रामाणिक भाचायें सायण के ही ये मन्त्रार्थ हें।

वस्तुत: वेद में अनन्त कार के अनन्त ऋषियों की अनन्त उच्चतम ओर ज्ञानमयी चिन्ताएं, अनन्त गिरि-निर्भरों को चीरती और प्रतिध्वनित करती' हुई, इकट्‌ठी की गई हें। वेद में ऐसे दिव्य सन्देश, ऐसी मार्मिक और मौछिक चिन्ताएँ भरी पड़ी हें, जिन 30002 सूक्‍त आदि की ) चिन्ताओं के समात, स्व० बाल गंगाधर तिछक के शब्दों में, 'सम्यतम मनृष्य कोई स्वाधीन चिन्तत ही नहीं कर सकता।' वेद उन स्थित-प्रज्ष और परदु:ख- कातर॒ मनीषियों की तेजस्विनी वाणी हे, जो हमारे प्रातःस्मरणीय पूरवज थे। इसी दृष्टि से वेद की महत्ता है और बेद हमारा पृजनीय

..

गुन्थ हूँ।

( ८)

आर्षमत-वादियों का यही मत हे और इस मत के समर्थक और अनुमोदक अनेक शास्त्रीय ग्रन्थ और अनेकानेक तकंनयुक्तियाँ हूँ। यहाँ स्थानाभाव हूं; इसलिए सारी बातें अत्यन्त संक्षिप्त कही गई हैं।

तीसरा मत एऐतिहासिकों का हे। इस मत के वेदाम्यासी इस देश में तो हैं ही. विदेशों में मी बहुत हें। ये ऋषियों को सन्त्र-द्रष्टा, सिद्ध पुरुष और अतिमानव नहीं मानते, साधारणतः मनीषी मानते हें। ये बेद में इतिहास, भगोल, खगोल, साहित्य. राजधम, कृषि आदि को खोजने में विशेष संछग्न रहते हैं। अधिकांश आषंमतवादी इनकी अनेक धारणाओं के पोषक हें। इनके मत से वेदिक काल्‍ में भी भल-बूरे लोग थे---भली- बुरी बातें थीं और इन दिनों भी हूं। य॑ वेद को अद्भूत या दिव्य ग्रन्थ नहीं समझते। ये वेद को संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ तो मानते हें; परन्तु असीरिया क्री कोणाकार लिपि क्री एक खण्डित को भी ऋग्वेद के समकक्ष ला बैठाते हैं! इनकी अतीव संक्षिप्त -सरणि सुनिए। कहते हें---बृहदारण्यकोपनिषद्‌ में जहाँ बेद को ब्रह्म का श्वास बताया गया है, वहीं इतिहास को भी श्वास कहा गया है।' स्मृति में कहा गया है...

“युगान्तेडन्तहितानू वेदान्‌ सेतिहासान्‌ महर्षयः। लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता: स्वयंभुवा ॥”

अर्थात्‌ ब्रह्मा की अनुमति से महंषियों ने, तपस्या के द्वारा, प्रलया- वस्था में छिपे हुए वेदों को, इतिहास के साथ, पाया।

इससे विदित होता कि वेद में इतिहास अनुस्यूत हे। छान्दोग्योप- निषद्‌ और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इतिहास को पञ्चम वेद' माना गया है। वेद के कोष और वेदार्थ करने में व्याकरण से भी अधिक सहायक ग्रन्थ यास्काचायं के निरुक्‍त' ने भी वेद में इतिहास माना है। निरुक्‍त के कई स्थानों मे तत्रेतिहासमाचक्षते”' आया है। निरुक्‍त (२.४) में यास्क ने इषितसेन, शन्तनु, देवापि आदि के इतिहास का उल्लेख किया है। पिजवन-पुत्र सुदास कुशिक-पुत्र विश्वामित्र आदि का भी विवरण यास्क ने दिया है। निरुक्‍त के ३.३ मे थास्क ने प्रस्कण्व को “कण्वस्प पुत्र: लिखा हे। ४.३ में लिखा -- च्यवन ऋषिभंवति।” ९,३ में कहा गया ह--भाम्येश्वों भ्म्यद्वस्थ पृत्र:।” इसी तरह “सन्तपन्ति माम्‌ मन्त्र का अथे लिखने के बाद यास्क ने, सायण की ही तरह, लिखा है--कुएँ में गिरे हुए त्रित ऋषि को इस सूक्‍त का ज्ञान हुआ।' इद्ी मन्त्र के नीचे यास्क ने लिखा है-- तत्र ब्रह्मतिहास-मिश्र॑ ऋछ-मिश्र

( ९)

गाभा-मिश्र॑ भवति ।” अर्थात्‌ इतिहासो, रझचाओं और गायथाओं से मुक्त वेद ।” फलतः यास्क के मत से बेद में इतिहास हें,

ऋग्वेद के सभी प्राचीत भाष्यकार ऋग्वेद में इतिहास मानते हैं। ऋग्वेद का दाशराज्ञयूद्ध प्रसिद्ध इतिहास हैं ; ऋग्वेद में ऋषियों और राजाओं का वंश-विवरण हे अनेकानेक नदियों, समद्रों, नगरों, देशों और प्राणियों के नाम और विवृति है। यजवेंद (३.६१) में शिवजी के धनुष्‌, हाथी की छाल, उनके निवास-स्थान आदि का, पुराणों की तरह, स्पष्ट उल्लेख है शतपथ-ब्राह्मण (१४.५.४.१०) और अथर्बे- वेद में इतिहास को एक कहा माना गयाड़ें ' बस्तुतः वेद में आर्यों के रहन-सहन, खान-पान, भाषा-भाव. समाज-व्यवस्थ। आमोद-प्रमोद, राज्य-स्थापन, देश-विजय आदि विषय है और अतीब संक्षिप्त रूप से इतिहास है

यही ऐतिहासिकों का मत हैँ और इसी मत के समथेक ग्रासमान, लांगलोआ, हिबटने, राथ, मेक्समूलर आदि जर्मन फ्रेंच अँगरेज आदि पावचात््य और भांडारकर. दत्त. राजवाडे आदि एतहेशीय बेदामभ्यासी

सज्जन हें ; वेदा्थं करने की शैली

वेद-स्वरूप बतानवाल उक्त तीन भत-वाद अत्यन्त प्रसिद्ध तो हैं; परन्तु वेद-रहस्य बतानेवाल और भी पक्ष हें। यास्क ने इन नौ मतवादों का उल्लेख किया है--आधिदेवत आध्यात्मिक, आख्यान- समय-परक, ऐतिहासिक, नेदान, नेरुक्‍्त पररिन्नाजक पूवेयाज्ञिक और याजिक। यास्क ने प्राय: एक द्जन 'नरुक्तकारों का भी उल्लेख किया है, जिनमें कइयों के अर्थ-सस्बन्धी विभिन्न मत हेँ। मूल धातु में प्रत्यय, उपसगे र्ूगाकर, सन्धि-विग्रह और आगम परिहार करके तथा शब्द- व्यूत्पन्ति के धारा अनेकानेक वैदिक पदों और शब्दों के अनकानेक अर्थ किये जाते हें। वर्तमान ग्रन्थ के पृष्ठ ५४१ के 8 ये मन्त्र में 'महादेव' शब्द आया हूं, जिसका अर्थ किसी 'सूर्य किया 6, किसी 'यज्ञ',, किसी शब्द ! हिन्दी ऋग्वेद, पृष्ठ २५२. मन्त्र ४५ की व्याख्या सायण और “निरुकत-परिशिष्ट' (१३.९) ने सात प्रकार से की हैं! स्वयं यास्क से अश्विनौ झब्द के चार अर्थ किये हें --स्वगं-मत्यं॑ दिन- रात, सूर्य-चन्द्रमा और दो धर्मात्मा ! इन्द्र शब्द के चार अर्थ किय गये हे--ईव्वर, देव, ज्ञान और विद्युत्‌ ! वृत्र के भो चार अर्थ हे---अज्ञान, सेघ, असुर और असुरों का राजा ! पृष्टिन के भी चार अर्थ हं--मश्तों

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की माता, पृथ्वी, आकाश और सेघ ! गौ दाब्द के तो पाँच अर्थ किये गये हें---गौ, किरण, जलूधारा, इन्द्रिय और वाणी !

यूरोपीय वेदाम्यासियों ने तो और भी सतमाना अर्थ किया हे। कृष्ण यजुवेद की वैत्तिरीय-संहिता (७.१.८.२) में श्रद्धादेव” छाब्द आया है, जिसका सीधा अर्थ श्रद्धालु हे; परन्तु एगलिय ने इसका क्षर्थ दिव-भीए! ((५७०१-००४४ए४९ ) कर डाला हैँ! पीट्सबर्ग लेविजकन” (संस्कृत-जमंन-महाकोष ) के छेखक राथ और बोट्लिंगूक ने अश्व शब्द के तृतीया एक वचन अहवा” का अ्थे कुत्ते के समान! लिख मारा हैं! अदवा का अर्थ हे घीड़े के क्वारा। यही नहीं, हरप्पा' और मोहन जो दड़ो' की खोदाई करानेबवाले और “इंडो-सुमेरियन सील्स डिसाइफर्ड” के लेखक एल० ए० वैडल ने तो इतनी दूर तक लिखा हैँ कि इराक की सुमर जाति (अनाये) ने ही' आरयों को सम्य बनाया। उन के 'एदिन' दाब्द से “सिन्धु' शब्द बना है | सुमेरियत भ्राषा के 'मदगलर शब्द से बेद का 'मुद्गल' शब्द बना है ! इसी प्रकार सुमेरियत कन्‍्व से कण्व, बरम' से ब्राह्मण और 'तप्स' (अक्कद के सगन का मन्‍्त्री ) से दक्ष बना! वेद के पूजा” और 'मीन' शब्द चाल्डियन भाषा के हें! ऋग्वेद के “सचा मना हिरण्यया” में 'मता' ब्रेजीकोनियन शब्द है ! अँगरेजी के 72200 शब्द से वेद का पन्‍्था' दब्द निकला हूँ ! कुछ पाइ्चात्त्य तो यह भी कहते हे कि दिक्षिण अफ्रीका में हजार सिरवाल राक्षस की जो कहानी प्रचलित है, उसी की वकल पर वेद में “सहस्रशीर्षा:” लिखा गया है !” इस तरह अनेक पाइचात्यों ने वैदिक शब्दों के अर्थ का अनर्थ कर डाला है और बहुत-सी वृथा कल्पना-जल्पनाएँ रुच डाली हें! सबके लिखने का यहाँ तो स्थान ही है, आवश्यकता ही + जिन्हें आर्य-धर्म और हिन्दू- संस्क्ृति में केवल छिद्र ही ढू ढ़ने हें, वे तो ऐसी ऊटपटाँग बातें करेंगे ही। वस्तुतः वेदिक साहित्य को हीन बताने के छिए ही कितने ही विदेशी' विद्वान्‌ वैदिक साहित्य के पीछे पड़े थी। मैकडानल ने अपने ४८०॥८ 77070]0279” के प्रथम पृष्ठ में ही आर्यों को 'असभ्य' और “बबेर' बना डाला हैं! 'जेसी समझ, बसी करनी” ठीक ही है। और, पक्षपात का चदमा पहननेवालों से निष्पक्ष अर्थ करने तथा यथार्थ विषय उपन्यस्त करने की आशज्या ही कैसे की जा सकती है ?

पक्षपात का चद्मा कुछ भारतीय विद्वानों ने भी छगाया हें। भेद इतना ही हैँ कि पाइ्चात्त्यों ने जहाँ तृतीय श्रेणी का चश्मा लगाया है, वहाँ भारतीयों में से कुछ ने द्वितीय श्रेणी का चश्मा रूगाया है और कुछ ने प्रथम श्रेणी का। राजेद्धलाल मित्र, के० एम० बनर्जी और रमानाथ

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सरस्वती की वेदिक आछोचनाएं पढ़ने पर तो कभी-कभी यह सन्देह होने लगता हैँ कि क्‍या ये भी मैकडानल के सहयोगी थे ?

हमारे यहाँ चतुर्वेद स्वामी ने भी ऋग्वेद ऊुछ अंश पर भाष्य लिखा हैँ इन्होंने ऋग्वेद के एक ही मन्त्र ((० १४०१.४) से इतने विलक्षण अर्थ निकाछे हँ--पूतना और कंस का बब, गोब<>ुग-बारण और कौरब-पाण्डव-युद्ध ! प्रसिद्ध वेद-विद्यार्थी छा० बी० जी० रेले ने “पृ प८तका८ 5045" नाम की एक पुस्तक छिखी' है, जिसमें उन्होंने समस्त देवत संज्ञाओं (देव-तामों) को द्वयर्भंक और नाचार्थक' सिद्ध करने की चेष्टा की हैं!

परन्तु किसी भी ग्रन्थ का एक प्रतिपाद्य होता हे, एक उद्देश्य होता है। यह बात कोई भी नहीं कह सकता कि बादरायण व्यास को वेदान्त- सूत्र की अद्वैतवाद, द्वेतवाद, द्वेत्माद्नेतवाद, विशिष्टाद्रेतवाद और विशुद्धाईल- वाद आदि की सभी व्याख्याएँ अभीष्ट थीं उन्हें तो केवल एक ही व्याख्या अभीष्ट रही होगी, उनका एक ही श्रतिपाथ अभीष्ट रहा होगा, फिर चाहे वह ह्वेतवादी हो, अद्वेववादी हो या जो हो। इसी तरह मन्न्र-प्रणेता ऋषि को भी एक ही अर्थ अभीष्ट रहा होगा; परू] व्यास्याक।रों ने अपने उपयुक्त वा अनुपयुक्त मत की पुष्टि के छिए मनमाने अर्थ कर डाले!

हजारों वर्षों से एक दूसरे से, दूसरा तीसरे से, तीसरा चौथे से सुन- सुनकर वेद-मन्त्रों को कण्ठस्थ करते आते थे। इस तरह हजारों मुखों और मस्तिष्कों से छतकर कुछ मन्त्र-पाठ और मन्त्रार्थ विक्ृत हो चले हैं। लिपिकारों की अज्ञता, अल्पज्ञता, प्रमाद, पन्‍क्षपात आदि के कारण भी कई मन्त्र और उनके अर्थ विकृत हो गये हे ये ही कारण हैं कि पद, क्रम, जठटा, माला, शिखा, लेखा. ध्वजा, दण्ड, रथ और घन (विक्ृत- वल्‍ली १.५) में आबद्ध करने पर भी अनेक वेद-मन्त्रों के पाठान्तर हो गये, एक ही मन्त्र, दो-एक शब्द इधर-उधर करके, दुबारा लिखा गया और अनेक मन्त्रों के शब्द इतने विक्वत हो गये कि उनका शुद्ध पाठ और भअर्थ-ज्ञान दुर्बोध और अज्ञेय हो रहे।

वेद-मन्त्रों के कुछ ऐसे शब्द हें, जिनका अथे-ज्ञान नहीं होता। ऐसे शब्दों का परिगणन निधण्टु में किया गया है। कुछ ऐसे शब्द है, जिनका अर्थ ढूँढ़-डाँढ़कर धात्वर्थ या बिकृत रूप से या वाक्य में स्थान देखकर अथवा जिन वाक्यों में उनका प्रयोग हैं, उनकी तुलना करके निश्चित किया जा सकता हूँ। परन्तु वै हा शब्दों का एक बड़ा समूह ऐसा है, जिसका क्षय निश्चित रूप से ज्ञात होता है अथवा जिसका भर्थ निर्वेचच के अनुसार किया जा सकता हूँ। बहुत से ऐसे वैदिक

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दाग्द हैं, जिनका अर्ण परम्परा से प्राप्त है। परम्परा से प्राप्त अर्थे छत्यन्त प्रामाणिक माना जाता है।

यास्क ने तीन ऐसे साधन बताये हैँ, जिनसे मन्त्रों का अर्थ जाना जा सकता है--१ आचार्यों से परम्परया सुने हुए ज्ञान-प्रन्थ, तर्क भौर गम्भीर मनन। तक का तात्पयं हे वेदान्त-दर्शन आदि से। वेदान्त- सूत्र के अपने भाष्य में शंकराचार्य से इन साधनों से अनेक मन्त्रों का अर्थ-निर्णय किया भी हूँ।

इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मण-ग्रन्थ, निरुक्‍त, प्राति-शाख्य, कल्पसूत्र भादि की सहायता से बहुत कुछ मन्त्रार्थ मौलिक रूप में सुरक्षित हे। गम्भीर मनन, प्रकरण, प्रसंग और वेदार्थ करनेवाले प्राचीन-परम्परा- प्राप्त आधार-पग्रन्थों से असन्दिग्ध अर्थ-निर्णय किया जा सकता है। अमर- कोष रटनेवाले छात्र को भी तनूनपात्‌, जातवेदस्‌ , वेश्वानर आदि वैदिक शब्दों का “अग्नि” अर्थ परम्परया ज्ञात हो जाता है। उपनिषद , आरण्यक, पुराण, धर्म-शास्त्र आदि परम्परा-प्राप्त अर्थ के आधार हें; इसलिए वेदार्थं करते समय इन सबसे भी सहायता लेनी चाहिए। परम्परा-गत अर्थ को छोड़कर केवल यौगिक अर्थ करना यथेष्ट भयावह है। गौ का यौगिक अर्थ हूँ चलनेवारा परन्तु यदि किसी चलनेवाले मनृष्य को गो कहा जाय तो वह युद्ध ठान बैठेगा ! इसी से कहा गया है--.. रूढ़ियों- गादू बलीयसी” अर्थात्‌ यौगिक, वाच्यार्थ, व्युत्पत्ति-लम्य अर्थ से रूढ, प्रचलित और स्वीकृत अर्थ बलवत्तर हँँ। इसलिए केवल यौगिक अर्थ का अनुधावन करना अनुपयुकत है।

भाष्यकार सायय

वेद-भाष्यकारों में सायण महाप्रतिभाशाली थे। वे विजयनगर के राजा बुक्क (प्रथम), संगम (द्वितीय) और हरिहर (तृतीय) के मन्सत्री थे। उन्होंने चम्प-नरेन्द्र को पराजित किया था। सायण १४वीं छाती में थे और ७२ वर्ष की अवस्था में स्वर्गवासी हुए थे। उन्होंने अनेक उद्भट विद्वानों के सहयोग से चारों वेदों की संहिताओं पर महत्त्व-पूर्ण भाष्य लिखा था। उनके प्रधान सहयोगी नरहरि सोमयाजी, चारायण वाज- पेययाजी और पंढरी दीक्षित थे।

सबसे पहले सायण ने क्रष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय-संहिता पर भाष्य लिखा। पश्चात्‌ ऋग्वेद (शाकरू-संहिता), शुक्ल यजूवेंद ( काण्वसंहिता ), सामवेद (कौथुमसंहिता) और अथवेबेद (शौनकसंहिता) पर भाष्य' लिखा। सायण ने सामवेद के असिद्ध आठ ब्राह्मण-प्न्थों, ऐतरेय-ब्राह्मण,

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तैत्तिरीय-ब्राह्मण, शतपथब्राह्मण, गोपथब्राह्मण, तैत्तिरीयारण्यक, ऐतरेया- रण्यक, ऐतरेयोपनिषद्‌ तथा सामप्रातिशाख्य पर भी भाष्य लिखा हैँ मन्त्रित्व का दुरूह कार्य करते हुए भी सायण ने ये भाष्य लिखे और अन्य पाँच मौलिक ग्रन्थ भी लिखे, यह देखकर सायण की अद्भुत प्रतिभा पर संसार के बड़े-बड़ मनीपी मुग्ध हो जाते हैं।

यों तो ऋग्वेद पर अनेक भाष्य हें; परन्तु सब खण्डित हें वेंकट माधव का “ऋगर्थदीपिका” जाम का भाष्य आधा छप चुका है; आधा देंष है। परन्तु यह भाष्य भी यत्र-तत्र खण्डित है और अत्यन्त संक्षिप्त हैँ किन्तु पायण-भाष्य पूर्ण ६, विस्तृत हँ और वेद-विज्ञान की ज्योति पाने के लिए समस्त विश्व में एक मात्र आधार है। सायण का ऋग्वेद- भाष्य सर्वप्रथम विजयनगर में ही छपा।

ऋग्वेदीय मन्त्रों के कहीं आध्यात्मिक, कहीं आधिदेविक तथा कहीं आधिभौतिक अर्थ हैँ। सायण ने यथास्थान तीनों ही अर्थों को लिखा है। ऋग्वेद में कहीं समाधि-भाषा, कहीं परकीय भाषा और कहीं लौकिक भाषा का प्रयोग है और सायण ने यथास्थान तीनों का ही रहस्य बताया है। जहाँ जिस भाषा और जिस वाद का कथन है, वहाँ उसी का उल्ठेख करके सायण ने अथ-समन्वय किया है। अतएवं यह घारणा ठीक नहीं कि सायण ने केवल 'अधियज्ञ' अर्थ किया हूँ।

१. सायण ने सर्वत्र प्राचीन-परम्परा-प्राप्त अर्थ किया है। सारे संस्कृत-साहित्य को मथकर सायण ने प्राचीन परम्परा और मर्यादा का पालन किया हैं

२. स्कन्द स्वामी, वेंकट माधव, उदगीथ, भट्ट भास्कर, भरत स्वामी, कपर्दी स्वामी आदि सभी प्राचीन भाष्यकारों के अनुकूल ही सायण- भाष्य है।

३. समस्त वैदिक साहित्य, लौकिक साहित्य और आर्य-जाति के आचार-विचार से सायण-भाष्य का समर्थन होता है।

४, विदव की विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित वेद-सम्बन्धी भ्रन्थों के प्रणेता प्रायः सायणानुयायी हैं।

५. सनातन-घधर्मानुयायी सदा से सायण-भाष्य को आये-जाति की संस्कृति, सम्यता और रीति-नीति का अनुयायी मानते हैं।

६. सायण-भाष्य के अतिरिक्त ऋग्वेद पर किसी का भी भाष्य पूर्ण नहीं है; इसलिए सायण-भाष्य के अभाव में ऋग्वेद का तो सम्यक्‌ अर्थ-प्रहण होता, राथ की “पीटसंबर्ग छेक्जिकन” नाम की कोष-पुस्तक ही बन पाती और ग्रासमान का वैदिक कोष” ही छिखा जाता।

फा०

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इन्हीं सब कारणों से इस “हिन्दी ऋग्वेद” में सायण-भाष्य के अनुसार ही मन्त्रार्थ किये गये हें। मन्व्रार्थों के साथ मन्धों को इसलिए नहीं प्रकाशित किया गया हैँ कि हिन्दी-पाठक तो क्‍या, जो संस्कृत के विद्वान्‌ ब्राह्मण-ग्रन्थ, निरुक्‍्त, प्रातिशाख्य आदि का सविधि स्वाध्याय नहीं कर चुके हैं, वे भी ऋग्वेद के एक मन्त्र का भी यथार्थ अर्थ नहीं समझ पाते। मूल ऋग्वेद-संहिता अछुगर प्रकाशित है। जो पाठक चाहेंगे, वे उसे छेकर देख सकेंगे। भाषानुवाद के साथ मन्‍्त्रों का प्रकादन इस लिए भी नहीं किया गया कि वत्त॑मान ग्रन्थ का हे अधिक हो जाता ओऔर साधारण पाठक उसे खरीदने में असमर्थ हल रहते

ऋणगेद में १० मण्डल, १०१७ सूक्‍्त और १०४६७ मनन हें। प्रत्येक मण्डल में कितने ही सक्‍त और अर क्त में कितने ही मन्त्र हें। किसी भी मन्त्र का उल्लेख या उद्धरण समय मण्डरू, सृक्‍त और मन्त्र की संख्या लिखने की परिपाटी है परन्तु यहां ओर विषय-सूची में पाठकों के सुभीते के लिए इस “हिन्दी ऋग्वेद” के 8 ओर भन्‍्त्रों की ही संख्याएँ दी गई है। इस क्रम से मन्त्र देख छेने पर पाठक सरलता से मण्डल, सुक्‍्त और मन्त्र खोजकर विकालछ सकेंगे।

ऋग्ेद का निर्माण-काल

ईसाइयों की धर्म-पुस्तक बाइबल के अनुसार मनुष्य-जाति का इतिहास अधिक से अधिक ८००० वर्षो का है। इसी के भीतर पादचात्त्य वेदाध्यायियों को सब कुछ घटाबा था। इसलिए अधिकांश पादचात्त्य और उनके एतदेशीय अनुयायी ऋग्वेद का विर्माण-समय ३५०० से ४००० वर्ष तक मानते हू।

कल्पसूत्रों के विवाह-प्रकरण में “ध्रुव इव स्थिर भव” वाक्य आता हैं। इस पर जर्मन ज्योतिषी जैकोबी ने लिखा हे कि 'पहले श्ुव ( तारा) अधिक चमकीछा और स्थिर था। यह स्थिति आज से ४७०० वर्ष पहले थी। इसलिए कल्पसूत्रों के बने ४७०० वर्ष हुए। ग्रहों कर नक्षत्रों की आकाशीय स्थिति के आधार पर जैकोबी ने ऋग्वेद का रचना-काल ६५०० वर्षों से भी अधिक सिद्ध किया है।

सिकन्दर के समय ग्रीक या यूनानी विद्वानों ने जो यहाँ की वंशावली संगृूहीत की थी, उसके अनुसार चन्द्रगुप्त तक १५४ राजवंश ६४५७ वर्षों तक भारत में राज्य कर चुके थे। इन सारे राजवंशों से बहुत पहले ऋग्वेद बन चुका था। इस तरह ऋग्वेद का रचना-काल ८००० वर्षों का कहा गया है।

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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने विदेशियों का अन्धानुकरण करके स्वयं वेद का काछान्वेषण किया। उनके मत से ऋग्वेद के ऐतरेय और यजुर्वेद के शतपथ नामक ब्राह्मण-प्रन्थों के समय कृत्तिका नक्षत्र से नक्षत्रों को गणना होती थी। उन दिनों कृत्तिका नक्षत्र में ही दिन-रात बराबर (४८४००! >4०५४०5) होते थे। आजकल अश्विनी से नक्षत्र- गणना होती है और २१ मार्चे तथा २३ सितम्बर को दिन-रात बराबर होते हें। खगोछल और ज्यौतिष के सिद्धान्तानुसार यह परिवर्तन आज से ४५०० वर्ष पूवे हुआ। इसलिए ४५०० वर्ष पहले ब्राह्मण-प्रन्थ बने

मन्त्र-संहिताओं के समय नक्षत्रों की गणना मृुगशिरा से होती थी और मृगद्विरा में वसन्त-सम्पात होता था। खगोल और ज्यौतिष के अनुसार आज से ६५०० वर्ष पहले यह स्थिति थी। छोकमान्य के मत से सारे सल्त्र एक साथ नहीं बने। ऋषियों और उनके वंशधरों ने समय-समय पर, हजारों वर्षों में, मन्त्र बनाये इस तरह कुछ ऋचाएँ दस हजार वर्षों की हैं; कुछ साढ़ें आठ हजार वर्षों की और कुछ सात साढ़े सात हजार वर्षो की हं। सभी प्राचीनतम ऋचाएं (मन्त्र) ऋग्वेद की ही हे।

नारायण भवानराव पावगी ने भूगर्भशास्त्र के प्रमाणों के आधार पर ऋग्वेद का निर्माण-काल ९००० वर्षों का प्रमाणित किया है। डा० सम्पूर्णानन्द ने आयों का आदि देश” नाम का ग्रन्थ लिखा है। जहाँ पाश्चात्त्यों ने आरयों का आदि निवास एशिया माइनर और लो० तिलक ने उत्तरीय प्रुव-अदेश प्रमाणित किया है, वहां सस्पूर्णानन्‍दजी ने ऋग्वेद के अनेक मन्‍्त्रों के अन्तःसाक्ष्य से 'सप्त सिन्धव' सिद्ध किया है। उन दिनों इसके उत्तर, दक्षिण और पूर्व में समुद्र थे। उन दिनों जहाँ यह भू-खण्ड था, वहाँ आजकल कश्मीर की उपत्यका, राजपुताना और उत्तर प्रदेश अवस्थित हैँ उन दिनों समुद्र में से हिमालय ऊपर उठ रहा था, पृथ्वी में बराबर प्रकम्प आते रहते थे और पर्वत चंचल थे। इस स्थिति का वर्णन आर्यों ने इस मन्त्र ( पृ० ३०५. म० २) में किया हँ--मनृष्यो, जिन्होंने व्यथित (कम्पित) पृथ्वी को दृढ़ किया हे, जिन्होंने प्रकुृषित (चंचल) पव॑तों को नियमित (शान्त) किया है और जिन्होंने दुछोक को निस्तब्ध किया है, वे ही इन्द्र हें। भूगर्भ-शास्त्रियों के मत से यह अस्थिर अवस्था २५ हजार वर्ष से लेकर ५० हजार वर्ष के बीच की हैं इस अवस्था को थार्यों ने अपनी आँखों देखा था। इससे विदित होता है कि कुछ मन्त्र कम से कम २५ हजार वर्ष के पूर्व के हें। यही नहीं, ऐसे अनेक मन्त्र हें, जो 04 भूग्भ ओर के विषयों का ऐसा विवरण देते हे, जैसा केवल

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प्रत्यक्षर्शी ही दे सकता है। ऐसा ही विवरण एक मन्त्र (१३४२.१३) में है। इससे ज्ञात होता हे कि उन दिलों सिंह राशि में सूये की उत्तरायण गति का आरम्भ होता था। इन दिनों मकर राशि में होता है, जो चार महीने पीछे आती है। आज से १८ हजार वर्ष पहले मन्त्रोल्लिखित दक्षा थी। ऋग्वेद में ऐसे अनेकानेक मन्त्र हें, जिनसे सिद्ध होता है कि ऋग्वेद का निर्माण-कार १८ हजार वर्ष से लेकर ५० हजार वर्ष के बीच का है यह बात अवश्य हँ कि सभी मन्त्र इतने प्राचीन नहीं हें हि ऋणवेद के एक मन्त्र (१४२९.५) में पूर्व और पश्चिम--दी समु का उल्लेख है। दो मन्त्रों (११०४.६ और १२८५.२) में चार समुद्रों का उल्लेख है। ये चारों समुद्र उपरि लिखित आर्य-निवास की चारों दिद्ञाओं में थे। ४०१.२ से विदित होता हें कि विपाश (व्यास) और शुतुद्री (सतलूज) नदियाँ समुद्र में गिरती थीं। यह दक्षिणी समुद्र था। / वएुटां4] (०३:८(९९४ 04 फितां4/ (प्रथम भाग) से मालम होता है कि भूगर्भ-शास्त्रियों ने इसका ताम “राजपूताना समुद्र” रखा था | यह अरबली पर्वत के दक्षिण और पूर्व भागों तक फैला था। आज भी राज- पूताना के गर्भ में खारे जल की झीलें (साँभर झ्षीछ आदि) और नमक की तहें यह बात बताती हें कि किसी समय राजपूताना समुद्र की लहरों से प्लावित होता था। पश्चिमी समुद्र तो अब तक हे ही। पूर्वी समुद्र पंजाब से पूर्व गांगेय प्रदेश था। उत्तरी समुद्र कहाँ था ? “##0ए2]09०व४४ 8:0#77९०” (प्रथम भाग) से जाना जाता है कि बलख और फारस के उत्तर एशिया में एक विशाल समुद्र था, जिसका नाम मूगर्भशास्त्रियों ने 'एशियाई मेडीटरेनियन' (एशियाई भूसध्य सागर) रखा था। उत्तर में इसका सम्बन्ध आर्कटिक महासागर से था। इसके पास ही यूरोपीय भूमध्यसागर था। एशिया- वाले का तल ऊँचा था और यूरोपवाले का नीचा। जब पृथ्वी के परिवत्त॑नों ने वासफरस का मार्ग बना दिया, तब एशियाई समुद्र का जलू यूरोपीय समुद्र में पहुँच गया और एशियाई समुद्र विनष्ट हो गया। भूगभे- वेत्ताओं के मत से अब इसके कुछ अंश झीलों के रूप में सूखकर रह गये हैं, जिन्हें इन दिनों ऋृष्णछ॒द (89८: 5८७), काइ्यपहदू ((७8- [2०870 5९9 ), अरालक्ूद्‌ (5८2 0 0:9]) और बलकाश हद (॥.2]:० 24&295/) कहा जाता है। ये ही उत्तरी समुद्र थे। इन चारों समद्रों में घूम-बूमकर आये लोग व्यापार किया करते थे (७८.२) एच० जी० वेल्स और भूगर्भ-विद्या के विद्वानों के मत से इन चारों समद्र / का अस्तित्व

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पच्बास हजार वर्ष से लेकर पचहृत्तर हजार वर्ष के भीतर था। इस प्रमाण

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से तो ऋग्वेद के मन्‍्त्रों का निर्माण-काल पचहृत्तर हजार वर्ष तक जा पहुँचता हैं। यह मत डा० अविनाशइन्द् दास का है।

वेद के प्रतिपाद्य, उपदेश, संस्कृति, अपूर्वता आदि पर विचार कर पादचात्त्यों ने काल-निर्णय पर ही अधिक माथापच्ची की हे। परन्तु भूगर्भशास्त्रियों से समर्थित अन्यान्य प्रमाणों को देखकर जमंन वेदाध्यायी श्लेगलक ने लिखा हूँ कि वेद संसार में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हें। इसका समय नहीं निश्चित किया जा सकता। इनकी भाषा भारतीयों के लिए भी उतनी ही कठिन है, जितनी विदेशियों के लिए।! दूसरे जर्मन वेद-विद्यार्थी वेबर ने लिखा है--'वेदों का समय निश्चित नहीं किया जा सकता। ये उस तिथि के बने हुए हें, जहाँ तक पहुँचने के लिए हमारे पास उपयुक्त साधन नहीं हू वर्तमान प्रमाण-राशि हम लोगों को उस समय के उन्नत शिखर पर पहुँचाने में असमर्थ है ।' यह उन बेवर साहब की राय हूँ, जिन्होंने वेदाध्ययन में अपना सारा जीवन खपा डाछा था।

परन्तु जो वेद-नित्यतावादी हैं, उनके लिए तो काल-निर्णय का प्रश्न ही नहीं हे।

ऋग्वेद-संहिता

छन्दों से युक्त मन्‍्त्रों को ऋक (ऋचा) कहा जाता है। बेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। ऋचाओं का जो ज्ञान है, उसे ऋग्वेद कहते हैं। ऋचा-विषयक ज्ञान चराचर-व्यापी हैं।

गुप्त कथन का नाम मन्त्र हैं। देवादि-स्तुति में प्रथुक्त अर्थ का स्मरण करानेवाले वाक्य को भी मन्त्र कहा जाता हैं जैसे औषध में रोग को दूर कर नौरोग करने की स्वाभाविक शक्ति होती हूं, वैसे ही मन्त्र में सारी विध्त-बाधाओं को दूर कर दिव्य शक्ति और स्फूर्त पैदा करने की स्वाभाविक शक्ति है जैसे चुम्बक में लछौहा- कर्षण की स्वाभाविक शक्ति हे, वसे ही मन्त्र में फल देने की, स्वर्ग मोक्ष आदि देने की और मनःकामना पूर्ण करने की स्वाभाविक दा हं। मन्त्र की यह अदभुत शक्ति संसार में प्रति दिन देखी जाती है

मन्‍्त्रों का उपयुक्त प्रयोग और व्यवहार होने पर जगत में ऐऐ प्रकम्प होते हैं जिनसे प्रसुप्त-अव्यक्त शक्ितयों में से कोई एक विद्ये७ शक्ति जागरित और अभिव्यक्‍्त होती है। उस शक्ति को लो/ मन्त्र-देवता कहते हँं। जहाँ यह कहा गया हो कि अमुक सन्‍्हत्रों के

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या सूकत के देवता इन्द्र हैं, वहाँ यह समझना चाहिए कि उन मन्त्रों या सुक्‍त के यथा प्रयोग से ऐन्द्री शक्ति जागरित होती हूँ और सन्‍्त्र अपना फल देते हैं। इन्हीं मन्त्रों के समुदाय या सग्नह का नाम संहिता है। “ऋग्वेद-संहिता” का संक्षिप्त आशय यही है।

संस्कृत-साहित्य के अनेक ग्रन्थों से ज्ञात होता हैँ कि ऋग्वेद की २१ संहिताएँ या शाखाएँ हैँ। परन्तु इन दिनों केवल एक “शाकल- : संहिता” ही उपलब्ध हे। देश-विदेश में यही छपी है और इसी का अनु- वाद विविध भाषाओं में हुआ हे। चारों वेदों की ११३१ शाखाओं में से इस समय केवल ये साढ़े ग्यारह संहिताएं ही प्राप्त और प्रकाशित हं---ऋग्वेद की शाकल, कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय, मैत्रायगी और कठ, शुक्र यजुर्वेद को माध्यन्दिन और कण्व, सामवेद की कौथुम, राणायणी और जैमिनीय तथा अथरववेद की शौनक और पैप्पलाद कृष्ण यजुर्वेद की कठ-कपिष्ठक-संहिता भी आधी मिली हैँ और प्रका- शित भी हो चुकी हं यह तो सर्व-विदित है कि यजुर्वेद के कृष्ण और शुक्ल नाम के दो भेद हें। इन समस्त संहिताओं में शाकरू-संहिता सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण हे। इसी संहिता का हिन्दी-अनुवाद “हिन्दी ऋग्वेद” हे। यह ग्रन्थ वैदिक वाडम्मय का मुकुट-मणि है।

इसी शाकल-संहिता के मन्‍्त्रों से सामवेद की कौथुम-संहिता भरी पड़ी है--कैवलछ ७५ मन्त्र कौथुम के अपने हें। अथर्ववेद की शौनक- संहिता में शाकल के १२०० मन्त्र पाये जाते है शौनक के २० वें काण्ड के सारे मन्त्र (कुन्तापसूक्त और दो अन्य मन्त्रों को छोड़ कर) शाकल के हें। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय-संहिता में भी शाकल के बहुत मन्त्र हें। इसीलिए कहा जाता है कि 'शाकल-संहिता के अन्त- ग्ेत प्राय: अन्य तीनों वेद हें और इसके सविध स्वाध्याय से प्रायः चारों वेदों का अध्ययन हो जाता है ।” बहुत दिनों से यह परिपाटी चली रही है कि केवछ ऋग्वेद कह देने से ऋग्वेदीय शाकरू-संहिता' का बोध कर लिया जाता है। ऋग्वेद की कोई अन्य संहिता मिलती भी नहीं। ऋग्वेदीय संहिताओं के नाम तो २१ ही नहीं, विविध प्रन्थों में ३४ तक मिलते हें; परन्तु आज तक यह॒निश्चय नहीं किया जा सका कि ये नाम संहिताओं के हे या संहिताभाष्यकारों, निरुक्‍्तकारों, प्रातिशाख्यकर्त्ताओं , पद-पाठ-कारों अथवा अनुक्रमणीकारों के हें

इस शाकल-संहिता के दो तरह के विभाग किये गये हे--(१) प्रण्डल, अनुवाक और बर्ग तथा (२) अष्टक, अध्याय और सूक्‍त। सारी संहिता में १० ण्डल, ८५ अनुवाक, २००८ वर्ग (बालखिल्य

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कै कि | को छोड़कर), अष्टक, ६४ अध्याय और १०१७ सूक्‍त हें। के एक मन्त्र (पृष्ठ १४०३. मन्त्र ८) से ज्ञात होता हे कि इसमें सब १५००० भन्‍न्त्र हें; परन्तु गणना करने पर १०४६७ ही मन्त्र पाये जाते हे। संभव है, वैदिक साहित्य की यु की एक विशाल राशि जैसे नष्ट हो गई और वेद-धमं-द्रोहियों के द्वारा विनष्ट कर दी गई, उसी तरह मन्त्र भी, कई कारणों से, नष्ट हो गये।

शौनक ऋषि की “अनुक्रमणी' के अनुसार तो ऋग्वेद में १०५८०॥॥ भन्‍त्र, १५३८२६ शब्द और ४३२००० अक्षर हें औसतन प्रत्येक हक में १० मन्त्र और प्रत्येक मन्त्र में अक्षर हैं। परन्तु मन्त्रों, शब्दों और अक्षरों की गणना करने पर अनुक्रमणी' की संख्याएं नहीं मिलती |

ऋग्वेद में केवल दो चरणवाले १७ और केवल एक चरणवाले मन्त्र हैं। स्वर वर्णों पर ३५८९, कवर्ग पर ४०७, चवर्गे पर १४२, तबरग पर १८३३, पवर्ग पर १३७७, अन्तःस्थ अक्षरों पर १७३३ और ऊष्म अक्षरों पर १३१५६ मन्त्र हैं

ऋग्वेद के १० मण्डलों में से द्वितीय मण्डल के ऋषि गृत्समद, तृतीय के विश्वामित्र , चतुर्थ के वामदेव, पंचम के अशञ्रि, षष्ठ के भरद्वाज भौर सप्तम के वसिष्ठ तथा इन ऋषियों के वंशधर और इनके शिष्य-प्रशिष्य है। आश्वलायन ने प्रगाथ-परिवार को अब्टम का ऋषि माना है। परन्तु घड्गुरु-शिष्य ने प्रगाथ को कण्व ही माना हें। नवम मण्डल के अनेक

हूँ। आश्वकायन के मत से दशम मण्डल के श्रद्षि 'क्षुद्रसूक्त' और 'महासूक्त' हें। परन्तु यह बात ठीक नहीं दशम मण्डल के ऋषि और उनके वंशज अनेकानेक हेँ। प्रथम मंडरू के २३ ऋषि हैं। प्रायः सभी ऋषि ब्राह्मण थे।

ऐतिहासिक कहते हैं कि इन सूचों के ऋषि क्षत्रिय थे--पृष्ठ १९५४ से १२६१. सूकत ३० से ३४ ईलुष-पुत्॒क कवबष, पृ० १३६०. स्‌ू० ९१ बैतहत्य अरूण, पृ० १३३८. सू० ९५ पुरुरवा, १४२५. सू० १३३ पिजवन- पूत्र॒ सुदास, १४२६. हि १३४ युवनाइव-पुत्र सान्धाता आदि। पृष्ठ १२८३- सू० ४६ के भालनन्दन वत्सप्रि वैद्य कहे जाते हें और पू० १४५६. सू० १७५ के ऋषि अर्वुद-पुत्र ऊद्धेंग्रावा शुद्र। परन्तु यह विषय अभी संदिग्ध है। कितु इसमें संदेह एहीं कि इन सूक्‍तों की ऋषिकाएँ स्त्रियाँ हूं---पु० १२७०-७४. सूक्त ३९ और ४० बहा- वादिनी घोषा, २७२. १७९ छोपाम्‌ द्रा, १०४६.८० अशन्निपुत्री अपाला, "७२-२८ अजिगोत्रोटान्ना विश्वावारा, १३४१. ८५ सूर्या, १३९५. १०९

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ब्रह्मगादिनी जुह, १४४३. १५४ विवस्वान्‌ की पुत्री यमी आदि। जिस सूक्‍त का जो ऋषि हे, उसका नाम सूक्त के ऊपर रहता देववा, ऋषि, छनन्‍द ओर वििये:

प्रत्येक सूक्‍त के ऊपर ये चारों सज्ञाएं लिखी रहती हें। लाघव के लिये हिन्दी ऋग्वेद” में तीन दी गई हूँ वेदार्थ-ज्ञान के लिए इन चारों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। बह॒द्वेवता” में लिखा है

“अविदित्वा ऋषि छन्‍्दो देवत्वं योगमेव योष्ध्यापयेत्‌ जपेद्‌ वापि पापीयान जायते तु सः॥

अर्थात्‌ ऋषि, छनन्‍्द, देवता और विनियोग को जाने विना जो मन्त्र पढ़ता वा जपता है, वह पापी हैं।

दौनक की “अनुक्रमणी' (११) में कहा गया हें---जो इन चारों का ज्ञान प्राप्त किये विना वेद का अध्ययन, अध्यापन, हवन, यजन, याजन आदि करते हूँ, उनका सब कुछ निष्फल हो जाता हे और जो ऋष्यादि को जानकर अध्ययनादि करते हे, उनका सब कुछ फलप्रद : होता है। ऋष्यादि के ज्ञान के साथ जो वेदार्थ भी जानते हैं, उनको ४०४०8 फल प्राप्त होता हे।' याज्ञवल्क्य और व्यास ने भी ऐसा ही

खा हें।

ऋषि के संबंध में पहले लिखा जा चुका हैं। देवों के बारे में आग॑ लिखा जायगा।

वेदिक मन्त्र छन्दों में ह। छन्दों का ज्ञान प्राप्त किये विना शद्ध 3च्चारण नहीं हो सकता। “जो मनुष्यों को प्रसन्न करे ओर यज्ञादि की 'क्षा करे, उसे छनन्‍्द कहा जाता हैं। (निरुक्‍त, देवतकाण्ड १.१२) नख्य छन्‍्द २१ ह। र४ अक्षर से लेकर १०४ अक्षर तक में ये खन्द आते हें। छन्दोथ्नुक्रमणी' में ऋग्वेद के समस्त छन्‍्दों का क्रमशः ववरण हैूँ।

जिस कायें के लिए मन्त्र का प्रयोग होता हे, उसे विनियोग कहा गेता हे। मन्त्र में अर्थान्तर और विषयान्तर होने पर भी विनियोग के द्वारा अन्य कार्य में उस मन्त्र को विनियक्त किया जा सकता हे। (र्वाचार्यों ऐसा माना हे। इससे ज्ञात होता है कि मन्‍्त्रों पर शब्दार्थों से भी अधिक आधिपत्य विनियोग का हैं। यही कारण है कि अथर्व- वैदकी पैप्पलाद-संहिता' के प्रथम मन्त्र “शनत्नो देवीरभिष्टये” का अर्थ दिव्य-जल-परक होने पर भी इसका विनियोग शनि की पूजा में होता रहा हूं

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यहाँ यह बात भी ध्यान देन की हैं कि जैसे मन्वार्थ के लिए और मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए उपर्यृक्त चारों विषयों और ब्राह्म ण-ग्रन्थ, निरक्‍्त, प्रातिशाख््य, कल्पसूत्र, इतिहास, पुराण आदि का ज्ञान अत्यावश्यक हू, वेसे ही मन्त्र-स्वर का ज्ञान भी नितान्त आव- इयक हूँ। स्वर में जरा सा व्यतिक्रम होने से अथे का अनर्थ हो जाता है। स्वर-दोष से मन्त्र बत्र बनकर यजमान को मार डालता हैं। स्वर- दोष से ही वृत्रासुर मारा गया। इन्द्र को मारन के लिए विश्वरूप ने यज्ञ किया मन्त्र में था “इन्द्रशत्र॒वंधस्व ।/” आशय था कि (इन्द्र के शत्र्‌ वृत्रासुर की वृद्धि हो; परन्तु स्वर का अशुद्ध उच्चारण होने के कारण अर्थ निकला-- इन्द्र की, जो शत्र हें. वृद्धि होए इससे इन्द्र की विजय हुई और वृत्रासुर की पराजय। फलतः स्वर-ज्ञान भी अत्यावश्यक हूं। इसका अ्रखर पक्षपाती एक स्वर-मक्तिवादी” संप्र- दाय ही है। प्रातिशाख्यों और जयन्त के स्वरांकुश' में स्‍्वरों का विवेचन है। स्वर-चिह्ल भी एक तरह के नहीं होते---उच्चारण-दैली भी विशभिश्र प्रकार की होती है। पदपाठ के भ्रन्थों में अवग्रह तथा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि स्वरों का, संहिताक्रम से, विस्तृत विचार किया गया है। कई 'पदपाठ' छप चुके हें।

देवतवाद

शक्ति और शक्तिमान्‌ के द्वारा निखिल ब्रह्माण्ड संचरणशील है। इन्हीं को माया और मायावी, पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति आदि भी कहा जाता हैं। शिव के बिना शक्ति निराधार हो जाती है--- टिक ही नहीं सकती और शक्ति-दहन्‍्य शिव शव के समान है। यही शक्ति परा देवता कहाती है। ज्यों-ज्यों जगत्‌ का विकास होता है, त्यों- त्यों यह परा देवता (मुल शक्ति) नाना रूपों को धारण करती जाती है। विश्व में आध्यात्मिक, आधिदेविक और आधिभौतिक आदि जितनी शक्तियाँ हैं, राब इसी देवता के भेद मात्र हें साधारणत: देवता असंख्य हें। किन्तु इनमें से कुछ प्रधान शक्तियों या देवताओं को, यज्ञ-संपादन के लिए, चन लिया गया हें। देवताबाद के प्रधान बैदिक ग्रन्थ “बृहदेयता के प्रारंभ में ही कहा गया हें- “बेदितवब्यं देवत॑ हि मन्त्र मन्त्र प्रयत्नतः॥ देवतज्ञों हि मन्त्राणां तदर्थमवगच्छति॥”

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अर्थात्‌ प्रयास करके प्रत्येक मन्त्र के देवता का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए; क्योंकि दैवत ज्ञान प्राप्त करनेवाऊा मनुष्य वेदार्थ और वेद- रहस्य समझता है 3

_बृहद्देवता” का कहना हूं कि मुर्दे (शव) के भी आँखें रहती हें। परन्तु वह इसलिए नहीं देख सकता कि उसका चेतनाधिष्ठान नहीं हैं जब तक जड़ (नेत्र) का अधिष्ठाता चेतन रहता है, तब तक वह भरी भाँति देखता है। जड़ पदार्थ में स्वयं कर्तव्य-शक्ति नहीं है; इसलिए उसका अधिष्ठाता चेतन माना गया है। इस तरह अनेक जड़ पदार्थों के अनेक अधिष्ठाता चेतन (देवता) माने गये हें। परन्तु समुदाय-रूप से सब एक ही हैं। एक ही अग्नि के अनेक स्फूलिगों की तरह एक ही परमात्मा की सब विभतियाँ हें--..“एको देवः सर्वेभूतेष गृढ़:।॥” महाशक्ति की जो अनंक शक्तियाँ विविध रूपों में प्रस्फुटित हैं, उनके अनेक नाम हें; इसलिए अनेक नामों से स्तुतियाँ की गई हें वस्तुतस्तु सभी नामों से परमात्मा की ही पुकार लगाई गई हं-- तस्मात सर्वेरपि परमेश्वर एवं हयते।” (सायणाचार्य )

निरुक्तकार यास्क का मत हँ--“देवो दानाद द्योतनाद दीपनाद्वा।” (निरुक्‍त, देवतकाण्ड १.५) अर्थात्‌ 'लोकों में म्रमण करनेवाले, प्रकाशित होनेवाले वा भोज्य आदि सारे पदार्थ देनेवाले को देवता वा देव कहते हें ये तीन प्रकार के हें---पृथिवीस्थानीय अग्नि, अन्तरिक्ष- स्थानीय वायू वा इन्द्र और झ्ुस्थानीय सूर्य अनेक नामों से इन्हीं की स्तुतियाँ की गई हैं। जिस सूक्‍त के ऊपर जिस देवता का नाम रहता है, उसका वही प्रतिपादनीय और स्तवनीय है। जहाँ औषधि, जल, शाखा आदि जड़ पदार्थों को देवतावत्‌ माना गया है, वहाँ औषधि आदि वर्णनीय हे और उनके अ्धिष्ठाता देवता स्तवनीय हें। आर्य लोग प्रत्येक जड़ पदार्थ का एक अधिष्ठाता देवता मानते थे; इसीलिए उन्होंने जड़ की स्तुति भी चेतन की तरह की है।

मीमांसाकार का मत कि जिस मन्त्र में जिस देवता का वर्णन है, उस मन्त्र में उसी देवताकी-सी दिव्य शक्ति सदा से निहित है। अतएव ' देवत्व-शक्ति मन्त्र में ही हे

ऋग्वेद ( २१४.११ ) से ज्ञात होता हे कि प्थिवी-स्थानीय ११, अन्तरिक्ष-स्थानीय ११ और चुस्थानीय ११--सब तेंतीस देवता हे। ९६५.२ और ११७३.४ आदि में भी ३३ देवों का उल्लेख है। तैत्तिरीय-संहिता (१.४.१०.१) में भी यही बात है। शतपथ-ब्राह्मण (४.५.७.२) में वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, आकाश और पृथिवी

( रई )

“थे ३३ देवता हैं। ऐतरेय-ब्राह्मण (२.२८) में ११ प्रयाजदेव, ११ अनुयाजदेव और ११ उपयाजदेव--ये ३३ देवता हें। परन्तु ऋग्वेद के दो मन्‍्त्रों (१७१.९ और १२९२.६) में ३३३९ देवताओं का उल्लेख हू सायणाचार्य ने लिखा है कि देवता तो ३३ ही हें; परन्तु देवों की विशाल महिमा दिखाने के लिए ३३३९ देवों का उल्लेख है।' निरुक्तकार का कहना हैँ कि तत्तत्कर्मानुसार विभिन्न नामों से पुकारे जाने पर भी देव एक हें।/ मतलब यह कि नियन्ता एक है और इसी मूल सत्ता के विकास सारे देव हे। इसी बात को निरुकतकार ने यो लिखा हे--तासां महाभाग्यात्‌ एकंकस्यापि बहूनि नामधेयानि भवन्ति।” (निरुक्‍त, देवतकाण्ड १.५) यास्क ने उदाहरण दिया है--“नरराष्ट्रमिव” अर्थात्‌ व्यक्ति-रूप से भिन्न होते हुए भी जैसे असंख्य मनुष्य राष्ट्र-रूप से एक ही हें, वेसे ही विविध रूपों में प्रकट होने पर भी देवों में एक ही परमात्मा ओत-प्रोत हैं। इस तरह भासमान भेद में अभेद और भासमान अनेकत्व में वास्तविक एकता है। इसीलिए निरुक्‍्तकार ने छिखा हँ---“एकस्यात्मनोडन्ये देवा: प्रत्य- ड्गानि भवन्ति।” (तनिरुकत, देवतकाण्ड अध्याय) अर्थात्‌ 'एक ही आत्मा (परमात्मा) के सब देवता विभिन्न भाग हें।' इन्हीं परमात्मा को याज्ञिकों और ब्राह्मण-प्रन्थों ने 'प्रजापति' कहा है। सभी देवता इन्हीं प्रजापति के विशिष्ट अंग माने गये हें। ऋग्वेद, पृष्ठ ४३४ के ५५ वें सूक्‍त में २२ मन्त्र हें और सबके अन्त में मह॒द्वेवानामसुरत्वमेकम्‌” वाक्य आया है, जिसका अर्थ है--- देवों का महान्‌ बल एक ही हे।” तात्पर्य यह है कि देवों की शवित एक ही हँ--दो नहीं। महाशक्ति का विकास होने के कारण देवों की शक्ति पृथक्‌ नहीं हें --स्वतन्त्र नहीं हें। ऋषियों ने जिन प्राकृत शक्तियों की स्तुति वा प्रशंसा की हे उनके स्थल रूप की नहीं की हूं, प्रत्युत उनकी शासिका वा अधिष्ठात्री चेतनशक्ति की की हैं। इस चेतनशक्ति को बे परमात्मा से पृथक नहीं सानते' थ्रे---परमात्मरूप ही मानते थे। उन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में हो अग्नि की स्तुति की हैं; परन्तु अग्नि को परमात्मा शे स्वृतन्त्र मानकर नहीं | ब्रे स्थूछ अग्नि के रूप के ज्ञाता होते हुए भी सूक्षः अग्नि--परमात्म-शक्ति-रूप के स्तोता और प्रशंसक थ। बे मरणशील अग्नि में व्याप्त अमरता के उपासक थे-.अपश्यमह महतो महित्वमगर्त्येस्थ मत्यसु विक्षु॥” (पृष्ठ १३३५. मन्त्र १) अर्थात्‌ मरणशील प्रजा में मेने अमर अग्नि को महिमा को देखा हे।' इसी तरह

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वे इन्द्र में भी परमात्म-शक्ति को ही देखते थे। कहा गया हे--जो इन्द्र सृष्टि-कर्ताओं के भी सृष्टिकर्ता हें, में उनकी स्वृति करता हूँ (१४२१.७)।' जितने देवता हूँ, सबको वे उसी तरह परमात्मरूप समझते थे, जिस तरह एक ही सूत्र में माला की सारी मनियाँ ओत-प्रोत रहती हे और केवछ माला समझी जाती हैं

वस्तुत: देवता या दिव्य शक्तियाँ चारों तरफ हें--बाहर, भीतर, सर्वेत्र। ऋषि लोग सब में--वृक्ष, शाखा, पर्ण आदि में देव ही देव देखते थे। अनुमान किया जा सकता है कि ऋषि लोग जब अपने को चारों ओर से देवों से ही घिरा हुआ अनुभव करते होंगे, तब उनका समाज कैसा आनन्दमय, स्वर्णमयय और सुगन्धमय रहा होगा ! क्षण भर के लिए भी यदि आप अपने को देवों से घिरा हुआ अनुभव करें तो आपके सारे दुर्गुण भाग जायँगे और आप सदगुणों की खान हो रहेंगे। यदि आप इन देवों में ही बिचरें, सोवें, जागें, तो आपका जीवन दिव्य हो जायगा, आपके सारे कार्य सिद्ध हो जायंगे और आपका संसार देवों का नगर बन जायगा।

जो इस रहस्य को नहीं समझते, वे वेद के ऊपर तरह तरह के सन्देह-जाल बिछाते हें। कहते हे--'वेद में औषधियाँ वैथ्यों से बातें करती हैं, द्यावापृथिवी त्रोलती हें, जल और वायू, चमस और ख॒वा--- सबके सब चलते, वर देते या धन देते हें। जड़ पदार्थ ये सब कार्य कैसे करेंगे ? '

वेद प्रधानतः आध्यात्मिक ग्रन्थ है ; उसमें चेतनवाद की प्रधानता है। बेदिक मन्‍्त्रों के साथ विहार करनेवाले ऋषि चेतन में रमण करते रहते हैं, चेतनगत-प्राण हें। ऐसे पुरुष सभी पदार्थों को चेतनमय देखते हे---वे चेतन के साथ ही खाते-पीते, सोते-जागते और बोलते-बतराते हैं। वे कुछ बनावट नहीं करते, वस्तुतः ऐसा ही अनुभव करते हे। अभी भी यहाँ के या किसी भी देश के महात्मा ऐसा ही अनभव करते और जड़ पदार्थों से बातें करते हें। जो आत्मवत्स्ंभतेषु” को जीवन में ढाल छेते हैं, वे पश्चु, पक्षी, कंकण और ठीकरे से भी बातें करते हें। भला जो वैद्य अपनी औषधियों से बातें करना नहीं जानता, बह कया भेषज का मर्म जानेगा ? जो वीर अपनी तलवार से बातें नहीं करता, वह भी कोई वीर है ? सचाई तो यह है कि अपने में चेतन का जितना ही अधिक विकास होगा, मनुष्य उतना ही जड़ 2 से चेतनवत्‌ व्यवहार करेगा। इसके विपरीत जिसमें चेतन-तत्त्व का 5 नहीं हुआ है, जिसके मन, मस्तिष्क और प्राण जड़ानुगत है, वह तो मनुष्य

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को भी जड़ समझेगा और जड़ की ही तरह उस पर मनमान अत्याचार करेगा। महात्माओ और जड़वादी मनृष्यों 4 काय अ्रतिदिन प्रत्यक्ष देखे-सुने जाते हे। फलत: वेद-मन्त्रों का चेतनानुगत होना उनकी अत्युच्च अध्यात्म-भसिद्र। हे।

वैदिक ऋषियों की दृष्टि विशाल और व्यापक थी। उनकी माता पृथिवी थी, उनका पिता दो था (१२२ .४) | वे प्रत्येक अवसर पर सारे भुवनों का स्मरण करते थे वे अपने व्यष्टि को समष्टि से संबलित रखते थे---साढ़े पाँच 'फीट' में ही अपन को केंद नहीं रखते थे। उनके भन विशाल थे, उनके वचन उदार थे, उनके कमें पिण्ड-ब्रह्माण्ड- ब्यापी थे। वे अपने में विश्व को देखते थे और विश्व में अपने को देखते थे। ऐसे दिव्य पुरुषों का सर्वेत्र चेतत और देवता देखना स्वाभाविक ही है।

स्वार्थी, अहंकारी और विलासी व्यवितयों से देवता दूर रहते हैँ। 'तपस्वी को छोडकर देवता दूसरे के मित्र नहीं होते! (५१०. ११) | कुकर्म करनेवाले के भी देवता नहीं हें (८१० .९)। देवों के गुप्तचर दिन-रात विचरण करते हे--उनकी आँखें कभी बन्द नहीं होतीं” (१२२२.८) | देवों के गण सब देखते हें" (१२२१ .२)। तात्पयें यह है कि जो संयमी. तपः-पूत और सदाचारी हे, उनको ही देवत ज्ञान होता है, विकासी और चरित्र-प्रष्ट को नहीं। कौन कसा है, यह देवता जानते हें; क्योंकि उनके गृप्तचर या जासूस सारा संसार घूम- घूमकर सब कुछ देखते रहते हें।

७. पु द्व-अ्ठ इन्द्र

वैदिक संहिताओं में सर्वाधिक मन्‍्ल इन्द्र के संबंध में हें। सब मिला कर प्राय: साढ़े तीन हजार मन्त्र इन्द्र के संबंध में हें। इन मन्त्रों से इन्द्र का यथार्थ स्वरूप समझ में जाता हैं

इन्द्रदेव आये-साहित्य और आर्य-देश में ही प्रख्यात वहीं हें, अन्य साहित्य और अन्य देशों में भी यर्थष्ट विख्यात हें। रमानाथ सरस्वती का मत है कि वृत्रासुर असीरिया, सीरिया मा शाम का प्रसिद्ध दरपति था। पारसियों की अवस्ता' से ज्ञात होता है कि बेबीलोन नगर को आर्य-शून्य करने के लिए वृत्र ने अद्विशूर नाम की देवी की उपासना की; परन्तु प्रयत्न में असफल रहा। अच्त को आयें इन्द्र ने वृत्र को मार डालछा। बुत्र आर्यो का घोर शत्रु था; इसलिए उसके वध पर आर्यो ने परमानन्द का अनुभव किया। फारस के राजा

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साइरस' ने जिस तरह 'टाइग्रीस” नदी का प्रवाह रोककर बेबीडोन को जीता था, उसी तरह वृत्र ने भी आर्येभूमि को जीतन की ठानी थी। यह अत्यंत प्राचीच कथा है; इसलिए तथ्य-निर्णय कठिन हैं। तो भी ऋग्वेद” और 'अवस्ता” से इतना तो विदित ही हो जाता हे कि 'इन्द्र-बुत्र- युद्ध हुआ था।'

ग्रीस या यूनान के जियस” और “अपोलो” देवों 28 कथाएँ भी इन्द्र की कथा के समान हें। मैक्समूलर का मत हू कि वृत्रन्युद्ध की नकरू पर ही होमर के 'इलियड' ग्रन्थ में ट्राय-युद्ध को कल्पना है। वेद का पणिगण' ट्राय-युद्ध का पैरिस' हैं। इसी तरह इच्ध- वृत्र-युद्ध के ऊपर अनेक प्राचीन जातियों में अनेक कल्पना-कथाएँ ग्रढ़ डाली गई हं।

इन्द्र-वृत्र-युद्ध की बातें ऋग्वेद के अनकानक भत्रों में हें। संस्कृत के अनेक ग्रंथों में भी ये बातें हें। प्राचीन परम्परा भी एंसी ही है परन्तु निरुक्‍्तकार यास्क कहते हें कि कहीं इन्द्र का वृत्रासुर से संग्राम हुआ होगा, इसे हम अस्वीकार नहीं करते; परल्तु वेद में इन्द्र-बुत्र-युद्ध के बहाने वैज्ञानिक वर्षा का वर्णन है तात्पर्य यह हूँ कि यहाँ अभ्रस्तुत प्रशंसा (अन्योक्ति) अलंकार है। परन्तु सोलह भाने में से पन्द्रह आने वेदाध्यायी सदा से, इन्द्र-वृत्र-युद्ध को वास्तविक युद्ध मानते हैं। यास्क के पहले वेदार्थ-ज्ञाता वेदिक संप्रदायों की परम्परा अक्षुण्ण थी; इसलिए वेदार्थ का ताक्ष्विक ज्ञान प्राप्त करने में सुममता थी। यास्क के समय यह ॒परपम्परा टूट गई थी; इसलिए वेदार्थ-रहस्य समझने में कठिनता और जटिलछता उत्पन्न हो गयी। फलतः इस प्रसंग में अधिकांश वेद-टीकाकार यास्क से सहमत नहीं हें।

ऋग्वेद के एक स्थल (५०० .३) पर कहा गया हैं कि “इन्द्र ने अनेक सहस्न सेनाओं का बंध किया। अन्यत्र छिखा हे-- “इन्द्र ने तीस हजार राक्षसों को मार डाला” (५०४ .२१)। 'इन्द्र ने वज्य द्वारा शम्बरासुर के ९९ वयरों को, एक कार में ही, विनष्ट किया था (५७५ .६)। इन्द्र ने शरत्‌ चामक असुर की सात धुरियों को विध्वस्त किया' (६९६ .१०) | इसीलिए इन्द्र को पुरन्दर कहा जाता हैं। इन्द्र तीन प्रकार (आध्यात्मिक, आधिदेैविक और आधि- भौतिक ? ) से मूर्तियाँ धारण करके प्रकट होते हें। वे माया द्वारा अनेक रूप धारण कर यजमानों के पास, आते हें। इन्द्र के रथ में हजार घोड़े जोते जाते है” (७३३ .१८)। सेवक सुदास राजा के लिए ६६०६६ जन मारे गये थे। ये सब कार्य इन्द्र को शूरता के सुचक

२७ )

हैं” (७९४ .१४)। दटन्द्र ने शम्बरासुर की ९९ नगरियों को छिन्न- भिन्न कर डाछा और अपने निवास के लिए १०० वी नगरी को अधि- कृत कर लिया” (७९७ .५)। इन्द्र ने कॉपते हुए वृत्रासुर के सिर को सौ धारोंवाले वज्ध से छेद डाला! (९०८ .६)। कदाचित्‌ तभी से इन्द्र का एक नाम आखण्डर (शत्रु-खण्डयिता) पड़ा।

आगे के कुछ और मन्त्र देखिए। कहा गया हें---'यदि सौ झ्ुछोक हो जायें, तो भी इन्द्र, तुम्हारा परिमाण नहीं कर सकते; यदि सौ पृथिवियाँ हो जायें, तो भी तुम्हें माप वहीं सकतीं; यदि सौ सूर्य हो जाये, तो भी तुम्हें प्रकाशित नहीं कर सकते इस छोक में जो कुछ उत्पन्न हुआ हैं, वह सब और थद्यावापृथियी तुम्हारी सीमा नहीं कर सकते (१०२२ .५) | इस मन्त्र में ऋषि ने इन्द्र में भ्रनवान की दिव्य विभूति का दर्शन किया है। इन्द्र, तुम्हारा एकमात्र बाण सौ अग्र भागों से युक्त और सहस्त पात्रों से संयुक्त है! (१०३४ .७)। “इन्द्र मे २१ पर्वेव-तटों को तोड़ा था इन्द्र ने जो कार्य किया, उसे भनुष्य वा देवता नहीं कर सकते” (१०५५ -२) इन्द्र ने सोमरस का यज्ञ करके अपनी देह को पुष्ट किया हैँ। इन्द्र, तुम मनुष्यों के समान स्पष्ट वाक्य का उच्चारण करते हो” (१२५२-१२) इन्द्र ने कहा--- ज्यावापृथिवी भेरे एक पादहव के समान भी नहीं हें। 'मेरी महिमा स्वर्ग ओर पृथिवी को लाँघती है।' मेरी इतनी शक्ति ह॑ कि कहो तो में इस पृथिवी को दूसरे स्थान पर ले जाकर रख दूँ। मेंने अनेक बार सोम-पान किया हैँ “इस पृथिवी को में जला सकता हूँ। जिस स्थान को कद्ी, उसे में विध्वस्त कर दूँ।' 'मेख एक पादव पृथिवी पर है थौर एक पादर्व आकाश में है।' में महान से भी महान्‌ हूँ (१४१०,७- १२) अनेक बार यज्ञपूत सोमपान करके और ईदवरीय शक्ति से अमोघ- वीयेंशालो होकर इन्द्र नं ऐसे उदगार प्रकट किये हें। इन्द्र ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वृत्र आदि असुरों को ८१० बार माराथा' (११६ - १३)। “इन्द्र ने आकाश में घ्कोक को स्थिर किया है, धो, पृथिवी और अन्तरिक्ष को तेज से पूर्ण किया हैं और हल ते पृथिवी को धारण कर उसे प्रसिद्ध किया है' (३१२. २) इन्द्र, गरजंद करने पर स्थावर और जंग्म काँप जाते हैं, त्वष्टा भी काँपते हैं” (११० -१४)। इन्द्र, उनुष्यों के छिए युद्ध करते है! (७७ .५)। ५.९ में इन्द्र सौ यज्ञों के कर्ता कहे गये हे। ७४ .९ में कहा गया हैँ कि 'सुश्रवा राजा के साथ प्रीस राजा और ६००९९ सैनिक इन्द्र से ऊलड़न के लिए आये थे। 'न्द्वने सबको पराजित कर दिया। एक अन्य मन्त्र (३१७.६)/

( २८ )

में कहा गया हे--इस्द्र, अस्सी, नब्बे अथबा सौ अश्बों के द्वारा ढोये जाकर हमारे सामने आओ। ३४३ .६ में इन्द्र के 'उच्च:श्रवा' घोड़े का उल्लेख हें। १०९ .८ में उल्लेख हे कि टइन्द्र के वज्य नब्बे नदियों के ऊपर विस्तृत हुए थे। १०९.९ में कहा गया हे कि एक बार १००० मनुष्यों ने एक साथ इन्द्र की पूजा की थी। इन उद्धरणों से ज्ञात होता हैं कि आये ऋषि इन्द्र में परमात्मा की भव्य विभति देखते थे। साथ ही आये लोग इन्द्र को देव-श्रष्, और महान्‌ -वीर भी समझते थे! अध्यात्म-दृष्टि से इन्द्र परमात्मा अधिदेब- दृष्टि से श्रेष्ठ देव थे और अधिभत-<ष्टि से महान योद्धा थे। ४नद्र-वषयक सारे विवरण पढ़ने से ? बातें मालम पड़ती हैँ। ब्राह्मणों और उपनिषदों में इन्द्र को अद्वितीय आत्मा, जीवात्मा प्राण आदि कहा गया है। अनेक देवों के साथ भी इन्द्र का वर्णन है। वेदिक साहित्य में इन्द्र-तत्व एक विशिष्ट प्रतिपाद्य हे।

अग्निदेव

ऐतिहासिकों के मत से हिन्दू, श्रीक (यूनानी), रोमन, पारसी आदि जातियाँ आर्य-जाति की शाखाएँ है और इन सब में अग्नि की पूजा प्रचलित थी--बहुतों में अब तक हूँ। ग्रीकों की राय से जो देवता, मनुष्य की भराई के लिए, स्वर्ग से पहले-पहल अग्नि को चोरी करके आया, उसका नाम 'प्रोमेथियस' था प्रमन्‍्थ (संस्कृत) था। उस देवता के थनानी अनन्य उपासक थे। रोमनों में वछकन वा उल्का नाम से अग्नि-पूजा प्रचलित थी, लेटिन भाषी अग्नि को इग्निस और सलाव लोग ओग्निस कहते थे। ईरानी वा पारसी अतर' नास से अग्नि के उपासक हैं। हिन्दुओं के तो श्रसिद्ध देवता अग्नि हंं ही। निरक्‍्त (७.५) का मत है कि पृथ्वी पर अग्नि, अन्तरिक्ष में इन्द्र (वा वायु) और दी (स्वर्ग वा आकाश) में सूय देवता हेँ।' ऋग्वेद के अँगरेजी भाषान्तरकार प्रो० विलसन का भत हे कि अंगिरा ऋषि और उनके वंशघरों भारतवर्ष में सर्वश्रथम अग्नि-पुजा का प्रचार किया।” परन्तु यह मत अनिर्णीत है।

ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में ही अग्नि की स्तुति हैं। अग्नि को पुरोहित , वा अग्रगन्ता इसलिए कहा गया हे कि उनके विता यज्ञ ही नहीं हो सफता। अग्नि को देवाह्वानकारी ऋत्विक इसलिए कहा गया है कि अग्नि का जलना ही देवों के आगमन का कारण है। अग्नि को रत्नधारी इसलिए कहा गया हैँ कि अग्नि यज्ञ-फल-रूप रत्नों वा धनों के पोषक हैं अग्नि * दीप्तमान्‌ तो हे ही। |

( २९ )

पृष्ठ १३ के १३ वें सूवत के १२ मन्‍्त्रों में इन नामों से अग्नि की स्तुति की गई हें--१. सुसमिद्ध, २. तनूनपात्‌, ३. नराशंस, ४. इला, ५. बहि:, ६. देवीद्वार ७. नक्त और उषा, <. देवीदह्य, ९. इला, सरस्वती, मही, १०. त्वष्टा, ११. वनस्पति और १२ वें मन्त्र में स्वाहा २१६.२ में तीन अग्नियों का उल्लेख है---जठराग्नि, विद्युग्नि और सूर्य-किरणों में विद्यमान अग्नि। ३८२.२ (२२ वें सूक्‍त) में अनेक अग्नियों का उल्लेख है। दरु-छोक में सु. भू-लोक में आहवनीय, औषधि में नियूढ़ तेज, समुद्र में वड़वानल और अन्तरिक्ष में वायु-रूप अग्नि हें।

अग्निदेव के सम्बन्ध में वैदिक संहिताओं में प्रायः ढाई हजार मन्त्र हैं। नमृने के लिए कुछ मन्त्रों का उल्लेख किया जाता है, जिससे अग्नि के स्वरूप का परिचय मिलेगा। “अग्नि सृष्टि के पहले अव्यक्त और सृष्टि होने पर व्यक्त होते हे। वे परम धाम (कारणात्मा) में हे। वे आकाश पर सूर्य-रूप से उत्पन्न हें। वे यज्ञ के पहले अवस्थित थे वे बृषभ और गाय--स्त्री-पुरुष--दोनों हें” (१२१६.७ ) | यहाँ अग्नि के सर्वव्यापी रूप का दिग्द्शन कराया गया हैं काष्ठ-मन्थन से उत्पन्न अग्नि, यज्ञ में देवों को बुछाओ (१३.३) एक मन्त्र (१३३.२) में दसों अँगूलियाँ इकट्ठी करके अनवरत काष्ठ-घर्षण से अग्नि की उत्पत्ति बताई गई है। १४४४.५ में अश्विनी-कुमारों के द्वारा अरणि-मन्थन से अग्नि का उत्पन्न होना कहा गया है। ६८६.३९ में कहा गया हैं कि “अग्नि ने त्रिपुरासुर के तीनों पुरों को भग्न किया है।' ३६.१ में अंगिरा लोगों का प्रथम ऋषि अग्नि को कहा गया है। ३७.११ में अग्नि को अंगिरा ऋषि का पुत्र बताया गया हैं। यहीं यह भी कहा गया है कि देवों ने पुरुरवा राजा के पौच मानवरूपधारी नहुष का अग्नि को मनुष्य-शरी र- वान्‌ सेनापति बनाया था।'

इन दोनों मन्त्रों के बल पर अनेक छोग अग्नि को प्रथम ऋषि मानते हैँ और अग्नि को ही ऋग्वेद का प्रथम स्मरण-कर्त्ता भी बताते हैं बहुत लोग अंगिरा का अर्थ आग का अंगारा करते हें और यह बात नहीं मानते। कितने ही लोग यह कहते हें कि 'यज्ञ-मण्डप में अग्नि को प्रथम रखा जाता हैं; इसलिए उन्हें प्रथम ऋषि कह दिया।' जो हो; परन्तु इसमें तो सन्देह नहीं कि ऋषि लोग जड़ागर्ति के अधिण्ठाता चेतनाग्नि को मानते थे; इसलिए देव-रूप से अग्नि की स्तुति की गई है इन्द्र की ही तरह अग्नि के भी तीन रूप कहे गये हो--आध्यात्मिक, आधि- देविक और आधिभीतिक।

इन्द्र और अग्नि के मन्त्रों में उपमाएँ बहुत आईं हें। इन दोनों

फा०

( २८ )

में कहा गया हे--इन्द्र, अस्सी, नब्बे अथबा सौ अश्बों के द्वारा ढोये जाकर हमारे सामने आओ।' ३४३ .६ में इन्द्र के 'उच्चे:अबा' घोड़े का उल्लेख हैं। १०९ .८ में उल्लेख हैं कि इन्द्र के बज्य नब्बे नदियों के ऊपर विस्तृत हुए थे। १०९.९ में कहा गया हैं कि एक बार १००० मनुष्यों ने एक साथ इन्द्र की पूजा की थी।

इन उद्धरणों से ज्ञात होता है कि आर्य ऋषि इन्द्र में परमात्मा की भव्य विभूति देखते थे ' साथ ही आर्य छोग इन्द्र को देव-श्रेष्य और महान्‌ श्र-वीर भी समझते थे! अध्यात्म-दृष्टि से इन्द्र परमात्मा थे. अधिदेब- दृष्टि से श्रेष्ठ देव थे और अधिभूत-दृष्टि से महान्‌ योद्धा थे। इन्द्र-वषयक सारे विवरण पढ़ने से णे बातें मालूम पड़ती हँ। ब्राह्मणों और उपनिषदों में इन्द्र को अद्वितीय आत्मा, जीवात्मा. प्राण आदि कहा गया हैं। अनेक देवों के साथ भी इन्द्र का वर्णन हें। वैदिक साहित्य में इन्द्र-तत्त्व एक विशिष्ट प्रतिपाद्य है।

अग्निदेव

ऐतिहासिकों के मत से हिन्दू प्रीक (यूनानी), रोमन, पारसी आदि जातियाँ आर्य-जाति की शाखाएँ हैं और इन सब में अग्नि की पूजा प्रचलित थी---बहुतों में अब तक हैँ ग्रीकों की राय से जो देवता, मनुष्य की भलाई के लिए, स्वर्ग से पहले-पहल अग्नि को चोरी करके आया, उसका नाम 'प्रोमेथियस' या प्रमन्‍्थ (संस्कृत) था। उस देवता के यतानी' अनन्य उपासक थे। रोमनों में वलकन वा उल्का नाम से अग्नि-पुजा प्रचलित थी लेटिन भाषी अग्नि को इग्सिस और स्‍्लाव छोग ओग्निस कहते थे। ईरानी वा पारसी अतर”' ताम से अग्नि के उपासक हेँ। हिन्दुओं के तो प्रसिद्ध देवता अग्नि हं ही। निरुक्‍त (७.५) का मत है कि पृथ्वी पर अग्नि, अन्तरिक्ष में इन्द्र (वा वायु) और दा (स्वगं वा आकाझश ) में सूर्य देवता हँ।' ऋग्वेद के अँगरेजी भाषान्तरकार प्रो० विलसन का मत हे कि अंगिरा ऋषि और उनके वंशधरों भारतवर्ष में सर्वप्रथम अग्नि-पुजा का प्रचार किया।' परन्तु यह मत अनिर्णीत है।

ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में ही अग्नि की स्तुति हैं। अग्नि को पुरोहित वा अग्रगन्ता इसलिए कहा गया हे कि उनके विना यज्ञ ही नहीं हो सकता अग्नि को देवाह्नानकारी ऋत्विक इसलिए कहा गया हैँ कि अग्नि का जलता ही देवों के आगमन का कारण है। अग्नि को रत्नधारी इसलिए कहा गया है कि अग्नि यज्ञ-फल-रूप रत्नों वा धनों के पोषक हें अग्नि दीप्वमान्‌ तो हे ही।

( २९ )

पृष्ठ १३ के १३ वें सूबत के १२ मन्त्रों में इन नामों से अग्नि की स्तुति की गई हे---१. सुसमिद्ध, २. तनूनपातू, ३. नराशंस, ४. इला, ५. बहि., ६. देवीद्वार ७. नक्त और उषा, ८. देवीदयय, ९. इला, सरस्वती, मही, १०. त्वष्टा, ११. वनस्पति और १२ वें मन्त्र में स्वाहा २१६.२ में तीन अग्नियों का उल्लेख है---जठराग्नि, विद्युरग्नि और सूर्य-किरणों में विद्यमान अग्नि। ३८२.२ (२२वें सूक्‍त) में अनेक अग्नियों का उल्लेख है। द्यु-लोक में सूर्य भू-लोक में आहवनीय, औषधि में निगूढ़ तेज, समुद्र में वड़वानल और अन्तरिक्ष-में वायु-रूप अग्नि हें।

अग्निदेव के सम्बन्ध में वैदिक संहिताओं में प्राय: ढाई हजार मन्त्र हैं। नमूने के लिए कुछ मन्त्रों का उल्लेख किया जाता है, जिससे अग्नि के स्वरूप का परिचय मिलेगा। अग्नि सृष्टि के पहले अव्यक्त और सृष्टि होने पर व्यक्त होते हे। वे परम धाम (कारणात्मा) में हे। वे आकाश पर सूर्य-रूप से उत्पन्न हें। वे यज्ञ के पहले अवस्थित थे वे बृषभ और गाय--स्त्री-पुरुष--दोनों है” (१२१६.७ ) यहाँ अग्नि के सर्वव्यापी रूप का दिग्दशंन कराया गया हैं। 'काष्ठ-मन्थन से उत्पन्न अग्नि, यज्ञ में देवों को बुलाओ (१३.३)। एक मन्त्र (१३३.२)' में दसों अँगूलियाँ इकट्ठी करके अनवरत काष्ठ-घर्षण से अग्नि की उत्पत्ति बताई गई हे। १४४४.५ में अश्विनी-कुमारों के द्वारा अरणि-मन्थन से अग्नि का उत्पन्न होना कहा गया है। ६८६.३९ में कहा गया हैं कि “अग्नि ने त्रिपुरासुर के तीनों पुरों को भग्न किया है।' ३६.१ में अंगिरा लोगों का प्रथम ऋषि अग्नि को कहा गया है। ३७.११ में अग्नि को अंगिरा ऋषि का पुत्र बताया गया है। यहीं यह भी कहा गया है कि देवों ने पुरुरवा राजा के पोत्र मानवरूपधारी नहुष का अग्नि को सनुष्य-शरीर- वान्‌ सेनापति बनाया था।'

इन दोनों मन्त्रों के बल पर अनेक छोग अग्नि को प्रथम ऋषि मानते हैं और अग्नि को ही ऋग्वेद का प्रथम स्मरण-कर्त्ता भी बताते हैं। बहुत लोग अंगिरा का अर्थ आग का अंगारा करते हे और यह बात नहीं मानते। कितने ही लोग यह कहते है कि 'यज्ञ-मण्डप में अग्नि को प्रथम रखा जाता हैं; इसलिए उन्हें प्रथम ऋषि कह दिया।” जो हो; परन्तु इसमें तो सन्देह नहीं कि ऋषि लोग जड़ाश्ति के अधिष्ठाता चेतनाग्वि को मानते थे; इसलिए देव-रूप से अग्नि की स्तुति की गई है इन्द्र की ही तरह अग्नि के भी तीन रूप कहे गये हं---आध्यात्मिक, आधि- देविक और आधिभौतिक।

दें और अग्नि के मन्त्रों में उपमाएँ बहुत आई हैं। इन दोनों

फा०

( रे० )

देवों के मन्‍त्रों में विशेषणों की भरमार हेँ। इन गृुण-बोधक विज्येषणों से इनके रूप समझने में यथेष्ट सहायता मिऊती है। इनके मन्ध्रों में पुनरुक्तियाँ भी बहुत है। कदाचित्‌ जटिल सन्दर्भों को बोधगम्य और सुगम बनाने के लिए वा विषयों को दृढ़ करते के लिए पुदरुपितयाँ की

गई है सोम

इन्द्र और अग्नि के अनन्तर सोम के बारे में वेदिक संहिताओं में जितने मन्त्र हें, उतने किसी भी देवता के सम्बन्ध में नहीं है। वैदिक संहिताओं का दरशमांश सोम की स्तुति और प्रशंसा से परिपूर्ण है। आर्य लोग सोम के अतीव अनुरागी थे। आर्यों का सबसे प्रिय पदार्थ सोमरस था। कहते हें, अत्युपकारी होने से जैसे अग्नि के लिए सब कुछ कह दिया गया है, वैसे ही उपकारक होने से सोम, सोमहकूता और सोम- रस की भी बड़ी महिमा कही गई है।

कहा गया है--ब्राह्मण लोग जिसे प्रकृत सोम कहते हूँ, उसका पान कोई यज्ञ-रहित मनुष्य नहीं कर सकता।' पाथिव मनुष्य सोम- पान नहीं कर सकता। (१३४१.४-५) 'सोम, तुम्हें पीकर अमर होंगे। पश्चात्‌ प्रकाशमान स्वर्ग में जायँंगे और देवों को जानेंगे” (१००२-३) लोधित, मधुर, यज्ञोपयोगी, क्षरणशील, स्वादिष्ट, रसधारा-संघ, अन्नदाता, धन-प्रापषक और आयु के दाता सोम प्रवहमान हैं! (१२०६.११)। “दिन में सोम हरित-वर्ण और रात में सररूगामी और प्रकाशमान दिखाई देते है” (११८०.९) सोम अनेक धाराओं से युवत्त और सुन्दर गन्ध से सम्पन्न है (११८२-१९) | 'हरित-वर्ण सोम मेषलोम के छनने में संचा- लित होते हैं! (११७२.१)। तब्रतादि से जिनका दारीर तपाया हुआ नहीं है या जो यज्ञ-शून्य है, वे सोम को धारण वहीं कर सकते' (११५७.१) | सोम मदकर, स्वादुतम, रसात्मक, अरुणवर्ण और सुखकारी है (११५३ -४)॥ सोम यज्ञ की नाभि हैं! (११४९.४) सोम जरू, दधि और दुग्ध से मिश्रित हैं (११४३.८) हाथों से कठिनता से रगड़े जाकर सोम पात्र में स्थित होते हैं” (१०९६.६) सोम को दस अंगुलियाँ मल्ती है (११२०.७) दस अँगुल्याँ सोम को मेषलोममय दशापवित्र पर प्रेरित करती है” (११७१.१) सोम लोहे से पिसे जाकर और ३२ सेरवाले कलश से युक्त होकर अभिख्रवण-स्थान में बैठते हें” (१०८०.२)। श्रोताओ, तुम लोग पिंगलवर्ण, स्वब॒लूू-स्वरूप, अरुण- वर्ण और स्वर्ग को छूनेवाले सोम के लिए जञ्ीघ्र गाथा का उच्चारण

( रे१ )

करो (१०८९.४)। सोम पर्वत से उत्पन्न और मद के लिए अभिषुत हैं” (११२२.४)। कुरुक्षेत्र्थ शर्यणावत्‌ तड़ाग में स्थित सोम को इन्द्र पियें (१२०८.१)। पवमान सोम, पत्थरों से कूठे जाकर कलश की ओर जाओ (११३६-३) सोम्न ऊपर चढ़नेवाली छताओं (ओषधियों ), को फल-युक्‍ता करके स्वादिष्ट करते है (११३९.२)। सोम, तुम्हारा परम अंश घुूलोक में है। वहाँ से तुम्हारे अंश पृथिवी के उन्नत प्रदेश (पर्वेत) पर गिरे और वृक्ष हो गये। पत्थरों से कूटे जाकर तुम्हें मेधावी' लोग हाथों से गोचर्म पर जल में दृहते है” (११५४.४) सोम के शोधक मेषचर्म और गोचर्म हैँ” (११४३.७) | सोम में जौ का सत्त भी मिकाया जाता था (११९८.२, ११३९.४ १०४६.२ और १०४७-४ )।

वस्तुत: सोम सबसे मुल्यवान्‌ और शक्तिशाली जड़ी अथवा ओषधि' था। वह आरोग्य, आनन्द, आयु, वीये, प्रतिभा, मेधा आदि प्रदान करनेवाल्ा था। इसीलिए छाक्षणिक रूप से उसका देववत्‌ महत्त्व कहा गया हैं।

सोमयाग करने के पहले सोमवल्ली खरीदने की विधि है अध्वर्य, यज-

मान आदि खरीदते थे। सोम बेचना एक व्यापार था। ३६ अंगुल लरूम्बे और १८ अंगुल चौड़े अभिषवण-फलक पर बिछाये क्ृष्णाजिन पर इसे रखकर और अभिमन्त्रित जल (वसतीवरी) से बीच-बीच में सींचकर चार पत्थरों के यन्त्र से इसे कूटा जाता था। अनन्चर इसे आहवनीय पात्र में डालकर उसमें जल छोड़ते थे और वलल्‍ली को मरू-मलूकर पानी में मिला देते थे। तछूछ2 बाहर निकाल देते थे। इसे दशापतवित्र (मेषलोम- मय) वस्त्र के द्वारा छानते थे। वस्त्र में नीचे छेद कर और उसमें ऊन का धागा डालकर इस तरह बाँवते थे कि सोमरस की धार छनती' हुई नीचे गिर जाया करे। देवता के प्रीत्यर्थ पहले इससे हवन करते थे। बचे हुए भाग को सदोमण्डप” में होम करनेवारे, वषट्कार बहनेवाले उद्गाता, यजमान, ब्रह्मा, सहख्ोक आदि १८ ऋत्विक्‌ और कुछ सदस्य तथा ३३ देवता पीते थे।

इसमें हू, दही, घृत, मधु, जल, जौ का सत्तू, सुबर्ण-रज आदि, देवभेद से, मिलाकर देवार्पण करने की विधि हें। इक्कीस गायों का दूध मिलाने की भी विधि है।

रमानाथ सरस्वती का मत हूँ कि मोटी जड़ के काठ के मूसूू से सोमलता कूटी जाती थी। अनन्तर दो भाण्डों की तरह अभिषव-पात्रों में रखी जाती थी। यजमान-पत्नी रस्सी से मथानी पकड़कर सोम-मन्धथन करती थी। सोमरस तैयार होते ही इन्द्र को दिया जाता था। बचा

( (४१ )

हुआ चलनी से छानकर दो चमस-पात्रों में रखा जाता था। अनन्तर वह गोचर्म वा मेषचर्म के पात्र पर रखा जाता था।' इस वर्णन का आभास पृष्ठ ३२ के २८ वें सूक्‍त के मन्त्रों में है

' सोमरस में ओज, तेज, वर्चस्व, सुगन्ध, स्वाद, मधुरता आदि तो थे ही; मादकता भी थी। विभिन्न वस्तुओं की मिलावट के अनुसार इसके आशिर, गवाशिर, यवाशिर आदि नाम भी रखें गये हें।

सोमलता हरी होती थी। इसके पत्ते लाल, पीले, साँवले आदि भी होते थे। तरह-तरह के वर्णन पाये जाते हें सुश्र॒त-संहिता (२९ अध्याय, २१-२२ इलोकों ) में लिखा है, शुक्लपक्ष में जेसे चन्द्रमा एक-एक कला बढ़ते-बढ़ते पूर्णता को प्राप्त होते है, वैसे ही सोम भी शुक्लपक्ष में एक- एक पत्ता बढते-बढते पूर्णिमा को १५ पत्तों से युक्त हो जाता है कृष्णपक्ष में प्रतिदिन ऋमशः एक-एक पत्ता गिरता जाता हैं और जैसे अमावास्या को चन्द्रमा लुप्त हो जाते हे, वैसे ही सोम के सारे पत्ते भी अमावास्या को लुप्त हो जाते हैं।! इन गृणों की समानता के कारण ही सोम को - चन्द्रमा कहा गया है

सुश्रुत में यह भी लिखा हे कि सोमरस के लिए सुवर्ण-पात्र चाहिए। इसमें सोम के २४ प्रकार कहे गये हें। इसे कन्द कहकर केले के कन्द की तरह इसका वर्णन भी किया गया है। सोमलछता को पानी पर तैरनेवाली, वृक्षों पर छटकनेवाली और भूमि पर उगनेवाली” कहा गया है। धर्म-

दही. ब्राह्मण-द्ेषी और कृतघ्न के लिए इसे अलभ्य' बताया गया है।

भूजमान्‌ (हिमालयस्थ पर्वत), शर्यणावान्‌ (तड़ाग वा झील ), व्यास नदी, सिन्‍्धू, सुधोमा (सोहान नदी) आदि इसके उद्गम-स्थान बताये गंये हें। .. पाइचात्त्य वेदाध्यायियों और उनके अनुयायियों के सोमछता के सम्बन्ध में विविध मत हें। राजेन्द्रलाल मित्र इसे 'वनस्पति' मानते है। जुलियस एगलिंग और ए० ब्ी० कीथ इसे एक प्रकार की सुरा' बताते हूँ। रागोजिन दैवी 'सुरासव' कहते हैं। इसी तरह वाट साहब 'अफगानी अंगूरों का रस', राइस 'ईख का रस', मैक्समूछर आँवले का रस” और हिलेब्रान्त मब' कहते हें! परन्तु ये सारे मत निराधार हें; क्‍योंकि इनमें से किसी में भी सोमलछता की वाणित गृण-बोधकता वा गूणानुरूपता नहीं हें।

ऐतरेथ-ब्राह्मण की अनुक्रमणिका में मार्टिन हाग ने लिखा हे कि मेन सोमरस तैयार कराकर पान किया था। पता नहीं, हाग साहब को

( रेईे )

कहाँ सोमऊछता मिल गई! कहीं-कहीं हिमालय की तराई में “गुड़ चाँ के रस को ही सोमरस कहकर बेचा जाता है !

इस समय सोमलता कहीं भी नहीं पायी जाती; इसलिए आजकल यज्ञों में इसके अनुकल्प पूतिक-तृण' वा 'फाल्गुन' नाम की वनस्पति का प्रयोग किया जाता है। आइवलायनश्रौत-सूत्र के अनुसार यही अनुकल्प है।

कलकत्ते के बेलगछिया नामक स्थान में एक बार “बनियालाल बाबाजी” नामक एक संन्यासी ने एक ऐसी लता दिखाई थी, जो परीक्षार्थ लन्दन भेजी गईं थी। परीक्षा करके हुटिनविड कम्पनी ने इसे सोमलता बताया था। ऐसी किवदन्ती हेँ।

पूत्रा के पास होनेवाली 'राशनेर' वनस्पति को भी बहुत छोग सोमलता बताते हैं; परन्तु उसमें सोमछता का कोई भी लक्षण नहीं हैं।

वंगाक्षर में चारों वेदों की चार संहिताएँ छापनेवाले पं दुर्गादास छाहिड़ी ने सोमलता को विशुद्ध बुद्धि और सोमरस को निष्कलंक ज्ञान बताया हैं। आध्यात्मिक अर्थ तो ऐसा हो सकता है; परन्तु कर्मकाण्डादि दृष्टियों से यह अर्थ 20 नहीं हे।

ईरानी छोग सोम को हउमा' कहते थे। वे इसका कच्चा ही पान करते थे। थियासोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका मैडम ब्छावस्की की राय है कि वेद का सोम ही बाइबिल का ज्ञानवक्ष' (५:०९

[709०१8८) है। यह भी कल्पना की एक उड़ान है !

वस्तुतः श्रौत-सूत्रों के समय (प्रायः हजार वर्ष पहले) ही यह अद्भुत पदार्थ अप्राप्त हो गया था; इसीलिए सूत्रों में इसके अनुकल्प की विधि लिखी गई है।

वेद-मन्त्रों से ज्ञाव होता हे कि रणांगण में जाते समय भी आयें सोमरस पीते थे। पीते ही पीते उनमें उमंग, तरंग और प्रतिभा भ्रस्फुटित हो जाती थी। स्फूत्ति और वक्‍तृत्व-शबित बढ़ जाती थी। पान करनेवाला उच्च भावों और अपूर्व आनन्द में डूब जाता था। बृद्धि-बृद्धि करना तो इसका विशेष गुण था ही। यह वृद्ध को तारुण्य प्रदान करता था-+ असीम बरू बढ़ा देता था। शरीर को रोग-रहित कर देता था। जानवरों को भी सोम पिलाया जाता था। सोमरस पीनेवाह्टी गायों के दूध में सोम का आंशिक गुण जाता था। ये ही सब कारण हैँ कि देव और मनुष्य--सबकी इसमें चूड़ान्त आसक्ति थी।

सोम के सम्बन्ध में अनेकानेक आलूकारिक कथाएँ भी वैदिक साहित्य में हें। उनको यहाँ लिखना अनावश्यक हूँ परन्तु महान्‌ आश्चर्य तो

3 )

थह है कि इतनी महत्वपूर्ण ओषधि कंसे अऊभ्य हो गई ? बैदिक संहि- ताओं का दशमांश जिसकी गृण-गरिमा और महिमा से परिपूर्ण है, वह अनमोल वस्तु जगतीतल से कैसे उठ गई ? सुम्रुत में कहे २४ प्रकार के सोम की प्राप्ति की सम्भावना हिमालय आदि में बतायी जाती है। ध्या' कुछ साहसी पुरुष इसकी खोज के लिए चेष्टा नहीं कर सकते ? थदि यह वस्तु उपलब्ध हो गई, तो संसार में युगान्तर उपस्थित हो जायगा ।!

इन्द्र और अग्नि की तरह ही सोम के मन्त्रों में भी बड़ी उपमाएँ और पुनरुक्तियाँ हे 5०8 विषय को सुबोध्य और सर्व-ग्राह्म बनाने के लिए ये पुनरुक्तियाँ की गई हें।

आश्वनीकुशरद्य

इन्द्र, अभ्नि और सोम के अनन्तर अश्विनीकुमारों के सम्बन्ध में ऋ्वेद में बहुत मन्त्र हें। थे कौन थे ? इसके उत्तर में भी बहुत माथा- पच्ची की गई है। मैक्समूलर के मत से ये आलोक और अन्धकार हूँ। गोल्डस्टकर के मत से ये प्रसिद्ध मनुष्य थे। इन्हीं की तरह ग्रीस में कैस्टर और पोलक देवता हें। जिस तरह त्वष्टा की कन्या सरण्य ने अश्व-रूप धारण कर अधश्विद्धाय को जन्म दिया, उसी तरह ग्रीक देवी एरिमिज डिमेटर ( जा 4 3 [2277८0८॥) ने घोड़ी का रूप' घारण कर अरियेन क्षौर डिस्पोला को जन्म दिया था।

पुराणों में ये यमज और मन तथा शरीर के रक्षक देवता भी बताये गये हं। निरुक्‍त का मत पहले ही लिखा गया है। ऋग्वेद में दर्न और नासत्य नामों से भी इनक। विवरण है। १२३३.२ से ज्ञात होता है कि ्वष्टा की कन्या सरण्यू से इनका जन्म हुआ। ये महान्‌ प्रतिभाशाली थे और दोनों भाई व्याधि और विपत्ति के भी देवता थे। ये नामी शिल्पी और चिकित्सक भी थे। अश्विद्वय की नौका ऐसी थी, जिसमें जल नहीं जा सकता था।' ये सौ डाँडोंबाली नौका में भुज्य को बैठाकर समुद्र से राजा तुग्र के पास ले आये थे।! (१६६-६७ .३ और ५) एक भन्‍्त्र (२७६.५) में कहा गया है कि अशिविद्वय, तुमने पंखोंबाली (पक्ष- विशिष्ट) नौका बनाई थी। तुमने नौका द्वारा महासमुद्र से तुग्र-पुत्र भुज्यु का उद्धार किया था।

ये या महान्‌ वेद्यराज तो थे ही। कहा गया हे--वृद्ध कलि नामक स्तोता को अश्विद्वय, तुमने यौवन से युक्त किया था। तुम लोगों ने लगड़ी

रेप |

विश्पला को लोहे का चरण देकर उसे गति-समर्थ बना दिया था! (१२७१. <)। विश्पला खेल ऋषि की पत्नी थी। यही बात १५८.१० और १६८.१५ में भी है। इस १५ वें मन्त्र में कहा गया है कि “युद्ध में विश्पछा का एक पैर कट गया था।' उसे लौह-जंघा देकर फिर अश्विद्य ने युद्ध-क्षेत्र में जाने में समर्थ किया था। यह असाधारण स्त्री युद्धक्षेत् में जाने में समर्थ थी। परन्तु साघारणतः स्त्रियों के लिए युद्ध-क्षेत्र निषिद्ध था। १६८. १४ में कहा गया है कि अशिविद्वय ने नपुंसक-पति का वश्षि- मती को हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया था। यहीं १६ वें मन्त्र में वुषा- गिर के पुत्र अन्धे ऋजाइव को नेत्र देने की बात भी लिखी है। १२४६.११ में अन्धे दीघेतमा को नेत्र और छंगड़े परावृज को पैर देने की बाल कही गई है। १६८.१० में च्यवन ऋषि का बुढ़ापा दूर कर उन्हें तरुण

०. हि

बनाने का उल्लेख हुं। यही बात ६४३. में भी है

वायुदेव

यास्क का मत (निरुक्‍त ७.५) हे कि वायु आर्यो के अत्यन्त प्राचीन देवता है। ईरानियों में भी वायु-पुजा प्रचलित है। ग्रीक और रोमन पान (297) (संस्कृत नाम से वायु की पूजा करते थे।

ऋच्वेद के एक स्थान (५७८.८) पर कहा गया है--भर्तों के प्रभाव से धावा-पृथिवी चक्र की तरह घूमने रूंगी थीं। २०.३ और में वायु को जल-वृष्टि का कारण बताया गया हैँ। यहीं ७वें मन्त्र में वायु को मेघ-माला का संचाछक और जल-राशि को समुद्र में गिरानेवाला कहा गया है। ९०.३ में कहा गया है--रुद्व के पुत्र मरुत्‌ जरा-रहित और तरुण है और जो देवों को ह॒व्य नहीं देते, उनके नाशक हैं।” ६१५.१७ में लिखा हे--सप्त-सप्त-संख्यक् (४९) मरुद्गण एक-एक होकर हमें शतसंख्यक गो, अश्व आदि दें। इनके द्वारा प्रदत्त समूहात्मक घन को हम यमुना-तीर में प्राप्त करें। यहाँ तो विश्व-विख्यात ४९ पवनों का ही उल्लेख है। परन्तु १०५६.८ में ६३ मरुतों के द्वारा इन्द्र का संवर्द्धन लिखा हुआ है मनु स्मृति (१.२३) में तो स्पष्ट लिखा हे कि ब्रह्मा ने वायु के द्वारा यजुर्वद प्राप्त किया। अनेकों के मत से वायू वेद-स्मारक' ऋषि थे। उनके मत से अग्नि और सूर्य भी प्राथमिक ऋषि थे, जिनके द्वारा क्रशः ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए। मनु जी के उक्त इलोक से यह बात समर्थित की जाती हैँ। इसी तरह चौथे प्राथमिक ऋषि' अंगिरा माने जाते हैं, जिनके द्वारा अथर्ववेद प्रकट हुआ। परन्तु यह सब केवल मतान्तर है, जो विवादास्पद है।

( ३६ )

ऋंभुगण

विलसन ने ऋभुगण का अर्थ सूर्य-किरण किया है और मैक्समूलर ने सूर्य मैक्समूलर की राय से वृव्‌ नामक ऋत्विक्‌ ने सर्वे-प्रथम ऋभुओं को पूजा था। ग्रीस में ग्रीकों के आरफेअस (07[27०८प55$) की कथा भी ऋभुओं के समान ही प्रचलित हे। ऋभू का एक नाम अर्भुर भी है। सायणाचार्य के मत से ऋभु छोग पहले मनुष्य थे---तपोबल से देवता हो गये थे।

अंगिरा ऋषि के वंश में सुधन्‍्वा थे, जिनके ऋभु, विभु और वाज नाम के तीन पुत्र थे। यह कथा अवश्य हैँ कि उन्होंने कर्मबल से देवत्व प्राप्त कर सूर्यलोक में वास किया था। सायण ने ऋणभओं का अर्थ 'सूर्य-किरण' भी किया है। ऋणभुओं की देवत्व-प्राप्ति का संकेत १५४. १-४ भमन्त्रों में है।

. ऋभुगण प्रसिद्ध कलाकार थे। उन्होंने अष्विद्यय के लिए सर्वत्र- गन्ता रथ का निर्माण किया था। ऋयभुओं ने अपने माँ-बाप को तरुण बना दिया था। ऋभुगण मानव-जन्म ले चुकने पर भी अविनाशी आयु (देवायु) प्राप्त किये हुए हैं (२१.३-४ और ८) ये अद्भुत चिकित्सक भी थे। इन्होंने मृत गौ के चमड़े से धेनु उत्पन्न की। एक अइव से अन्य अश्व उत्पन्न किया (२३९.७)। इन्होंने चमड़े से गौ को ढक दिया था और उस गौ के साथ बछड़े का फिर योग कर दिया था तथा माँ-बाप को

युवा बना दिया था' (१५५.८) ऋग्वेद में ऋभुओं के सम्बन्ध में अनेक सूक्‍त हूँ।

मित्रावरुण

मन्त्रों में मित्र और वरुण देवों का साथ-साथ उल्लेख किया गया है। मित्र प्राचीनतम देव हे ईरानी छोग मिश्व नाम से मित्र की पूजा करते हू वरुण तो अत्यन्त प्रसिद्ध देवता हैं। ईरानी वरण नाम से वरुण की पूजा करते हैं। ग्रीक तो वरुण वा उरानोस (प/9705) को सब देवताओं का पिता मानते हैं। अलेक्जेंडर वोच की राय से वरुण पहले आकाश-देव थे; पीछे समुद्र-देव हुए। राथ के मत से वरुण समुद्र-देव ही हैं। वेस्टगार्ड की भी यही सम्मति हैं। ऋग्वेद में वरुण समुद्रदेव हें। मित्रावरुण की अपूर्व शक्तियों का विवरण अनेक मन्त्रों में है।

( रे७ )

जउपा

स्वर्गपुत्री उषा के ग्रीकों में इगोस, दहना, एथेना आदि कई नाम छैौटिन भाषाभाषी उन्हें मिनर्वा कहते हें। राजेन्द्रलाल मित्र की राय है कि 'ऋग्वेद में उषा के जो अर्जुनि, ब्रिसया, दहना, उषा, सरमा, सरण्यू आदि नाम हैं, वे सब नाम 09 ए7075, 379249, 9090|77८, ]508, #००४ और 7५7]79७ नामों से ग्रीकों म॑ भी हें। ग्रीकों में यह बात प्रसिद्ध हैं कि 0.०0]0 या सूर्य ने [0997706 या दहना का अनुधावन किया था। उषा का एक वेदिक नाम अहना भी है, जिसे ग्रीकों में सुबुद्धि-देदी-रूप से 0६॥727048 नाम दिया गया है।'

इन उद्धरणों से ज्ञात होता है कि प्रीकों, रोमनों और ईरानियों के देवी या देवता वैदिक देवताओं की नकर पर बने हेँ। उषा के सम्बन्ध में ऋग्वेद में अनेकानेक चमत्कार-पूर्ण और कवित्वमय मन्त्र हें, जो कृण्ठस्थ करने योग्य हें।

कण

उनन्‍्न्‍क,

पृषा

सायणाचार्यें ने पूषा का अर्थ 'जगत्पोषक पृथ्िव्यभिसानी देव” किया है। उन्होंने पृषा को मेघ-पुत्र' भी माना है इसका कारण उन्होंने बताया है कि जल से पृथिवी उत्पन्न हुई है और मेघ जल धारण करता है; इसलिए जल-पृत्र ही मेघ-पुत्र या पृथिव्यभिमानी देव है ।' परन्तु यास्क ने निरुक्‍त में पूषा का अथ सूर्य किया है। पुराण भी यही अर्थ बताते हें। प्रसिद्ध वेद-विज्ञाता पं० सत्यव्रत सामश्रमी ने 'अल्पतेजा' सूर्य को पूषा वा पूषन्‌ लिखा हूँ। पाश्चात्त्य वेदालोचकों ने भी सूर्य को ही पूषा माना है। वेदार्थयत्न ने लिखा है--मिघ से ही सूर्य-प्रकाश आता हैं; इसलिए पूषा को मेघपुत्र कहा गया है ।'

ऋग्वेद में कहा गया हें--- प्रकाशमान पृषन्‌ , कृपण को दान देने के लिए प्रेरित करो और उसके हृदय को कोमल करो।' सूक्ष्म लौहाग्र-दण्ड' (आरा) से पणियों के हृदय को विद्ध करो।' 'पणि वा चोर के हृदय में सदभावना भरो। (७४७.३ और ५-६) ७४८.२ में पूषा को रथि- श्रेष्ठ, कपर्दी (चूड्राबान) और अतुल एंडवर्य का अधिपति बताया गया है ऋणग्वेद में पृषा के सम्बन्ध में अनंक दिव्य और भव्य मन्त्र हें

डा० वसनन्‍्त जी० रेले दि वंदिक गाड़स' नामक एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने अपना मत व्यक्त किया है--'ऋषियों ने बाह्य विश्व का पूर्ण और शुद्ध ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने जब शरीर-विज्ञान पर

( ३८ )

विचार करना प्रारम्भ किया, तब उन्होंने अपनी पूर्व-परिचित दैवत संज्ञाओं का व्यवहार, आ्ंकारिक दृष्टि से, शरीर-विज्ञान पर भी किया इसलिए देवत संज्ञाएँ (देवता-नाम ) दृध्र्थक और नानार्थक हें।' रेले का सिद्धान्त _ है-- बैदिक देवता प्रायः ज्ञान-तन्तु-संस्थान के विविध भाग हें ।! इन्होंने इस पुस्तक में त्वष्टा, ऋभु, सविता, अश्विद्वय, मरुत, पर्जन्य, उषा, विष्णु, रुद्र, पूषा, सूर्य, अग्नि, इन्द्र, अदिति, बृहस्पति, सोम, मित्रावरण और आप आदि श्रसिद्ध देवताओं के सम्बन्ध में विचार किया है। डा० रेले का दावा है कि सम्पूर्ण वैदिक देवता और उनके कार्य हमारे मस्तिष्क- संस्थान के विभिन्न कार्यों के द्योतक हूँ ।' रेले की यह भी प्रतिज्ञा है कि “बैदिक ऋषियों ते चल सी ऐसी बातों का पता रूगा लिया था, जो वत्तेमान समय में आधुनिक विज्ञान की सहायता से पुनः जानी. जा सकती हँ--बहुत सी ऐसी बातों का भी उन्हें ज्ञान था, जिनका ज्ञान वर्तमान युग में अभी हमें प्राप्त करना है ।'

वेद के बहुत से शब्द दध्र्थक और नानार्थक तो हें; परन्तु यह नहीं कहा जा सकता सारे देवता-नामों को इलेषालंकार का जामा पहनाया गया है। वेद-कर्त्ता वा वेद-स्मर्तता का एक सिद्धान्त था, एक प्रतिपाद्य था। सीधे-सादे ऋषि नानार्थक या द्र्थथ का जाल फैछाकर अपना प्रतिपाद्य उलझन में डालनेवाले नहीं थे। दूसरी बात यह है कि रेले ने आह्यण निरुक्‍्त, श्रातिशाख्य तथा वैदिक सम्प्रदायों की परम्परा वी चिन्ता नहीं की हैं। उनका अर्थ केवल काल्पनिक हैं और उन चतुर्वेद स्वामी की दृष्टि का अनुधावन करनेवाला है, जिन्होंने बेद के एक ही मन्त्र से पृतना-बंध, गोवद्धंन-धारण और कंस-बध आदि मनमाने अर्थ निकाले हैं | देवों का रहस्य बतानेवाले बृहद्देवता', 'निरुक्‍्त', “निरुवत- वात्तिक' आदि अनेक वैदिक ग्रन्थ हें।

यमराज ओर पित-लोक

विवस्वान्‌ के द्वारा सरण्यू के गर्भ से यम और वरुण की उत्पत्ति हुई है। ईरानी धर्म-पुस्तक 'अवस्ता” में यम को मित्र कहा गया हे। वहाँ मित्र को प्रथम राजा और सम्यता का उत्पादक माना गया हैँ। सुक्ृती पुरुष ही मित्र का और मित्र के साथ है 8 का साक्षात्कार भ्राप्त करते हैं। जैसे वेद में यम के पिता हें, वैसे ही अवस्ता' में विवन्वत्‌ हे जिस तरह ऋग्वेद की यमपुरी में पुण्यात्मा निवास करते हें. उसी प्रकार 'अवस्ता' की यम्पुरी में भी। फारसी के

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प्रसिद्ध कवि फिरदौसी ने अपने 'शाहनामा' में मित्र को यमशिद' लिखा है। यमशिद नामी सम्राट थे।

ऋग्वेद (१२२१.४) में यम के पिता आदित्य और माता सरण्यू कथित हूँ। यम को सत्यवादी भी कहा गया है। आगे कहा गया हँ--.. यम के पास ही सारा मानव-समुदाय जाता है।' जिस पथ से हमारे पूर्वज गये हैं, उसी से अपने कर्मानुसार सारेजीव जाय॑गे।' (१२२७.१- २) जहाँ हमारे पितामहादि गये हें, उसी प्राचीन मार्ग से हे मृत पितः, जाओ। स्वधा से प्रसन्न यमराज और वरुणदेव को देखो ।' उत्कृष्ट स्वर्ग में अपने पितरों से मिलो। साथ ही अपने धर्मानष्ठान के फल से भी मिलो। इमशान-घाट के पिशाचादिकों, यहाँ से हूटो, दूर जाओ ।* लम्बी नाकोंवाले दूसरों का प्राण-भक्षण करके तृप्त होनेव लि , मनृष्य' को लक्ष्य करके विचरण करनेवाले महाबली जो दो यमदूत (कुक्कुर) है, वे आज यहाँ हमें सूर्य-दर्शन के लिए समीचीन प्राण दें।' (१२२८.,७- ९६ और १२) ऋत्विको, राजा यम के लिए अत्यन्त मिष्ट हवि का हवन करो।' यमराज बत्रिककुद (ज्योति, गौ और आयु नामक) यज्ञ के अधिकारी हैं। यम बुछोक, भूलोक, जऊू, उद्भिज्ज, उर्क तथा सूनत नाम के स्थानों में रहते हे और बंसार में थिचरण करते ह।! (१२२९.१५-१६) उत्तम, मध्यम, अधम आदि तीन श्रेणियों के पितरों का और पितरों के द्वारा यज्ञ-मण्डप में कुझों पर बैठकर हव्य के साथ सोमरस के ग्रहण करने” का भी उल्लेख है (१२२९.१ और )। 'पितरो, तुम छोग दक्षिण तरफ घुटने टेककर पृथ्रियी पर बैठते हुए यज्ञ की श्रशंशा करो। हम मनुष्य हैं; इसलिए हमसे अपराध होना संभव हैँ। इसके लिए हमारी हिंसा नहीं करना। 'पितर हवन करना जानते थे और अनेक ऋचाओं की रचना करके स्तोत्र प्रस्तुत करते 4 तथा अपने कर्म-प्रभाव से देवत्व प्राप्त करते थे।' साधु-स्वभाव पितर देवों के साथ हवि भक्षण करते थे और एन्द्र के साथ रथ पर चढ़ते थे।' (१२३०.५ और ९-१०) जो पितर जछाये गये है और जो नहीं जलाये गये हें, वे सब स्वर्ग में स्वधा के साथ आनन्द करते हैं (१२३१. १४)। दो मन्त्रों में पितृयान का भी उल्लेख है (१२३५.१-२) १३५४.१५ में देवयान और पित-यान, दोनों का उल्लेख हे है

पाठक देखें कि पुराणों में जो यमराज, यमदूत, पितर, पितृ-यान आदि का उल्लेख है, उससे ऋग्वेद के एतद्विषयक विवरण से आइचर्य- जनक साम्य हैं। पुराणों में ही नहीं, संस्कृत-साहित्य के किसी भी ग्रन्थ के एतद्विषयक विवरण से इस विवरण का अपूुर्वे समन्वय है। ऊपर

( ४० )

के एक मन्त्र से यह भी पता चलता है कि कुछ छोग जछाये जाते थे

और कुछ छोग नहीं। ये दोनों बातें भी पुराणों में हैं अवश्य ही पुराणों की भाषा और विषय प्रफुल्लित रूप में हँ।

सूयदेव

अदिति देवी के पुत्र आदित्य (सूर्य) माने गये हें। आदित्य छः हें--मित्र, अर्यमा, भग, वरुण, दक्ष और अंश (३२९.१)। १२१०.३ में सात तरह के सूर्य बताये गये हें। १३३६.८-९ में कहा गया है कि अदिति के आठ पुत्र थे--मित्र, वरुण, घाता, अर्यमा, अंश, भग, विव- स्वान्‌ और आदित्य। इनमें से सात को लेकर अदिति देवी चली गईं और आठवें सूर्य को आकाश में छोड़ दिया। 'तैत्तिरीय-ब्राह्मण” में आदित्य के स्थान पर इन्द्र का नाम हे। 'शतपथ-ब्राह्मण” में १२ आदित्यों का उल्लेख है। महाभारत (आदिपवे, १२१ अध्याय) में इन १२ आदित्यों के नाम ह--धाता, भर्य॑मा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्‌, पूषा, त्वष्टा, सविता और विष्णु। अदिति का यौगिक अर्थ अखण्ड है। यास्क ने अदिति को देवमाता माना है।

कहा जाता है कि वस्तुतः सूर्य एक ही हे, कर्म, काल और परिस्थिति के अनुसार सूर्य के विविध नाम रखे गये हे।

पृष्ठ ४५ के ३५ वें सूक्‍त में ११ मन्त्र हें और सबके सब सूर्य- वर्णन से पूर्ण हं। सूर्य का अन्तरिक्ष में अ्रमण, प्रात: से साय॑ तक उदय-नियम, राशि-विवरण, सूर्य के कारण चन्द्रमा की स्थिति, किरणों से रोगादि की निवृत्ति हे के द्वारा भूलोक और द्युलोक का प्रकाशन आदि बातें एक ही सूक्‍त से विदित होती हूँ। वें मन्त्र में कहा गया हे-- पूरे ने आठों दिशाएँ (चार दिशाएँ और चार उनके कोने) प्रकाशित किये हैं। उन्होंने प्राणियों के तीनों संसार और सप्त सिन्धु भी प्रकाशित किये हें। सोने की आँखोंवाले सविता यजमान को द्रव्य देकर यहाँ आवें।'

६७.८ में लिखा हे--सूर्य, हरित नाम के सात घोड़े (किरणें) रय से तुम्हें ले जाते हैं। किरणें वा ज्योति ही तुम्हारा केश है /॥ ३४५.२ में कहा गया है--सूर्य के एक चक्र रथ में सात घोड़े जोते गये हें। एक ही अज्ब (किरण) सात नामों से रथ ढोता है। इससे विदित होता है कि ऋषि को सूर्य-रश्मि के सात भेदों और उनके एकत्व का भी ज्ञान था।

१८६.८ में कहा गया हें---उपा सूर्य से ३० योजन आगे रहती

( ४१ )

है।! इस पर आचार्य सायण ने लिखा है--'सूर्य प्रति दिन ५०५९ योजन अमण करते हँं। इस तरह सूर्य प्रत्येक दण्ड में ७९ योजन घूमते हे उषा सूर्य से ३० योजन पूर्वगामिनी है; इसलिए सूर्योदय से प्रायः आधा घंटा पहले उषा का उदय मानना चाहिए।! पाद््चात्त्यों के मत से सूर्य बीस हजार मील प्रति दिन चलते हें। परन्तु सूर्य की गति अपने कक्ष में ही होती हे।

इन दो मन्त्रों में सूर्य-संबंधी अनेक ज्ञातव्य विषय हें-.'सत्यात्मक सूर्ये का, बारह अरों, खूटों वा राशियों से युक्त, चक्र स्वर्ग के चारों ओर बार-बार श्रमण करता और कभी भी पुराना नहीं होता। अग्नि, इस चक्र में पृत्र-स्वरूप होकर सात सौ बीस (३६० दिन और ३६० रात्रियाँ) निवास करते हेँ। अगले मन्त्र में दक्षिणायन (पूर्वार्ध) और उत्तरायण (अन्यार्ध) का भी कथन है (२४७.११-१२)। ७१४.५ में भी दक्षिणायन का विषय है। २५२.४८ में भी ३६० दिनों की बात है

२३३.६ में काल के ये ९४ अंश बताये गये ह--संवत्सर, दो अयन, पाँच ऋतु (हेमनत और शिशिर को एक मानने पर), बारह भास, चौबीस पक्ष, तीस अहोराच्र, आठ पहर और बारह राशियाँ।

५९२.५-९ में सूर्य-पग्रहण का पूर्ण विवरण हे।

८४७.११ में सूर्य (मित्र, वरुण और अर्यमा) के द्वारा वर्ष, मास, दिन और रात्रि का बनाया जाना लिखा है। २८.८ में १२ मासों की बात तो है ही, तेरहवें महीने का भी उल्लेख है यह तेरहवाँ महीना मलमास वा मल्िम्लिच हें। ३५०.३ में भी मरूमास का उल्लेख है।

पृथिवी की चारों ओर सूर्य की गति से जो वर्ष-गणना की जाती है, उसमें बारह “अमावास्याओं' की गणना करने से कई दिन कम हो जाते हैं। इसलिए सौर और चान्द्र वर्षों में सामंजस्य करने के लिए चान्द्र वर्ष के प्रति तीसरे वर्ष में एक अधिक मास, मलमास वा मछि- स्‍लच रखा जाता है इस मन्त्र से ज्ञात होता है कि वैदिक साहित्य में दोनों (सौर और चान्द्र) वर्ष माने गये हे और दोनों का समन्वय भी किया गया हैं।

१४४४.४ में कहा गया है, अजर ओर ज्योतिर्दाता सूर्य सदा चलते रहते हें।। १४६४-६५.१-३ मन्त्रों में सूर्य की गतिशीलता और तीस मह्तों का उल्लेख हैँ। ९२६.३० में इन्द्र द्वारा सूबे के आकाश में स्थापन के साथ ही सारे संसार के नियमन की बात लिखी है। १४३९. में कहा गया है कि 'सूर्य ने अपने यन्त्रों से पृथिबी को सुस्थिर रखा है। उन्होंने विना अवरूम्बन के य्ुल्लोक को दृढ़ रूप से बाँध रखा है ।'

( ४२ )

इन उद्धरणों से विदित होता हे कि म्रमणशील सूर्य ने अपनी आकर्षण- शक्ति से थथ्वी, ग्रहोपग्रहों के साथ आकाश था स्थगे॑ (दो) भीर सारे सौर मण्डल को बाँधकर वियमित्र कर रखा हैं। इससे स्पष्ट ही विदित होता है कि आर्यों को सूर्य की आकर्षण-शक्ति औौर खगोछ का शान था। अगले मन्त्र से भी इस मत का समर्थन होता है--इस गतिशीरक चन्द्रमण्डल में जो अन्तहित तेज हैं, वहु आदित्य-किरण ही है! (११६१५) इस मन्त्र पर सायण ने निरुवत (२.६) उद्‌- धृत किया हँं--“अधाप्यस्यैको रश्मिश्चन्द्रमसं प्रति दीप्यते। आदित्यतो5- स्य दीप्तिभवति ।” अर्थात्‌ सूर्य की एक किरण चन्द्रमा को प्रदीप्स करती है। सूर्य से ही उसमें प्रकाश जाता है।'

वैज्ञानिकों के मत से सूर्य की किरणें अनेक रोगों को विनष्ट करती हैं। ऋग्वेद के तीत मन्बरों (६७-८.११-१३) से वैज्ञानिकों के इस मत का समर्थव मिलता है---सूर्य, उदित होकर और उच्चनत आकाश में चढ़कर हमारा मानस (हृदयस्थ) रोग और पीतवर्ण रोग था शरीर- रोग विनष्ट करो। में अपने हरिमाण वा शरीर-रोग को थक सारिका पक्षियों पर न्यस्त करता हूँ। आदित्य मेरे अनिष्टकारी रे के विनाश के लिए समस्त तेज के साथ उदित हुए हें। इससे पता चलता है कि सूर्योपासना से सारे शारीरिक और मानसिक रोग विनष्ट हो जाते हैं। सूर्योपासकों के लिए ये तीन मस्त मुख्य हैं। प्रत्येक सूर्योपासक, अपनी आधि-व्याधि की शान्ति के छिए, इन मन्त्रों को जपता है। सूर्य-नमस्कार के साथ भी इन मतों का जप किया जांता है। सायण के मत से इन्हीं मन्त्रों का जप करने से प्रस्कष्व ऋषि का चर्म-रोय विवष्ट हुआ था।

ऋग्वेद में खगोलवर्त्ती सप्त्षि, ग्रह, तारा, उल्का आदि का भी उल्लेख है। कहा गया है--ये जो सप्तर्षि नक्षत्र हें, जो आकाश में संस्थापित हें और शत होने पर दिखाई देते हें, वे दिन में कहाँ चले जाते हैं ?” (२७.१) मन्त्र के मूल में ऋक्षा:' शब्द है, जिसका अर्थ सायण ने सप्त तारा' किया है। धातु से ऋक्ष शब्द बचा है, जिसका अर्थ उज्ज्वल हैं। इसी लिए वक्ष | का नाम उज्ज्वल पड़ा और सप्तर्षियों का नाम उज्ज्वल भार हुआ। पाशचात्त्य भी इन्हें (57९०६ 85647 कहते हेँ। अन्यान्य मन्त्रों में भी सप्तियों का उल्लेख है

७७.६ में इन्द्र के द्वारा ताराओं को मनिरावरण करना लिखा हे। १३१३४ में ग्रहों, नक्षत्रों और पृथिवी को देवों के द्वारा यथास्थान

( डेईे )

नियमित करने की बात है। १३१९.४ में कहा गया है--मानों आकाश से सूर्य उल्का को फेंक रहे हें। १४०३,७ में १४ भवनों का उल्लख है।

इन मन्त्रों से ज्ञात होत। है कि आये खगोल-विद्या के श्ञाता थे। वैदिक साहित्य के अन्यान्य ग्रन्थों में इसका विस्तार हैं। ऋग्वेद में प्रत्येक विषय सुक्ष्मतम सूत्र में वणित हैं। अतः बड़ी सावधानी से भ्रत्येक विषय का अध्ययन और अन्वेषण करना चाहिए।

परमात्मा

परमात्मा के सम्बन्ध में, कई स्थानों में, सुत्र-रूप से विवृति दी गई है। कहा गया हे--महाप्रलूय-दक्षा में मृत्यु, अमरता, रात या दिन कुछ नहीं था, केवल परमात्मा थे। भविद्यमान वस्तु के द्वारा वह सर्वब्यापी आच्छत्न था। सर्वप्रथम परमात्मा के मन में सृष्टि की इच्छा उत्पन्न हुई। फिर भोकता और भोग्य उत्पन्न हुए। (१४२१-२२. २-५) ये उक्तियाँ उस विश्व-विख्यात नासदीय सृक्‍त की हें, जिसे लो० बाल गंगरा4र तिलक ने मानव-जाति का सर्वश्रेष्ठ चिन्तन' कहा है। इसमें सात मंत्र हैं, जो कण्ठाम्न करने योग्य हें।

दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) मित्रता के साथ एक दरीर में रहते हैं। जीवात्मा भोक्‍ता है और परमात्मा द्रष्टा हैं (२४८.२०)। ईश्वर प्रजा के स्रष्टा और पृथिव्री के धारणकर्ता हैं! (१२५७.८)॥ परमात्मा एक हूं; परन्तु क्रान्तदर्शी विद्वान उनकी अनेक प्रकार से कल्पना करते हूँ (१४०३.५)। सर्वप्रथम केवल परमात्मा थे। वे सबके अद्वितीय अधीश्वर थे। उन्होंने प्थिबी और आकाश को यधथास्थानच स्थापित किया' (१४१२.१)। परमात्मा से सब देव उत्पन्न हुए। (४९९.१)। ईश्वर अनन्त सिरों, नेत्रों और चरणोंवाले हँ। वे ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड के बाहर भी व्याप्त होकर अवस्थित हे / जो कुछ है और जो क्रुछ होनेवाठा है, सो सब ईदवर हें। यह सारा ब्रह्माण्ण उनकी महिमा हँ--वे तो स्वयं अपनी महिमा से भी बड़े हें। उनका एक पैर (अंश) ही ब्रह्माण्ड है। उनके अविनाशी तीन पैर दिव्य छोक में हें। (१३५८-१-३) समाधि-दशा में ब्रह्मात्मेक्य- ज्ञान की अनुभूति में ऋषि कहते हे--संसार में जो तृण खानेवाले हे, वह हम ही है जो अन्न और यव खानेवाले हें, वह हम ही हैं। विस्तृत हृदयाकाश में जो अन्तर्यामी ब्रह्म हें, वह हम ही हैं! (१२४८.९) |

परमात्म-तत्त्व के सम्बन्ध में इस तरह की अनेक उक्तियाँ ऋग्वेद में पाई जाती हैं। इन्हीं के आधार पर ईश्वर-विषयक विस्तृत विवेचन

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संस्कृत-साहित्य में किया गया है। ऋग्वेद के 'नासदीय सूक्‍त', 'पुरुष- सूक्त', 'हिरण्यगर्म-सूक्त' और अस्य वामीय सूक्‍त के सम्बन्ध में तो बड़े-बड़े पोथे रच डाले गये हें और अद्वतवाद, द्वेतवाद, द्वेताद्रेतवाद, विशिष्टाह्वेतवाद तथा विशुद्धाद्वतवाद को लेकर अनल्प कल्पनाएँ की गई हैं। ये सब सृक्‍त बार-बार मनन और निदिध्यासन के योग्य हें। इनके बार-बार स्वाध्याय से अध्यात्म-शास्त्र के सारे सन्देह निवृत्त हो सकते हें

जो लोग केवल यौगिक अथे के पक्षपाती है, उनके लिए तो समस्त वैदिक संहिताओं में परमात्मा ओत-प्रोत और अनुस्यूत हूं।

अवतार ओर मूत्तिपूजा

विष्णु के वामतावतार की कथा का अंकुर ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में पाया जाता है। २३.१७ में कहा गया हँ--विष्णू ने इस जगत्‌ की परिक्रमा की। उन्होंने तीन प्रकार से अपने पैर रखे ओर उनके धूलियुक्त पैर से जगत्‌ छिप-सा गया ।' आगे चलकर कहा गया हैँ --विष्णु ने वामनावतार में तीनों छोकों को नापा था। उन्होंने तीन बार पाद-क्षेप किया था विष्णु के तीन पाद-क्षेप में सारा संसार रहता है।' विष्णु ने अकेले ही एकत्र अवस्थित और अति विस्तीर्ण लछोक-त्रय को तीन बार के पद-क्रमण द्वारा मापा था। (२३१.१-३) त्रिविक्रमावतार में विष्णु ने एक ही पैर से सम्पूर्ण जगत्‌ को आत्रान्त क्रिया था।' (४३३.१४) विष्णु ने अपने तीन पैरों से तीनों छोगों को वामना- वतार में नापा था। (९२६.२७)।

ऋग्वेद के ऐतरेय-ब्राह्मण (६.१५) में इस सन्दर्भ का कुछ विस्तार है--- देवों और असुरों के बीच जब संसार का बँटवारा होने लगा, तब इन्द्र ने कहा--अपने तीन पैरों (तीन बार पाद-क्षेप) से विष्णु जितना माप सकें, उतना संसार देवों का होगा और शेष असुरों का होगा। इस निर्णय से असुर भी सहमत हो गये। पश्चात्‌ विष्णु ने पाद-परिक्रम से जगत्‌ को व्याप्त कर लिया। यजुर्वेद के शतपथव्राह्मण (१.२.५) में उल्लेख हुं--असुरों ने कहा कि वामन-रूप विष्णु के शयन करने पर जितना स्थान आवृत होगा, उतना देवों का, शेष असुरों का। इसका अनुमोदन देवों ने किया | वरिष्णू ने सारे संसार को आबृत कर उसे देवों को दिला दिया ।' |

पुराणों में यही कथा विस्तृत रूप में आई है। इसी लिए पुराणों को भी लोग वेद-भाष्य कहते हें। इसी प्रकार दधीचि, पृथवान्‌, वेव,

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राम, नहुष, उवेशी, पुरुरवा, यदूं, मन्‌, मान्धाता, पृथुश्नवा, सुदास, च्यवन आदि की कथाओं का अंकुर वेद में पाया जाता हैं और इन सबका विशद व्याख्यान महाभारत, वाल्मीकीय रामायण और पुराणों में उपलब्ध है। इसी से कहा गया है-- “इतिहास-पुराणाभ्यां वेद॑ समुपब हयेत विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं अहरिष्यति ॥”

अर्थात्‌ इतिहास और पुराण के द्वारा वेदार्थ का विस्तार करना चाहिए। वेद अल्पश्चत व्यक्ति से डरता हैँ कि 'यह मुझे मारेगा।'

सचमुच ऐसे ही अल्पश्रृत और अद्धं-पक्‍्व व्यक्ति इन दिलों हिन्दू- संस्कृति और आर्य-सम्यता की आधार-शिका (वंदिक वाडमय) पर प्रहार पर प्रहार कर रहे हैं। इतिहास और पुराण के ज्ञान से शून्य व्यक्तियों का परम्परागत वेदार्थ समझना कठिन हूँ

ऋग्वेद में मूत्ति-पूजा का भी अंकुर पाया जाता हैं। ऋग्वेद से' विदित होता है कि पहले दारुसयी या काठ की मूत्तियाँ बनती थीं। काठ श्षीत्र ही विनष्ट हो जाता है। यही कारण हे कि इन दिलों प्राचीनतम भूत्तियाँ नहीं पायी जातीं और अल्पश्रुत व्यक्ति मूत्तिपूजा के मूल पर ही क्रुठटाराधात करते हेँ। ऋग्वेद (५०८.२३) से स्पष्ट ही ज्ञात होता है कि काष्ठ की मूत्तियाँ बनती थीं। इससे यह भी पता चलता है कि ये मूत्तियःँ सेव्य थीं। इसी मंत्र में मूत्ति-पुजा का अंकुर है, जिसका विस्तार पुराणादि में किया गया है।

सर हक आत्म! ओर पुनजन्प

परलोक वा देवयान और पितृयान का विवरण जिन सुकतों में है, उन्हीं में आत्मा और पुनर्जन्म का भी कथन हूँ। अन्यत्र भी है। १२३२.३ में कहा गया है-- व्यक्ति का एक अंश (आत्मा) जन्म- रहित और शाश्वत हूँ / २४८.२० में जीवात्मा को कर्मफल-भोक्‍ता बताया गया हैं।

१२३५.२ में इस जन्म और पूवे जन्म के पापों से शून्य होकर पवित्र बनने की बात है ।/ १४५८ पृष्ठ के तीनों मन्त्रों में जीवात्मा और जन्मान्तर का विवरण है---मानस चक्ष्‌ से विद्वानों ने देखा कि जीवात्मा को माया आक्रान्त कर चुकी है। पंडितों ने कहा कि यह समुद्र (परमात्मा में घटित हो रहा है विद्वान्‌ (ज्ञानी) परमात्मा की किरणों (ज्योति में जाने की इच्छा करते हैं।' पतंग (जीवात्मा) को गर्भ में ही गन्धवों वा देवों ने वाक्य सिखाया। वह दिव्य, स्वर्ग-सुखदाता और बुद्धि का

फा०

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अधीश्वर है। सत्य मार्ग में विद्वान उस वाणी की रक्षा करते हैं।' तात्पर्य यह है कि गर्भावस्‍था में ही जीवात्मा को देवों वा ईश्वरीय शक्ति के द्वारा बीज-रूप से शब्द प्राप्त हो जाते हें शब्दकी शक्ति असीम होती है। उसे बद्धिमान्‌ लोग मिथ्या की ओर नहीं के जाते।' तीसरे मन्त्र का अर्थ हु--जीवात्मा का कभी पतन वा विनाश नहीं होता। वह कभी समीष और कभी दूर, नाना मार्गों (योनियों) में, अमण करता है बह कभी अनेक वस्त्र पहनता (अनेक गृण धारण करता) है और कभी (नीच योनियों) में पृथक्‌ू-पृथक्‌ (दो-एक अल्प गुण) पहनता (धारण करता) है। इस प्रकार संसार में वह बार-बार आता-जाता है।'

आत्मा और पूनर्जन्म के रहस्य का विस्तृत विवेचन दर्दशनशास्त्र और पुराणादि में किया गया हे। आत्मा के सम्बन्ध में तो संस्कृत- * साहित्य के अनेकानेक पाण्डित्य-पूर्ण ग्रन्थों में विशद विवेचन किया गया है। पुतजेन्म का विज्ञान आय॑-श्षास्त्रों की विशिष्ट संस्कृति हें। क्रिदिचयानिटी, इस्लाम आदि धर्म पुनर्जन्म के विवेचल और विज्ञान से दूर भाग कर पुनर्जन्म को ही अस्वीकृत कर डालते हें। किन्तु बौद्ध, जैन आदि इस विज्ञान को शिरसा अंगीकृत करते हैं।

यज्ञ-रहरय

जैन-बौद्धों में अहिसा, ईसाइयों में दया, सिखों में भक्ति और इस्लाम में नमाज का जो महत्त्व है, वही वा उससे भी बढ़कर वैदिक धर्म में यज्ञ का है। वेद-धर्म का प्रधान अंग यज्ञ हूँ वस्तुतः किसी भी धर्म का, किसी भी राष्ट्र का, किसी भी समाज का और किसी भी व्यक्ति का क्रियात्मक रूप ही उसका प्राण है। क्रियात्मक रूप के अभाव में कोई भी धर्म, राष्ट्र समाज वा व्यक्ति निःसत्त्व, निष्प्राण और जड़ीभूत शव है।

इसी लिए ऋग्वेद (१३५९.८-१०) में कहा गया है, यज्ञ से ही' बेद, छंद, गौ और चतुष्पद उत्पन्न हुए। “ध्यान-यज्ञ से देवों ने यज्ञ- पुरुष की पूजा की। यज्ञ ही प्रथम वा मुख्य धर्म हैं! (१३५९.१६) | तपस्वियों ने यज्ञ-पुरुष को हृदय में प्रबुद्ध किया' (१३५८.६-७)। यज्ञ सत्यरूप और सत्यात्मा है! (११४८.८-९) | देवों ने ज्योति, आयु, और गौ के लिए ज्ञान-साधक यज्ञ का विस्तार किया था' (१०४९.२१)।

अथर्ववेद की घोषणा हँ--“अयं यज्ञों भुवनस्य नाभिः।” अर्थात्‌ “विश्व की उत्पत्ति का स्थान यह यज्ञ है। सभी कर्मों में श्रेष्ठ कमे यज्ञ हैं! (शतपथब्राह्मण १.७.४.५)। शतपथ यज्ञ को ईश्वरीय बताता

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है-- प्रजापतिर्वे यज्ञ:”, विष्णुवें यज्ञ:।” यज्ञ को सूर्य के समान तेजस्वी कहा गया हँ--“स यज्ञोज्सौ आदित्य:” (शतपथब्राह्मयण १४.१.१.६६ यज्ञ करनेवालछा सारे पापों से छूट जाता है? (शतपथनब्राह्मण २.३.१.६) ऐदरेयब्राह्मण (१.४.३) का मत है, यज्ञ और मंत्रों के उच्चारण से' वायू मण्डल में परिवर्तन हो जाता है और निखिल विश्व में धर्म-चक्र चलने रूगता हैं। ' ब्राह्मण-प्रंथों में यज्ञ को विश्व का नियामक भी कहा गया हूं।

वस्तुतः यज्ञ में मंत्र-पाठ से चित्त श्ान्‍्त और मन सबलर होता' है। यज्ञाग्नि में दी गयी हवि वायू के सहारे सूयं॑ की ओर जाकर समस्त अन्तरिक्ष में व्याप्त होती है। सूर्य के प्रभाव से मेघ-मण्डलू के साथ' धूम-मिश्वित हि के मिल जाने पर वर्षा होती है। वर्षा से अन्न उत्पन्न होता और अन्न से प्रजा की रक्षा होती है। हवि से पार्थिव पदायें, वायू ओर सूर्य-रश्मि आदि भी बुद्ध होते हे। हवि से देवता तृप्त होकर मायव-समाज का कल्याण करते हैं। यज्ञ में देव-पूजन के कारुण याज्ञिक को देवत्व की भ्राप्ति होती है। यज्ञ के कर्म-फल से स्वर्ग की प्राप्ति होती है (२२.६) जैमिनीय मीमांसा के मत से यज्ञ से ही मुक्ति मिलती है।

जैसे सूर्य के द्वारा संसार की दुर्गन्‍्ध दूर होती है और जछू पवित्र होता है, वैसे ही यज्ञ के द्वारा भी दुर्गन्‍्ध दूर होती और जल पवित्र होता है। यज्ञ के द्वारा विशुद्ध वर्षा-जलू अन्य जल को और अन्न को शुद्ध के रता है। शुद्ध अन्न-जल वे ही शरीर स्वस्थ और मन पवित्र रहता है इसी लिए कहा गया हँ--बृष्टि-कामों यजेत” (वर्षा चाहनेवार यज्ञ करे)।

अन्यान्य छाभों के अतिरिक्त यज्ञों के कारण विविध कलाओं की उत्पत्ति भी हुई। यज्ञ-सम्पादन के लिए सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की गति का निरीक्षण करते-करते ज्योतिष-विद्या की उत्पत्ति हुई। यज्ञों में विशुद्ध मन्‍्त्रोच्चारण के विचार से आये छोग जिन नियमों की समीक्षा करते थे, उनसे देव-विद्या, ब्रह्म-विद्या और व्याकरण-दश्ास्त्र का जन्म हुआ। यज्ञ-सम्पादन के लिए जो चिति, थज्ञ-वेदी, रेखा आदि का निर्माण किया जाता था, उसके नियमों से संसार में ज्यामिति-शास्त्र का आविष्कार हुआ। दो अश्र (30027८$ ), चार अश्र (/7797022 ), द्रोणकार (॥70०९2) वाली वेदियों और चितियों के निर्माण ने रेखागणित-शास्त्र का आविष्कार कर दिया। कत्पसूृत्रों के शुल्व-सृत्रों में इसका विस्तृत विवरण पाया जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान्‌ कृष्ण ने यज्ञ की परम्परा-प्राप्त

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व्याख्या की है और यज्ञ-रहस्थ का सुन्दर विवेचन किया है। यज्ञ का अर्थ यजन, पूजन, समादर, परोपकार-ब्रत, लोकल्थाण, अ42-फरछोत्पादकता आदि को तो माना ही गया है, यज्ञ के भेदोभेद तथा प्रविरूढ़ रहस्य का भी गीता ने विवरण दिया हे। पहले ही गीता का उद्घोष है :--- “यज्ञार्थात्कमंणोहन्यत्र लोको5यं कर्मबन्धन:।” अर्थात्‌ यज्ञ के लिए जो कर्म किये जाते हें, उनके अतिरिक्त, अन्य कर्मों से यह लोक बँघा हुआ है ।' तात्पयं यह है कि यज्ञ-कर्म मृक्ति देनेवाल हुँ और अन्य कर्म बन्धन डालनेवाले हें। आगे कहा गया ह--नायं लोकोसस्त्यवज्नस्य कुतोष्न्यः कुरुसत्तम ।” अर्थात्‌ यज्ञ करनेवाले को जब कि इस लोक में ही कोई सफलता नहीं मिलती, तब उसे परलोक कहाँ से मिलेगा ?!

भगवदगीता के इलोकों (३.१०-१५) में भगवान्‌ कृष्ण ने यज्ञ की व्याख्या इस प्रकार की हे--यज्ञ के साथ प्रजा को उत्पन्न करके' प्रजापति ब्रह्मा न॑ प्रजा से कहा--'यज्ञ के द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो। यह तुम्हें इच्छित फल दे ।” तुम यज्ञ के द्वारा देवताओं को सन्तुष्ट करते रहो ओर वे देवता तुम्हें सन्तुष्ट करते रहें। इस तरह परस्पर सन्तुष्ट करते हुए दोनों परम कल्याण प्राप्त करो। यज्ञ से सन्तुष्ट होकर देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। उन्हीं का दिया हुआ उन्हें वापस देकर जो केवल स्वयं उपभोग करता है, वह स्चमृच चोर हूँ। यज्ञ करके बचे हुए भाग को ग्रहण करनेवाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु यज्ञ करके केवल अपने ही लिए जो अन्न पकाते हैं, वे पाप भक्षण करते हे। थ्राणियों की उत्पत्ति अन्न से होती है, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और कम से यज्ञ की उत्पत्ति होती है। कर्म की उत्पत्ति प्रकृति से हुई हैँ और प्रकृति परमेश्वर से उत्पन्न हुई हैं। इसलिए सर्व-व्यापक ब्रह्म सदा यज्ञ में विद्यमान रहते हें। इस प्रकार जगत्‌ की रक्षा के लिए चलाये हुए यज्ञ-क्र को जो आगे नहीं चलाता, उसकी आय पाप-रूप हूँ। देवों को देकर स्वयं उपभोग करनेवाले मनुष्य का जीवन व्यर्थ हेँ।'

इन इलोकार्थों से ज्ञात होता है कि यज्ञ करना और देवों को सन्तुष्ट करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवायं है, यज्ञ करनेवाला चोर और पापी हें, यज्ञ से ही परम्परया जीवों की उत्पत्ति और उनकी प्राण-रक्षा' होती हूं, यज्ञ में साक्षात्‌ परमात्मा विराजते हें और यज्ञ करनेवाले का जीवन ही वृथा €।

यज्ञ करता भगवान्‌ की सेवा करना है। भगवान्‌ ने स्पष्ट कहा है--श्रद्धा के साथ अन्य देवों के भक्त बनकर जो लोग यजन (यज्ञ )।

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करते हैं, वे भी मेरा ही यजन करते हें; क्योंकि में ही सारे यज्ञीय पदार्थों का भोक्‍ता और स्वामी हूँ। (गीता ९.२३-२४)।

१७वें अध्याय (११-१३ इझ्लोकों) में श्रीकृष्ण ने सात्विक, राजस और तामस यज्ञों के छक्षण भी बताये हैं। कहा गया है--फलाशा छोड़कर और कर्तव्य समझकर, शास्त्रीय विधि के अनुसार, शान्‍्त चित्त से, जो यज्ञ किया जाता है, वह सात्तिक है फल की इच्छा से और ऐश्वयं का प्रदर्शन करने के लिए जो यज्ञ किया जाता है, वह राजस है। शास्त्र-विधि- रहित, अन्नदान-विहीन, विना मन्त्रों का, बिना दक्षिणा का, श्रद्धा-श्न्य यज्ञ तामस यज्ञ हूँ चतुथे अध्याय के २४वें इलोक में भगवान्‌ ने कहा हँ--यज्ञ-साधक ब्रह्म को पाता हें। इसी अध्याय के २३वें इलोक में कहा गया हँ--यज्ञ के लिए कम करनेवाले के सारे (भव-) बन्धन छूट जाते हैं।'

इसी स्थल पर भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने ब्रह्मययज्ञ, संयम-यज्ञ, योग-यज्ञ, द्रव्य-यजञ्ञ, स्वाध्याय-यज्ञ, शान-यज्ञ आदि कितने ही यज्ञों को बताया हैँ और यह भी कहा हे कि इन सारे यज्ञों का उल्लेख वेद में है श्रीकृष्ण ने अन्त में यह भी कहा दे कि “ज्ञ से मृक्ति प्राप्त होती है यहीं (४.३२) गांधी जी ने भी अपने “अनासक्ति-योग” में छिखा है-- यज्ञ के विना मोक्ष नहीं होता /' यज्ञ से ही मीमांसा भी मोक्ष मानती है। यह बात पहले भी कही गई है।

ऋग्वेद (१०५८.३) में ब्रत-रहित (अयाज्ञिक) की कुत्सा की गयी हैं १२४१.८ में यज्ञ-शुन्य को दस्य (चोर) और आसुरी प्रकृति का बताया गया है। ९४७.१४ में तो इतनी दूर तक कहा गया है कि अयाज्ञिक इतना बुद्धि-अ्रष्ट होता है कि वह सुरा वा मद्य पीकर पागल हो जाता है ।' याज्िक ब्राह्मणों की प्रशंशा को गयी है (८८४--८५.१ ओर ७-८)। १९०.१ में कहा गया हूँ कि भावयव्य के पुत्र राजा स्वनय ने हजार सोमयज्ञ किये थे। २६५.१ में सोम-यज्ञ में उद्गाता' के द्वारा सामवेद के आकाशब्यापी गान' की बात कही गयी है १२०७.२ में कहा गया हैँ कि दूर देश से साम-ध्वनि सुनाई देती है।' बस्तुतः यज्ञ में मन्त्र-गान की मेघ-मन्द्र-ध्वनि मनःप्राणों को आनन्द-रस में आप्लत कर देती हूँ

यज्ञ के भेद, विधि, सामग्री, ऋत्विक-भेद आदि आदि जानने के लिए विविध ब्राह्मण-प्रन्थ, विभिन्न श्रौतसूत्र, गृह्यसत्र और आपस्तम्ब ऋषि का “यज्ञपरिभाषासूत्र” आदि देखने चाहिए। स्थानाभाव से यहाँ अधिक नहीं लिखा जा सका। '

( ५४० ) समुद्र ओर नदियाँ

पहले ही. कहा गया हे कि आये छोग अपनी चारों दिशाओं के चार समुद्रों में व्यापार-वाणिज्य करते थे (७८.२, ११०४-६ और १२८५.२) सम्‌द्र में विशालकाय नौकाएँ चलती थीं! (६२.८, ६४.३, २८.७, ५२४.५ भादि) | समुद्र के' मध्य से राजा तुम्न के पुत्र भृज्य के उद्धार की बात भी पहले ही लिखी गयी है (१५७.६) एक मन्त्र (८६९.३) में कहा गया हँ---जिस समय में (वसिष्ठ) और वरुण, दोनों नौका पर चढ़े थे, जिस समय समुद्र के बीच में नौका को हमने भली भाँति संचालित किया था और जिस समय जल के ऊपर नाव पर हम थे, उस समय शोभा के लिए नौका-रूपी झूले पर हमने सुख से क्रीड़ा की थी। इस प्रकार समुद्र आरयों के क्रीड़ा-स्थल थे। समुद्र के मध्य द्वीप में, निर्जन प्रदेश में, भी आयों की अबाध गति थी (१२२१.१)

१४२९.४-५ में लिखा हे---'मुनि लोग' आकाश में उड़ सकते और सारे पदार्थों को देख सकते हैं! तथा 'मृनि छोग पूर्व और पश्चिम के दोनों समुद्रों में निवास करते हूँ।' यहाँ दो समृद्रों का उल्लेख है। इसके पहले के और मन्त्रों में कहा गया है कि मुनि लोग पीले वल्कछ पहनते और देवत्व प्राप्त करके वायू की गति के अनूगामी हैं” तथा सारे छौकिक व्यवहारों के विसर्जन से हम' (मूनि लोग) परमहंस हो . गये हें। हम वायु के ऊपर चढ़ गये हें।' इन मंत्रों से पता चलता है कि मुनि छोग महान्‌ त्यागी और तपस्वी होते थे, वे वल्कल पहनते थे, बे वायू-पथ-गामी और आकाशचारी होते थे तथा समूद्रों में भी निवास करते थे। तात्परय यह है कि वे देवत्व प्राप्त करके जल, स्थल, वायु और आकाश में स्वतन्त्र विहरण करते थे--उनकी सबमें अप्रतिहत गति थी।

अश्विनीकुमारों की समुद्रगामिनी नौकाएँ पंखोंवाली और सौ डॉड्रॉवाली थीं. (२७६.५ और १६७.५), यह पहले भी छिखा जा चुकः हे। अन्य अनेक स्थानों में भी समुद्रों और नौकाओं का उल्लेख है।

१३३०.५-६ मन्‍्त्रों में इन नदियों के नाम आये हे--गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री (सतलूज), परुष्णी (राबी), असिक्‌नी (चिनाब), मरुदवृधा (मरुवदंबन), वितस्ता (झेलम), सुषोमा (सोहान), आर्जीकीया (व्यास), सिन्धु, सुसरत्तु (स्वात), रसा (रहा), ब्वेत्या (अरजुनी ), तृष्टामा, मेहत्नू, क्रम (कुरंम), गोमती (गोमलछ) और कुभा (काबुल) तृथ्टामा, सुसत्तुं, रसा, श्वेत्या और मेहत्नू सिन्धु नदी की पश्चिमी सहायक नदियाँ हेँ। अश्मन्वती, अंशुमती, अंजसी, अनितभा,

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आपया, कुलिशी, जह्लावी, दुषद्गवती, यव्यावती, विपाश, विवाली, शिफा, सरयू, हरियूपीया आदि अन्यान्य नदियों के नाम' भी ऋग्वेद में पाये जाते हें। इस ग्रन्थ की विषय- यी त्री में और इस ग्रन्थ में इन नदियों के अतिरिक्त ऋग्वेद की अन्य गदियों का भी विवरण मिलेगा

सिन्ध्‌ नदी का सर्वाधिक वर्णन मिलता है। समुद्र और नदी के अर्थ में भी सिन्धू शब्द आया है। ईरानी या पारसी सिन्धू को हिन्दू कहते थे। ईरानी सकोह और को कहते थे। कहा जाता है कि इसी लिए सिन्ध्‌ के पार रहनेवाले हिन्दू कहछाये और इस देश का नाम हिन्दुस्थान पड़ा अमेरिकी तो इस देश की रहनेवाली हर एक जाति को हिन्दू कहते हें। ग्रीक या यूनानी सिन्धु को 'इन्दस” कहते थे। इसी' इन्दस्‌ वा इंडसू से इंडिया और इंडियन शब्द बने हें

सिन्धु-तट पर अच्छे घोड़े होते थे; इस लिए घोड़े का नाम सैन्धव भीईं। सिन्धू को समुद्र भी कहा जाता है और समुद्र में नमक होता हैं; इसलिए नमक का भी एक नाम सैन्धव (सेंधा नमक) पड़ गया।

ऋणग्वेद में सरस्वती का भी ललित विवरण पाया जाता है 558 (२५ अध्याय, १३५-३६ इलोकों) में नदी और देवी--दोनों अर्थों में सरस्वती का उल्लेख है. शौनक के मत से मल्त्रों में ही सरस्वती नदी' मानी गयी हैँ परन्तु ऋग्वेद के ३५ मन्त्रों में सरस्वती का उल्लेख मिलता है। इसके तट पर अनेक यज्ञ और युद्ध हुए थे। मैक्समूलर की राय से इसके तट पर अनेक मन्त्र रचे गये थे इसमें सन्देह नहीं कि आय॑ लोग गंगा से भी बढ़कर सरस्वती को मानते थे ऋग्वेद में गंगा का उल्लेख दो ही बार है।

सरस्वती का उत्पत्ति-स्थात मीरपुर पर्वत माना गया है अनेकों के मत से कुरुक्षेत्र के पास सरस्वती बहती थी और वह पटियाला राज्य में विलुप्त हो चुकी हैं बहुतों की राय में सरस्वती बीकानेर की मर्भूमि में लप्त हुई है। परन्तु पुराणों के अनुसार सरस्वती पृथिवी के भीतर ही भीतर आकर प्रयाग में गंगा और यमुना के साथ मिल गयी है। इन्हीं तीनों का नाम त्रिवेणी है।

१८१.१३ में लिखा हे कि इन्द्र नौका द्वारा सब्बे नदियों के पार गये' थे। २८९.१३ में निनानबे (९९) नदियों के नामों का कीर्चन किया गया है। परन्तु ऋग्वेद में तो ९० वा ९९ नदियों के नाम अलध्य हे। वया मन्तों के समान इन नदियों के नाम' भी लुप्त हो गये ?

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कर देश वा विदेश ?

ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर कीकट, कुरु, गन्धार, चेदि, पारावत आदि अन्‍्तदेंशों के नाम आये हैँं। परन्तु कुछ एसे देशों के भी नाम आये हैं, जिनके सम्बन्ध में निर्चय-पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये नाम अन्तदंशों के हें या विदेशों के !

१०९२.२ में पाँच देशों के परस्पर मित्र मनुष्यों" की बात कही गयी हे। पता नहीं, ये पाँचों देश कहाँ और कौन थे ! ७३४.२१ में दासों के निवास उदव्नज” देश का नाम आया है। भगवान्‌ जाने, यह देश कहाँ था ! ५७८.१२ से १५ तक के मन्त्रों में रशम देश का उल्लेख है, जहाँ के राजा ऋणञ्जय थे और जहाँ के निवासियों ने बश्र ऋषि को चार हजार गायें दान दी थीं। ११३२.२३ में आर्जीक देश का उल्लेख है। १२८६.८ में गुंगओं के देश का नाम आया है। १२८८.४ में वेतसु देश का उल्लेख है। जैसे ऋग्वेद के जर्भरी, तुर्फरी, फरफरीका, आलिगी, विलिगी, तैमात, ताबुबम्‌ आदि शब्दों के अर्थ सन्दिग्ध हें, वैसे ही इन देशों का स्थान-निर्णय भी संदिग्ध है

आय -जावि

ऋग्वेद में आर्य-जाति की विवृति देखकर आइचर्य होता हे कि अगणित वर्ष पहले आर्यों की संस्कृति कितनी उच्च थी, उनका मस्तिष्क कितना उदात्त था और आर्य आध्यात्मिक, आधिदेविक और आधि- भौतिक विषयों में कितनी उन्नति कर चुके थे !

भर्य-जाति के प्रबल प्रताप का लोहा पृथिवी-मण्डल की रामग्र भानव' जाति मानती थी---अब तक मानती है आजकल जड़वादी अभ्युदय, वेज्ञानिक उन्नति और सम्यता के शिखर पर पहुँचने का दम भरनेवाली पाश्चात्त्य जातियाँ भी अपने को आयै-वंशज कहलाने में गर्व॑ और! गौरव का अनुभव करती है ! ये मानती हे कि समृची धरित्री पर आर्य- जाति की संस्कृति की अमिट छाप पड़ी हुई है और प्रायः निखिल महीमण्डल में आयों की अबाध गति और आधिपत्य के प्रमाण उपलब्ध हैं। एशिया, यूरोप और अमेरिका तक में वैदिक संस्कृति के चिह्च अब तक पाये जाते हें। मैक्समृुलर के मत से आर्यों की अप्रतिहत गति और अमिट आधिपत्य के प्रमाण ईरान, अर्मनी, अलबानिया, आयरत, आरियाई, आयलेंड, एरिन आदि आदि स्थाव-नाम भी हैं।

ऋणग्वेद में आय-जाति की प्रतिभा के अपरिमित प्रमाण पाये जाते

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हं। १२०५.२ में कहा गया हे, महान मनुष्यों (आयों) के राज्य में हम तुम्हारा स्तोत्र करते हैं।' इन्द्र ने आर्य-दादि के लिए ज्योति दी है। इन्द्र ने आर्य-भाव द्वारा दस्यु का अतिक्रम किया हैँ (३०५- १८-१९) आर्यों का एक मात्र धन ब्रह्मचय-देज था। इस बात को ऋग्वेद (३२४.१५) में थों कहा गया है--बृहस्पति, जिस धन की आये पूजा करते हे दो दीप्ति और यज्ञवाला धन लोगों (समाज) में शोभा पाता है, जो धन अपनी दीप्ति से प्रदीप्त है, वही विलक्षण घन अर्थात्‌ ब्रह्मचय-तेज हमें दो।' इसी ब्रह्मचर्य-तेज में आयों के अभ्युदय का रहस्य छिपा हुआ है ४९८.२ में तो स्पष्ट ही कहा गया है कि हमने (इन्द्र ने) आर्य-जाति को दान में पृथिवी दे दी है।! फिर समस्त भूमण्डल पर आये-राज्य के आधिपत्य में सनन्‍्देह ही क्या रहा ? अग्निदेव को आर्यों का संवद्धन-कारी कहा गया है (१०६८.२)। एक मन्त्र (८४६.२) में तो आये को स्वाभाविक स्वामी वा ईश्वर बताया गया हैं।

आर्यों की संस्कृति और धर्म जैन-बौद्धों की तरह जीवन-संग्राम' से पलायनवादी नहीं थे। आर्य शूर-वीर थे और उनके सारे कर्म वीरता- पूर्ण थे। वे समादरणीय मल्लके समान प्रसन्न-वदन और यशः-शाली' थे (९४४.२०)। आये महान हृदय और अत्यन्त उदार मस्तिष्क के थे। उनकी माता मेदिनी और पिता स्वर्ग था (१२२.४)। वे 'मातृ- स्वरूपिणी और सुख्र॒कारिणी पृथिवी की शरण में जाने को छालायित रहते थे (१२३६-१०) वे ईश्वरीय ज्योति से जगमगाते रहते थे और वत्तंमान तथा भविष्य की सारी घटनाओं को देखते' रहते थे (२९.११) वे किसी के सामने दीनता प्रकट करनेवाले नहीं थें (३३३.११)। उनका सुदृढ़ सिद्धान्त था--व दैन्‍्यं नपरायनम्‌। वे संसार के हितेषी पुरुष' थे (९६.२)

आर्यों का उद्घोष था--- जिसका मन उदार नहीं है, उसका भोजन करना वा अजन्ञ उत्पादन करना वृथा है। उसका भोजन करना वा अन्न उत्पादन करना उसकी मृत्यु के समान है जो तो देवता को देता है, मित्र को देता है, प्रत्युत स्वयं ही मोजन करता है, वह केवल पाप ही खाता है--केवलाघो भवति केवलादी' (१४०८.६ )। निष्कर्ष यह हे कि स्वार्थी का जीवन पापमय और घृणित है।

वे सत्य के लिए सर्वस्व स्वाह्य करने को तैयार रहते थे। वे अपना बाह्य और आन्तर---सब सत्यमय देखना चाहते थे। वे अपने सामने असत्यवादी को देखना तक नहीं चाहते थे। वे अपने इदृष्टदेव से याचना' करते थे--हमें ऐसा पुत्र दो, जो सत्य का पान करनेवाला हो और

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परिजनों के साथ रणांगण में शत्र का संहार करनेबाला हो (५७०.६)। वे ऐसे पुत्र की याचना करते थे, जो अपन कम से अपने पूर्वजों के यश को प्रख्यात करनेवाला हो” (५७०.५)। उनका सुदृढ़ सिद्धान्त था-- पापी मनृष्य सत्य मार्ग से नहीं जा सकते! (११४८.६) | उनका अचल मत था--यज्ञ-हीन, सत्य-रहित और सत्यवचन-दून्‍्य पापी नरक- स्थान को उत्पन्न करता है” (४६२.५) |

सत्य के समान ही आर्यों के सदाचारी जीवन, उदारता, शुभ संकल्प, निर्भवता, स्वावलम्बन, विद्व-प्रेम, निर्लोभि और सामाजिक संघटन का उल्लेख भी अनेक मन्त्रों में है विस्तार-भय से यहाँ सबको लिखना सम्भव नहीं। परन्तु इस समय के लिए अत्यन्त उपयुक्त कार्यों के संघटन और एकत्व-बुद्धि को तो प्रत्येक देश-प्रंमी को शिरसा ग्रहण कर लेना चाहिए। उनका पवित्र आदेश हे--एक मन होकर जागो (१३- ८१.१) तुम्हारा अध्यवसाय एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों और तुम्हारा अन्तः:करण एक हो। तुम लोगों का सर्वांगपूर्ण (सम्पूर्ण रूप से ) संघटन हो' (ऋग्वेद का अन्तिम मन्त्र)

अपनी सन्‍्तान के लिए आर्यो का यही अजर और अमर उपदेश है। यदि इस उपदेश पर हम अचल और अडिग रहें, तो अणुबम, उद्जन' बम, कोबाल्ट बम वा इनसे भी भीषणतम बम हमारा बार भी बाँका नहीं कर सकेंगे--ये हमें खिलवाड जंंचेंगे।

आये की युद्ध-कला

, ऋग्वेद में यथेष्ट युद्धइ-वर्णेव है। वस्तुत: जीवन विलात्िता में नहीं है। जीवन है तप में, जीवन हे युद्ध में। मुख्य बात यह है कि जीवन ही' संग्राममय है तब जीवन का रहस्य बतानेवाले ऋग्वेद में युद्ध-वर्णन क्यों नहो? और, जो समाज के शत्रु हैं, मनुष्यों में जो राक्षस है, वे तो सचमच ताड़न के अधिकारी' हैं। दुष्ट-दमन हो तो मनुष्य की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था और समस्त श्रुति-मार्ग ही भ्रष्ट' होने का भय है इसलिए ऋणग्वेद में दृष्ट-दलन की आज्ञा का उल्लेख उपयुक्त है।

हे के समय धौंसे की घुषुकार से आकाश घहरा उठता था। कहा गया ह-- है युद्ध-दुन्दुभि, अपने शब्द से स्वर्ग और धरणी को परिपूर्ण कर दो--स्थावर और जंगम--सब इसे जान जाय॑े।' दुन्दुभि, हमारे शत्रुओं को रुठाओ। हमें बल दो। इतने जोर से बजो कि दुर्द्ध॑ शत्रुओं को दो 'मिछे। दुन्दुभि, जो हमारा अनिष्ट करके आनन्दित होते हे, न्हें दूर हटाओ। (७३५-२९-३०)। आगे कहा गया है---जुझाऊ

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बाजा भयंकर रीति से घहरा रहा है। गोधा (हस्तघ्व नाम का बाजा) चारों दिशाओं में निनाद कर रहा है। पिगल वर्ण की ज्या (प्रत्यञ्चा ) शब्द कर रही हैं! (१०२१.९)। सशस्त्र सेना के सम्बन्ध में कहा गया हे-- इन्द्र की सहायता से हम हथियारबन्द छड़ाकों की सुसज्जित सेना के शत्रु को भी जीत सकेंगे! (८.४)। स्वामी के द्वारा संचालित सेना अथवा धनुर्द्धारी के दीप्ति-मुख वाण के समान अग्नि शत्रुओं में भय उत्पन्न करते है” (९४.४) <ुन्दुमि नियत उच्च निवाद कर रही है। हमारे सेनानी घोड़ों पर चढ़कर इकट्ठे हुए हैं। हमारे रथारूढ़ सैनिक और सेनाएँ युद्ध में विजयी बनें! (७३५.३१)

युद्ध में आर्य अनेकानेक शस्त्रास्त्रों का प्रयोग करते थे। थे लोहे का कवच पहनते थे! (७८.३) जिस समय राजा छौह-कवच पहनकर जाता है, उस समय वह साक्षात्‌ मेघ मालूम पड़ता है! (७७१.१) योद्धा कवच के आश्रय में रहते हें” (१०००.८)।

युद्ध में धनुष और वाण का प्रयोग बहुत होता था। धनुष्‌ आया का प्रिय शस्त्र था। हम धनुष्‌ से समस्त दिशाओं में स्थित शत्रुओं को जीतेंगे। 'ज्या वाण का थालिंगन करके शब्द करती हैँ ।' 'दोनों धनुष्‌- कोटियाँ शत्रओं को छेद डालें ।' तुणीर वा तरकस वाणों का पिता है वाण निकलते समय तुणीर 'त्रिदवा' शब्द करता है। तुणीर सारे शत्रुओं को जीत डालता है! (७७२.२-५)। आर्यों के घोड़े टापों से धूलि 0308 और रथ के साथ सवेग जाते हुए हिनहिनाते हैं और शत्रुओं को टापों से पीटते हें! (७७२.७) |

पुराने काठों, पक्षियों के पक्षों और उज्ज्वल शिलाओं से वाण बनाये जाते थे! (१२०७.२) | वाण विषाक्त और लौह-मुख भी होते थे! (७७३. १५) | ज्या वा प्रत्यञज्चा गो-चर्मं की बनती थी (१२५०.२२)।

हस्तत्राण (दस्ताना ? ) और कर्त्तत (कटार) भी थे! (२६०.३) आर्यो के नाना प्रकार के और बड़े शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र होते थे। शतद्वार' नाम का प्रसिद्ध अस्त्र था (६८.३) रुद्र के अस्त्र का नाम हिति' था (३४०. १४) इन्द्र के आयूध का नाम ह्रिद्वर्ण' था (४१७.४) शक्ति” नाम का अस्त्र भी इन्द्र के पास था (१४२७.६)। तलवार वा 'लौहमय खडग' का बहुत बार उल्लेख है (७३२.१० और १३५६.८) दो धारोंवाली तलवार भी थी (१३५०.७)। लोहे के कुठार बनते थे (६६४-४ और १२९३.९)। फरसे और मुद्गर भी थे (2८९.२१)। हाथी को वश में करने के लिए अंकुश थे (१३९०.६)॥ आर्य देवास्त्रों का भी व्यवहार करते थे।

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आर्यों के रथ सौ-सौ चक्‍कों और ६-६ घोडोंवाले भी होते थे (१६७.४) , 'हजार प्ताकाओंबवाले रथ भी थे (१७५.१)। पाँच- पाँच सौ रथ एक साथ चलते थे (१३६६-१४) ' रथ पर आठ सारथियों के बैठने योग्य स्थान होते थे (१२९३.७)। नगर के चारों ओर परिखा वा खाई होती थी (२०१४) ४० कोरा अतिदिन चलनंवाले घोड़े थे (८९१.९)। काष्ठ-खण्ड से सीमा बाँध कर पड़दौड़ की जाती थी (१६९ १७ और १४४४.१) असाधारण-बलशाली मुप्टिका- प्रहार से भी शत्रओं को मार डालते थे (७०६९.२) |

अंशुमती नदी के तट पर रहनेवाले कृष्णासुर की दस हजार सेनाओं का विनाश कर डाला गया था (१०५७.१३) शम्बरासुर की ९९ पुरियों का विनाश करके १००वीं पर अधिकार किया गया था (७९७.५)। युद्ध में ऐरावत हाथी से शत्रुओं के सिर कुचले जाते थे (२०४-२ ) | इन्द्र ने १५० सेनाओं का विनाश किया था (२०४.४) पचास हजार काले राक्षमों का वध किया गया था (४७७.१३) एक बार ३० हजार राक्षसों का विनाश किया गया था! (५०४.२१)।

परन्तु आर्यों का सबसे बड़ा युद्ध 'दशराज्ञयुद्ध/ था। कदाचित्‌ दस यज्ञ- विहीन राजाओं के साथ सूर्यबंशी सुदास राजा का भीषण युद्ध हुआ था (८६४.६-७) | सुदास के सहायक वसिष्ठगण और लृत्सुगण आदि थे (८१३.३ और ५)। इसमें भेद (नास्तिक) का भी बंध किया गया था गे १९) इस प्रसिद्ध युद्ध में ६६०६६ व्यक्ति मारे गये थे (७९४. १४)

वायुयान

ऋग्वेद में विमान, वायुयाव था आकाशयान का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं है; परन्तु अनंक भन्त्रों में कुछ इस तरह का विवरण पाया जाता है, जिससे अनेक वेदज्ञ यह अनमान लगाते हँ कि ऋग्वेद में विमान की बातें हें। अमेरिकन महिला द्वीलर विल्छाक्स ने अपने $पांजीफाएए 0 776८ ४८०७७ (पृष्ठ ४३) में इस बात को स्वीकार किया हें कि वैदिक ऋषियों को विद्युत, रेडियो, एलेक्ट्रन, विमान आदि सभी बातों का ज्ञान था। बड़ौदा में यन्त-सर्वस्व' नाम का एक ग्रन्थ मिला है, जिसके लेखक भरद्वाज ऋषि हेँ। इसके 'वैमानिक' प्रकरण में लिखा है कि वेदों के आधार पर ही इस ग्रन्थ को बनाया गया हैँ। इस ग्रन्थ में विमान-विषयक अनेक संस्कृत-पुस्तकों का भी उल्लेख हे। इसके उक्त

. प्रकरण में ३२ प्रकार के वैमानिक रहस्य बताये गये हैं कहा गया

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है-- प्रत्येक विमान में दूरदर्शक यंत्र रहता था प्रत्येक में गति को वक्र करने, दूसरे विमानवालों से ब्रातें करने दूसरे विमान को वस्तुएँ देखने, दूसरे विमान की दिशा जानने, दूसरे विमानवालों को बेहोश करने और शवत्र के विमान को नष्ट करने के भी यंत्र छूगे रहते थे।” इस ग्रन्थ में बताये यदि सभी ग्रन्थ मिल जाते, तो इस विषय पर सम्भवत विशेष प्रकाश पड़ता

ऋग्वेद (४३.२) में कहा गया हैँ कि 'अश्विद्वय के रथ में तीन दृढ़ चक्र और रथ के ऊपर, अवलम्ब के लिए, तीन खंभ लरगे है। वेना के विवाह के समय देवों ने इसे पहले पहल जाना। ४५.१२ में त्रिलोक में चलनेवाले रथ का उल्लेख हें। क्या त्रिलोक में साधारण रथ चल सकता है ? ६३.२ में भी ऐसे ही रथ का कथन हें। २७४.१० में तो आकाशचारी रथ का उल्लेख है। ४१६.६ में भी ऐसा ही उल्लेख है परन्तु ५१३.१ में तो स्पष्ट ही कहा गया है कि अधश्विनीकुमारों का त्रिचक्र रथ अश्व के विना और प्रग्मनह के बिना अन्तरिक्ष में भ्रमण करता है ।' ऋभओं ने इस रथ को बनाया था। ७६३.७ में तो एक एसे रथ का विवरण है, जो पृथिवी अन्तरिक्ष और स्वर्ग--तीनों में चलने में समर्थ था। तो क्या यह विमान ही था ?

ऐहिक अभ्युदय

आर्य-जाति ने भौतिक उन्नति भो यथष्ट की थी। लोहे की बहु- लता के कारण नगर के नगर लोहे के बनते जिन्हें आर्य लछौह-पुरी” वा 'लौह-वगरी' कहते थे ३२०.८ में ऐसी ही एक लौहपुरी का इन्द्र द्वारा विध्वस्त किया जाना लिखा हें; क्‍योंकि यह दस्यु-पुरी थी ७७९.७ में तो लौह-पुरी के साथ ही अपरिमित सुवर्णमयी पुरी क। भी उल्लेख हें। ७९०.१४ में 'महान्‌ लौह से निर्मित शतगणपुरी की भी बात है १०६४.८ में गरुड़ के द्वारा छौहमय नगर के पार जाना' लिखा

सौ दरवाजों वाली पुरी का भी निर्माण होता था (१३७७.३) | हजार दरवाजों वाले गृह भी बनते थे (८७०.५) हजार खंभों- वाले मकान होते थे (३५२.५ और ६३२.६) हम्य॑ और अदूठालि- काएँ होती थीं (२५६.४) मकानों में तीन-तीन तल्ले होते थे (९८४.१२, १३१५.५ और १३१६.७)। इन मन्त्रों से यह भी पता चलता है कि तीन कोठोंवाले गृह ही आर्थों को अधिक रुचिकर थे। ७३०.९ में एक ऐसे गह की बात है, जो छकड्टी, ईंट और पत्थर का बना था और जिसमें घीत, ताप और ग्रीष्म का प्रभाव नहीं पड़ता था। तो क्‍या आर्य शीत-ताप'

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नियन्त्रक (#7-८०%ठा707८व) गृह बनाते थे? दरवाजों पर वेत्रधारी दरबवाव रहते थे (३१३.९)।

आर्यो को मिट्टी का घर बिलकुल नापसन्द था (८७०.१)। खोदाई करनेवाले नाना प्रकार के हथियार थे (३८३.४) वे खोदकर तड़ाग बनाते थे (१२०५.५)।

वे चादर (उष्णीष्‌) धारण करते थे और उबटन लगाते थे (८०३.३ और १३४२.७) वे धौत वस्त्र (घोती) पहनते थे (११७३.३)। उनकी पगड़ी सोने की होती थी (३४१.३) वे तकिया भी लगाते थे (१४३७.६) वे तैल का भी उपयोग करते थे (१०३४.२)। आर्य जड़ी-बूटियों से भी चिकित्सा करते थे (९४५.२६)। १०७ स्थानों में ओऔषधियाँ होती थीं (१३७३.१)।

स्थाली में भोजन बनता था (४३०.२२) करूश और जलरू-पान- पात्र होते थे (१२४५.४) पेटिकाएँ (बाक्स) बनती थीं (१०२८.९)।

नतेकियाँ नृत्य करती थीं (१२७.४)॥। नत्तेन-क्रीड़न तो पितृमेध- यज्ञ तक में होता था (१२३५.३)। वेणु बाजा बजाया जाता था (१४- २८.७) वीणा भी बजती थी (३४२.१३)॥। कर्करि नाम के वाद्य का बड़ा प्रचार था (३५४.३)।

कभी-कभी रथ में बकरे जोते जाते थे (१२४७.८) गदहे (गर्दभ) भी रथ-वहन करते थे (१६६.२)।

समाज के आवश्यक कार्य-वाहुक वर्ग भी कई थे। सोना गछाकर गहने बनानेवाका सोवार था (६६४.४) सोनार और मालछाकार (माली ): का एक साथ ही एक मन्त्र (१००१.१५) में उल्लेख हूँ रथ आदि बनाने- वाले बढ़ई भी थे (१३६५-१२)। तनन्‍्तुवाय (जुलाहा) वस्त्र बुनता था (१३८९.१)। काठ का काम करनेवाले और वाण आदि बनाकर बेचने वाले शिल्पी थे। वैद्य थे और जौ भुननेवाली कन्याएँ थीं. (१२०७- १-३) भाथी (भस्त्र) और भाथी वाले थे (५५७.५) | बाँह में छरा लटकानेवाले और दाढ़ी-मूँछ मूँड़नेवाले नाई थे (९०३.१६ और १४३४. ४)। अप्सराएँ भी थीं (११५३.३)। गनन्‍्धर्व का उल्लेख हे ही' (१३४५.४०) | वणिक्‌ तो थे ही, सूदखोर भी थे (१०१५.१०)॥

स्वृण-राशि को प्रचुरता यद्यपि ऋग्वेद में मणियों (४२.८) और रत्नों (१८९.१, ६४५.३

तथा १०५२.२६) की भी चर्चा है; परन्तु स्वर्ण की अधिकता का बार- बार उल्लेख है सोना इतना होता था कि सोने का नगर तक बनता था'

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(७७९.७) | सोने की नौकाएँ बनती थीं, जो समुद्र के मध्य तक जाती थीं (७५०.२) सोने के रथ बनते थे (१२९.१८, २१२.३-४, ६४५.३ और ९९८.२४) | सोने का झूछा या हिडोला होता था (८६८.५)। सोने के घड़े बनते थे (५०८.१९)। सोने का चर्मास्तरण होता था (८९४.३२) सोने से घोड़े विभूषित किये जाते थे और उन्हें सदा मला जाता था (१९१.४)। स्वणनिरण-विभूषित घोड़ों और द्यामवर्ण घोड़ों का उल्लेख बहुत बार आया है (२४०.२ और १३२०.११)। सोने की पगड़ियाँ बनती थीं (३४१.३, ६२०.११ तथा ९१४.२५) | पैरों के कटक (काड़ं ), हाथों के वछ॒य, हृदय के हार, गले की माछा और तरह तरह के आयुध--सब सोने के बनते थे (६१६. और ६२०.११)॥ सोने की ही मुद्रा चछती थी. जिसे निष्क कहा जाता था (१९१.२)।

>(५७ आर्यो' को आदशे दान-परायणता

आये छोग दान और दक्षिणा देने में अनुपम थे। ऋग्वेद में दान और दक्षिणा की महिमा के लिये दो यूक्‍त ही हे (१३९२.१०७वाँ सूक्‍्त दक्षिणा-सुक्त” और १४०७.११७वाँ सूक्‍त दानसूक्‍त' है) इन दोनों सूक्‍तों का पाठ करने पर आरयों की उदारता और पर-दुःख-कातरता पर विमुग्व हो जाना पड़ता है कहा गया है कि दाता को कलश और दुःख नहीं होता। पृथिवी और स्वर्ग में जो कुछ अलम्य है, सो सब दाता को मिल जाता है--दाता देवता बन जाता है' (१३९३.८)। जो थाचक को नहीं देता और मित्र की सहायता नहीं करता, वह दुःखी होता है और वह मित्र कहाने योग्य नहीं रहता।” 'धन किसी के पास स्थिर तो रहता नहीं--रथ के पहियें की तरह घूमता रहता है। कभी किसी के पास रहता है और कभी किसी के पास जाता है। जो स्वार्थी है, जो कप कमाया स्वयं ही खाता है, वह पापी हैँ (१४०७,२ और ४-६

कक्षीवान्‌ नाम के ऋषि को सौ स्वर्ण-म॒द्राएँ, सौ धोडे सौ बैल, १०६० गायें और १० रथों में जोते गये ४० लोहित-वर्ण अदव दान में मिले थे (१९१.२-४) अवत्सार ऋषि को तीस हजार वस्त्र दान में मिले थे (१११८.४) | देवातिथि नाम के ऋषि को ६० हजार गायों का दान दिया गया था (१९०४-२०) सोने के रथ का दान राजा पृथुश्रवा करते थे (९९८.२४)। वश ऋषि ने भी दान में ६० हजार गायें पायी थीं (९९८.२९)। एक मन्त्र (९९७.२२) में वश ऋषि ने स्वयं ही कहा है--मेंने ७० हजार अश्व, हजार ऊँट, हजार

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काली घोड़ियाँ और १० हजार इवेत गायें पायी हे। अपने को समभ्यतम कहने वाला कोई इन दिनों इतन। महान्‌ दानी मिलंगा ?

कृषक आये

आयें खेती करते थे और कृषि-कर्म के लिये उन्हें देवी आज्ञा मिली थी। कहा गया है--अशिविद्वय ने मनृष्यों को कृषि-का्य की शिक्षा दी थी (९४८,६)। एक दूसरे मन्त्र (१७३.२१) में कहा गया है कि अदिवद्वय ने आये मानव के लिये हल द्वारा खेत जुतवाकर, यव (जौ) वपन कराकर तथा अन्न के लिये वृष्टि-वर्षण करके उसे विस्तीणं ज्योति श्रदान की। जौ के खेत बार-बार जोते जाते थे-- “किसान बैलों से जौ का खेत बार-बार जोतता है' (२५.१५)। आर्यों की अभिलाषा रहती थी--वबलीवरद (बैल) सुख का वहन करे। मनुष्यगण सुख-पूर्वक कृषि-कार्य करें| लांगल (हल) सुखपूर्वक कर्षण करे। प्रग्रह-समूह (रस्सियाँ) सुखपूर्वक बद्ध हो' (५४०.४) आगे कहा गया हे--इन्द्रदेव सीताधार काष्ठ को अभ्रहण करें। पूषा सीता (लांगल- पद्धति) को नियमित करें। फल या फारू (भूमि-विदारक काष्ठ) सुखपूर्वक भूमि कर्षण करे। रक्षकगण ब्ैैलों के साथ गमन करें। पर्जन्य' (मेघ ) मधुर जल द्वारा १थिवी को सिक्‍त करें।। (५४०.७-८) १३८१. के १०१ सूक्‍त के अधिकांश मन्त्रों में करषि-सामग्री का विवरण है छिखा ह--ऋत्विको, कर्षण (जोताई) आदि कर्मों का विस्तार करो। हल- दण्डरूपिणी नौका भ्रस्तुत करो। हल योजित करो। युगों (जुआठों) को विस्तृत करो। सस्तुत क्षेत्र में बीज बोओ। हँसिये पके धान्य में गिरें। छांगल जोते जाते हे कर्मकर्त्ता जुआटों को अलग करते हो। पशुओं के जलूपान-स्थान को बनाओ। वस्त्र या तंग (चर्म-रज्जु) को योजित करो। गड़ढे से जल छेकर हम सींचते हो। पद्युओं का जलरूपान- स्थान प्रस्तुत हुआ है। जलपूर्ण गडढे में सुन्दर चर्म-रज्जु है। इससे जल लेकर सेचन करो। पशुओं का यह जरू-पूर्ण जलाधार एक प्रोण (३२ सेर) होगा। (२-७ मन्त्र) खेत काटने के हथियार को दात्र कहा जाता था (१०३५.१०)। किसी भी खेत में इतना जौ होता था कि' उसे एक बार में नहीं काटा जा सकता था। एक मन्त्र (१४२३.२)| में उल्लेख है--- जिनके खेत में जौ होता है, वे अछग-अरूग करके, क्रमश) उसे अनेक बार काठते हँ।

जो धानन्‍्य की कोठी (कुशूल) में रखा जाता था और आवश्यकता- नुसार उसे बाहर निकाला जाता था (१३१९.३)। मान-दण्ड लेकर

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खेत मापे जाते थे (१५४.५) उवरा वा उपजाऊ भूमि के लिए कभी- कभी विवाद भी उठ खड़ा होता था (७०५.४)।

जौ के अतिरिक्त किसी दूसरे अन्न का कहीं भी ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। जौ भूना जाता था (१२०७.३) इसका सत्त्‌ु बनता था और सत्तु को सूप से साफ किया जाता था (१३२४.२)। सत्तू में घी मिलाकर उसे व्यवहार में छाया जाता था (७४९.१)।

यव (जौ) देवान्न हैँ। इसलिए हवन में इसी का उपयोग किया जाता था--अब तक किया जाता है। तैल का उल्लेख है। कदाचित्‌ यह तिल का तैल है। सम्भवतः तिरू भी होता था; क्‍योंकि जौ के साथ तिछू मिलाकर हवन किया जाता हे जौ का उबटन बनता था। जौ और तिल के सिवा अन्य अन्न मनुष्यान्न है, देवाज्न नहीं ४०५४ धघकी नदी बहती थी अतएवं आरयों को आजकल के “अठपट' अद्नों की आवश्यकता भी नहीं थी

आय॑ गौ के अनन्य भकक्‍त होते थे---धामिक और आर्थिक दोनों हक से। उन्होंने अपनी सन्‍्तानों और मनुष्यों को उपदेश दिया हँ---'जो गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की भगिनी और दुग्ध का निवास- स्थान है, मनष्यो, उस निरफ्राध गो-देवी का वध नहीं करना। गो-देवी को छोटी बद्धि का मनृष्य ही परिवर्जित करता हैं ।/ (१०६६-१५-१६) कीकट (दक्षिण मग घ) में गायों की दुर्गंति होती थी; इसलिए उसे अनाये-देश कहा गया हूँ (४२८.१४) गोष्ठ, गोचरण और गरो-सम्मेलन भी होते थे (१२३८.४) 'चिरज्जीविनी गायों का दुग्ध-सेवन' उनकी उत्तम अभिलाषा थी (१२३८.६)। यही बात १२४२.१३ में भी है। ऋग्वेद के तीन गो-सूकत अत्यन्त प्रसिद्ध हें---७०९ का २८ वाँ सूक्‍्त, १२२७ का १९वाँ सूकत और १४५३ का १६९वाँ सूक्‍त। गो-जाति के सम्बन्ध में विशेष जानने के लिये इन सुकतों का स्वाध्याय करता चाहिए।

णए्य-शासन

ऋग्वेद से पता चलता हैं कि राजा का निर्वाचन होता: था---राजन्‌, तुम्हें मेने राष्ट्रपति चुना। तुम इस देश के प्रभु बतो अटल-अविचल और स्थिर होकर रहो। प्रजा तुम्हारी अभिलाषा करे तुम्हारा राजत्व नष्ट होने पावे (१४५५-१) | इसी आशय के अगले चार मन्त्र और हैं। इस सूक्‍त के अन्तिम मन्त्र से ज्ञात होता है, कि प्रजा कर देती थी (१४५६.६)। राष्ट्रपति के मन्त्री भी होते थे (१४५६.५)। राजा की समिति होती थी (१३७४.६), जिसके परामर्श से वह्‌ शासन में छाभ उठाता था।

फा० ५६

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निर्भय राज-पथ' होते थे (१९३.६)'॥ 'हास-परिहास करनेवाले द्रबारी (मर्म-सचिव)' भी होते थे (१२०८.४)। 'बकवादी विदृषक (मसखरे) भी होते थे, जो बड़ी सरलता से हँसा देते थे” (२१७.७) कर्मचारी वेतन (भूति) पाते थे (१०१५.११, ११८५.३८ और ११९४.१)। कारागृह (जे) और हथकड़ी भी थी (७८.३) शतद्वारवालक्े और अन्धकारमय पीड़ायन्त्र-गृह (काली कोठरी ?) थे (१६७.८) | किसी भी राष्ट्र में यदि समाज का सत्यानाश” करनेवाले कुकर्मी ने रहें तो शासन, जेल, हथकड़ी और पीड़ागृह की आवश्यकता ही पड़े। कुकर्मी और समाज-विध्बंसक थे; इसलिए इन वस्तुओं की भी आवश्यकता थी। शास्य थे; इसलिए शासक और शासन-यन्त्र भी थे। उपद्रवी, ढेषी और निन्‍्दक थे (१९.३) देव-निन्‍्दक क्षोर दुर्बुद्धि थे (३२२.८)। बाधक, चोर और कपटी थे (५६-३)। गुफा में चुराया धन छिपानेवाले तस्कर थे (५६३.५)। मित्र-दार-गामी रूम्पट थे (११- ७९.२२) | नास्तिक (भेद) थे (७९५.१८) शराबी भी थे (८९५.१२ और ९४७. १४) शौण्डिक के घर में चर्ममय 5 तो थे ही (२८८.- १०)। जुआड़ी भी थे (१२५०.१७) बहेरे के काठ से बने पासे होते थे (१२६१-१) | जुआड़ी (कितव) की विन्‍्दा उसकी सास करती है। उसकी सरुत्री उसे छोड़ देती है जुआडी को कुछ माँगने पर उसे कोई नहीं देता। जैसे बूढ़े घोड़े को कोई नहीं खरीदता, वैसे ही जुआड़ी का कोई आदर नहीं करता। पासा वाले की स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। जुआड़ी के माँ-बाप-भाई कहते हे--हम' इसे नहीं जानते जुआ- ड़िओ, इसे पकड़कर ले जाओ (१२६१.३-४) तिरेपन तरह के पासे होते थे। 'जुआड़ी की स्त्री दीन-हीन वेश में रहती है जुआड़ी की माता व्याकुल रहती हैं। जुआड़ी दुसरे के घर में रात काटता है ।। (१२६२.९- १०) अपनी स्त्री की दशा देखकर जुआड़ी का हृदय फठा करता है। जो जुआड़ी प्रातः धोड़े की सवारी करता है, वही हारकर सायं वस्त्र- विहीन हो जाता है और दरिद्र के समान जाड़े से बचने के लिये आग तापता है' (१२६३.११)। अच्त में जुआड़ी को उपदेश दिया गया है-- जुआड़ी, कभी जुआ नहीं खेलना (अक्षेर्मा दिव्य:)। खेती करना। कंषि-लाभ से ही सन्तुष्ट रहना--अपने को कृतार्थ समझना” (१२६३. १३)। भ्रम, क्रोध, अज्ञान और यूत-कीड़ा से पाप होता है! (८६७.६)॥ .... ये सब समाज-विनाशक तत्त्व तो थे ही, कच्चा मांस खा जाने- वाले राक्षस भी बहुत थे। वे यज्ञ-विष्तकारी थे। तीन मस्तक ओर तीन वैरों के भी राक्षस थे। वे सत्य-द्रोही थे। वे साधुओं के भंजक थे। कड़वी'

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बातें करते थे। वे नर-भक्षक थे। मिथ्यावादी थे। वे मनुष्यों और कि | के मांस का संग्रह करते थे उनके सारे कर्म विध्वंसक थे

लिए उन राक्षसों के वध की बार-बार प्रार्थना की गयी है। (१३५०-५२. २-२५)।

गायें चुरानेवाले प्रणि थे, जिनका नेता बलासुर था (९३०.८)। पणि ही नहीं, दास, दस्यू और असुर भी सत्कर्म-विध्वंसक थे यथ्यपि ऋणगेद में असुर शब्द के नाना प्रकार के अर्थ भी हैं; परन्तु असुर शब्द का मायावी' और आर्य-द्रोही' अर्थ ही अधिक प्रसिद्ध था। असुर पक्के समाज-विध्वंसक थे। अनेक बर्बर-जातियाँ भी थीं। 4 गोघातक थीं। विस्तृत पृथ्वी पर दस्य्‌ ही फैले हुए थे (७३४.२०)

ऐसे लोगों का शासन अत्यावश्यक था। इन्हें इनके स्थानों से भगा दिया जाता था (७८२.६) | इन्हें जीतकर इनका धन ले लिया जाता था (१३२१.६)। अनारयोँ के यहाँ से गो-धन छाकर उसकी रक्षा की जाती थी। सूदखोरों का धन भी ले लिया जाता था (४२८.१४)। तरह-तरह के दण्ड देकर इन्हें सत्पण पर छाया जाता था वा इन्हें भगा दिया जाता था वा मार डाला जाता था। ये सब बातें अनेक मन्त्रों में बार-बार कही गयी हूं।

ऋगेद ओर नारी-जाति

प्रकृति में सत््व, रज और तम नाम के तीन गुण हैं वा तीनों गुणों का समुदाय ही प्रकृति है। प्रकृति का विकास विश्व हैं। इसलिए जगत में तीनों गुणों के प्राणी सदा से रहते आये हें। अवश्य ही कर्मानुसार कोई सत्त्व-प्रधान (सात्तिवक) होता है, कोई रजः-प्रधात (राजस) और कोई तम:अधान (तामस) देश, कार और पात्र के अनुसार तारतम्य तो हो सकता हैँ और होता है; परन्तु यह्‌ असम्भव है कि किसी भी समय किसी भी गुण वा गुणी का नितान्त अभाव हो जाय। पहले सात्तविक व्यक्ति अत्यधिक थे; त्यागी, तपस्वी, परोपकारी, आस्तिक, निईछलछ, निष्कपट मनुष्यों का बाहुलय था; परन्तु राजसिक और तामसिक व्यक्ति भी थे। फलत: जिन दिनों आययं-जाति उन्नति के बे रच शिखर पर विराजमान थी, उन दिनों भी कुछ दुष्ट पुरुष और दुृष्टा स्त्रियाँ थीं। परन्तु ऐसों को न्‍्यायानुकूछ कड़े से कड़ा दंड दिया जाता था कोई पक्षपात नहीं था, कोई अन्याय नहीं था। तपोधन ऋषियों के समक्ष पक्षपात॒ वा अन्याय का होना सम्भव नहीं था

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आये-जाति. में आंदशे महिलाओं की प्रचुरता होते हुए भी प्रकृति के नियमानुसार कुछ राजस और तामस स्त्रियाँ भी थीं। यह स्वाभाविक बात थी। भलू-बुरे में इन्द्र प्राकृतिक नियम है देवासुर-संग्राम विश्व में सदा चलता रहता है वैदिक साहित्य में इसे इन्द्र-वृत्नासुर-यद्ध भी कहा जाता हूँ। यह शाइ्वत य॒द्ध ब्रह्माण्ड में ही नहीं, पिण्ड में भी चलता रहता हे जो ब्रह्माण्ड में हे, वह पिण्ड में भी है" की कहावत शास्त्रीय है। प्रत्येक व्यक्ति में कुमति और सुमति का समर ठना रहता हैं। समाज के प्रत्येक अंग में यह काण्ड होता रहता है। व्यक्तियों में से किसी में दैवी भाव का विकास अधिक रहता है और किसी में आसुरी भाव का। समाज में कोई देव होता है, कोई दानव। यह नियवि है। इसे बदल देना या विनष्ट कर देना असंभव हैं।

इसलिए यह धारणा ठीक नहीं है कि 'पहले के तब लोग देवता थे कौर अब के सब लोग देत्य हें।” पहले भी कुछ देत्यभावापन्न व्यक्ति थे। अवश्य ही पहले त्याग और तपस्या की मूर्त्ति ऋषियों के आश्रमों का जाल सारे देश में बिछा था; इसलिए देश का वातावरण विशुद्ध था और इसी विशुद्धता के कारण बहुत ही कम स्त्री-पुरुष दैत्यभावापतन्न हो पाते थे इसका साक्षी सारा वैदिक बाहुमय है। इस वाहुमय में गिने- गिनाय॑ स्थानों में ही ऐसे लोगों का उल्लेख पाया जाता है यह भी कहा जा सकता हूं कि कुकर्मी तो अत्यल्प रहे होंगे; परन्तु संसर्ग के कारण अधिक लोग व्यर्थ ही कुयश के भागी बन होंगे अगल मन्त्रों से यही बात मालम पड़ती भी हैं। |

कहा गया हँ-- मैथ्यातिथि के धनदाता पश्रायोगि जिस समय पुरुष से स्त्री बने थे, उस समय इन्द्र ने कहा था कि स्त्री के मन का शासन करना असम्भव हूँ। स्त्री की बुद्धि छोटी होती है! (९७२.१७) ऐसे ही विलक्षण प्रायोगि से इन्द्र ने कहा-- तुम नीचे देखा करो. ऊपर नहीं। पैरों को मिलाये रखो। इस प्रकार कपड़े पहनो कि तुम्हारे ओष्ठ-प्रान्त और कटि के निम्न भाग को कोई देखने पावे यह सब इसलिए करो कि तुम पुरुष स्तोता होकर भी स्त्री हुए हो' (९७२-१९)। तो क्या पर्दा करन का यह उपदेश केवल प्रायोगि के लिए है ?

राजा पुरुखा से चिढ़कर एक भनन्‍्त्र (१३७०.१५) में उर्वशी उनसे कह रही है--“स्त्रियों का प्रेम वा मैत्री स्थायिनी नहीं होती स्त्रियों और बूकों (तेंदुओं) का हृदय एक समान होता है /” एक तो उर्वशी अप्सरा थी, दूसरे पुरुरवा से क्रुद्ध होकर वह उनसे दूर भागना चाहती थी। इस दशा में उसका ऐसा कहना सामयिक ही था। |

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किसी विषयान्ध पुरुष को लक्ष्य करके कहा गया हँ-- स्त्रैण मनृष्य स्त्री की प्रशंसा करता है! (४८८.५)। कोई दो स्त्रियों का स्वामी भी होता था (१३८२.११)। ऐसी ही एक सौत 'सौतियाडाह' से कहती हँ--मिरी सपत्नी नीच से भी नीच हो जाय। में सपत्नी का बराम तक नहीं छेती। सपत्नी सबके लिये अप्रिय होती है' (१४३७.३-४) | एक मन्त्र (८५८.३) में कुछटा की निन्‍दा और पतिक्रता की प्रशंसा है एक स्थान (३३३.१) पर गुप्तप्रसविनी स्त्री के गर्भ की तरह मेरा अप- राध” कहा गया है। विपथगामिनी, पतिविद्वेषिणी और दुष्टाचारिणी स्‍त्री नरक-स्थान को उत्पन्न करती है! (४६२.५) | जार वा व्यभिचारी ओर उपपत्नी वा रखेल (रक्षिता) का भी उल्लेख है (११०७.४)। एक मन्त्र (१२७३.६) में 'व्यभिचार में रत स्त्री' और एक (११७९.२३) में जार और व्यभिचारिणी स्त्री' का उल्लेख पाया जाता है। कदाचित समाज को अधम माग दिखानेवाली ऐसी स्त्रियों का इन्ह ने विनाश कर डाला था (१४०.१)। परन्तु समाज में ऐसे भ्रष्ट स्त्री-पुरुष अपवाद-स्वरूप थे। क्ष्योंकि स्यभिचारी की निन्‍दा करते हुए एक मन्त्र (१२२२.१०) में भविष्य के समाज में ऐसी अष्टता आने का संकेत है। कहा गया हें-- “भविष्य में ऐसा युग आवेगा, जिसमें भगिनियाँ (स्त्रियां) बन्धृत्व-विहीन अ्राता (पर पृरुष) को पति बनावेंगी।” परन्तु जो लोग उक्त शब्दों वा सन्दर्भों का अन्य अर्थ करते हैं, उनके लिए तो इन अपवादों का भी अस्तित्व नही .. ऋग्वेद-संहिता का विहगावलोकन करने पर तो विदित होता हैं कि कन्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक स्त्रीजाति का बड़ा सम्मान और सत्कार था। जो कन्या पितुकुल में जीवन भर अविवाहिता रहती थी, उसे पितृकुल में ही अंश मिलता था (३१६.७)। आजकल के 'सम्य' कहाने वाले समाज में ऐसी उदारता अब तक नहीं है ! आये 'कमनीय कन्या' की प्राप्ति के लिए ब्रराबर याचना करते थे (११३७.१०-११)। बे बच्चों को आभूषणों से विभूषित रखते थे (११९५.१) वे स्वर्णा- भरणों से अलंकृत करके कन्या का दान जामाता को देते थे। इसका उल्लेख अनेक मन्त्रों में है (९९९.३३, १११२.२, १२७२.१४ आदि )। ऋग्वेद में पहले ही चन्द्रमा और रमणीय पत्नी' वेना की विवाह- यात्रा का उल्लेख है, जिसमें अश्विद्यय आदि सभी देव” बड़ी तैयारी से आये थे (४३.२) ऐतिहासिकों के मत से ऋग्वेद का यह प्राचीनतम मन्त्र है यथाविध्ि विवाहित और सती” महिला की बड़ी प्रशंसा की गयी हैं। बली राजा के राज्य के समान सती का सतीत्व सुरक्षित माना

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गया है” (१३९५.३) इन पवित्र-चरित्रा सती के सम्बन्ध में कहा गया है---तपस्या में प्रवुत्त सप्तर्षियों और प्राचीन देवों ने इन सती की बात कही है। ये अत्यन्त शुद्ध-चरित्रा हें। तपस्या और सच्चरित्रता से तो निकृष्ट पदार्थ भी उत्तम स्थान में पहुँच सकता है” (तब इनकी तो बात ही क्या?) (१३९५.४)।

विवाह के समय वधू वस्त्र से ढकी रहती थी (९५९.१३) १३४२- . ४६. ६-४७ में सूर्या के विवाह का आलंकारिक वर्णन पढ़ते ही बनता है। इन मन्त्रों में आय-जाति के आदशे विवाह का वर्णन पाया जाता है। कहा गया है---वह मार्ग सरल और कण्टक-विहीन है, जिससे हमारे मित्र लोग कन्या के पिता के पास (बारात में) जाते हें। पत्ति-पत्नी मिलकर रहें! (२३वाँ मल्त्र)। वधू सोभाग्यवती और सुपुत्रवाली हो' (२५)। वतिगुह में जाकर गृहिणी बनो। पति के वश में रहकर भृत्य आदि का व्यवस्थापन करो' (२६) पति-गृह में सन्‍्तान उत्पन्न करके प्रसन्न होना वहाँ सावधान होकर कार्य करना। स्वामी के साथ अपने शरीर को सम्मि- छित करो। वृद्धावस्था तक अपने गृह में प्रभुता करों (२७)। यह घधू शौमन कल्याणवाली है। सभी आशीर्वाददाता आवें। इसे स्वामी' की प्रियपात्री बनने का आशीर्वाद दें! (३३) पति कहता है--तुम्हारे सौभाग्य के लिये में तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ। मुझे पति पाकर तुम 4808 में पहुँचना। देवों ने मुझे गृहस्थ-धर्म चलाने के लिये तुम्हें

हैं! (३९) * व्‌ को पति दीर्घायु होकर सौ वर्ष जीवित रहेगा (३९)। (३९) वर और वधू, परस्पर पृथक नहीं होना। नाना खाद्य भक्षण करना। अपने गृह में रहकर पुत्र-पौत्रों के साथ आमोद, आह छाद और कीड़ा करना' (४२) “ब्रह्मा वा प्रजापति.हमें सन्‍्तति दें और अर्थमा बुढ़ापे तक हमें साथ रखें वधू, हमारे मनुष्यों और पशुओं के लिये कल्याणकारिणी रहना' (४३)॥। वधू, तुम्हारा नेत्र निर्दोष हो। तुम पति के लिए मंगलमयी होना पशुओं के लिए मंगछकारिणी बनो। तुम्हारा भन प्रफूल्ल हो और तुम्हारा सौन्दययं शुश्र हो। तुम वीर-प्रसविनी और देवों की भकक्‍ता बवो। हमारे मनुष्यों और पशुओं के लिए कल्याणमयी होना'। (४४) इन्द्र, इस नारी को उत्तम पुत्र और सौभाग्यवाली करो। इसके गर्भ में दस पुत्र स्थापित करो' (४५)। वधू, अपने कर्म से तुम' सास, ससुर, ननद और देवरों की सम्राज्ञी (महारानी) बनो--सबके ऊपर प्रभुत्व करो' (४६)। सारे देवता हम दोनों (वर-वध्‌) के हृदयों को मिला दें। जल, वायू, धाता और सरस्वती हम दोनों को संयुक्त रखें! (४७)

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एक पुरुष का एक ही विवाह करना आदर्श था (३६७.४) जिस स्त्री का सम्मान-सत्कार उसका पति करता था, बह समाज में अभिनन्‍दनीया गिनी जाती थी (१०२३) पतित्रता हास्य-वदना होती थी (५४२.८) स्वयंवर की प्रथा थी (१६६.१)। “जो स्त्री भद्र और सम्य है, जिसका शरीर सुसंघटित हे, वह अनेक पुरुषों में से अपने मन के अनुकूल प्रिय पात्र को पति स्वीकृति करती है (१२४९.१२) | ज्ञात होता है, स्त्रियों को अधिकांश कार्यों में स्वतन्त्रता प्राप्त थी। दास नमुचि ने तो स्त्रियों की एक सेना भी बनायी थी (५७८.९) परन्तु आये इसके विरुद्ध थे (१२४९.१०)

देव-रमणियों को यज्ञ में बुलाया जाता था (२३.९-१०) | इला को धर्मोपदेशिका बनाया गया था (३७.११)॥ इला पौरोहित्य कराती थीं। कहा जाता है कि आयों के अनुकरण पर यूनान में डीमेटर और पर्सीफोन की पुजारिनें भी उपदेशिका थीं ओर पौरोहित्य कराती थीं। बोनियो की कयान स्त्रियाँ भी धान बोने के समय पूजा कराती हैं। अमेरिका के रेड इंडियनों में भी यही बात है। ब्रिटेन के मन्दिरों में पूजा करानेवाली स्त्रियाँ तो प्रसिद्ध ही हे।

आये स्त्री के साथ यज्ञ करते थे (२०१.३)। ६०१.१५ और १२७४.१० में भी यही बात है। पितृगृह में वृद्धावस्था तक रहनेवाली घोषा (१२७०.३) ब्रह्मगादिनी महिला थी (१८४.५) घोषा आदि - अनेक महिलाओं ने अनेक सूकक्‍तों का स्मरण वा निर्माण किया था। यह बात पहले लिखी जा चुकी हेँ। स्त्रियाँ हवन करती थीं. उपदेश देती थीं और वेद पढ़ती थीं

परन्तु यह बात भआर्यजाति में ही थी संसार की अन्य प्राचीन जातियों में तो स्त्रियाँ उपेक्षणीय थीं। जो जितनी स्त्रियाँ चाहता था, उतनी रख लेता था। पैगम्बर महम्मद के पहले अरब में जन्म' लेते ही लड़कियाँ जला दी जाती थीं। एथेन्स और स्पार्टा में स्त्रियों की जो नारकीय दशा थी, वह इतिहास के विद्यार्थियों से छिपी हुई नहीं है | प्रझन हो सकता हैँ कि तब इन दिनों स्त्रियों के लिए वेदाध्यय- नादि का निषेध क्‍यों किया जाता हें? इसका विस्तृत उत्तर आप- स्तम्बधमंसूतर”' (१.५.१-८) और 'हारीतस्मृति” (२१.२०-२३) आदि में दिया गया हेँ। वीर-मित्रोदय” (संस्कार-प्रकाश ) में भी यही उत्तर हें--स्त्रियाँ दो प्रकार की हें--एक ब्रह्मयवादिनी, दूसरी साधा- रण। जो ब्रह्मवादिनी थीं, वे हवन करती थीं, घर में ही वेदाध्ययच

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करती थीं और भिक्षा माँग कर खाती थीं।' यमस्मृति में कहा गया ह--- पुराने समय में कन्‍्याओं का उपनयन होता था (गोभिल-गृहघसृत्र, प्रपाठक), वे वेद पढ़ती थीं, गायत्री भी पढ़ती थीं; परन्तु उन्हें पिता, पित॒ब्य वा भ्राता ही पढ़ाते थे, दूसरा नहीं ।' फलता साधारण स्त्रियों के लिए ये बातें निषिद्ध थीं। इ॒ दिनों तो किसी घोषा, विश्वावारा, अपाछा, सुलुभा, मैँत्रेयी वा गार्गी वाचकनवीका अस्तित्व . तहीं हैं। असाधारण स्त्रियों का कार्य साधारण स्त्रियां कैसे कर सकती हें?

आये औरस पुत्र चाहते थे (७७६.२१)। अनौरस से दूर रहते थे (७८१.७)। पुत्र के अभाव में दौहित्र उत्तराधिकारी होता

था (३९५-१)। का विशेष

यह भूमिका ऋग्वेद का अत्यन्त सूक्ष्मतम' विहगावछोकन है परन्तु ऋग्वेद के समान विद्याल ज्ञानराशि की भूमिका हजार दो हजार पृष्ठों में लिखी जाय, तो वह भी सूक्ष्म विहगावलोकन ही कही जायगी। भूमिका में लिखित विषयों के विस्तृत ज्ञान और अन्यान्य विषयों की ब्यापक अभिज्ञता के लिए तो पाठकों को “विषय-सूची” और “हिन्दी ऋग्वेद देखना चाहिए।

“ऋग्वेद के प्रायः प्रत्येक मन्त्र में आधिभौतिक, याज्ञिक, आधिदेविक और आध्यात्मिक अर्थों की विमछ मन्दाकिनी की पवित्र धारा बहती है। इन सभी अर्थों करा विहगावलोकन करना किसी तापस ऋषि का ही कराये हे। ऋग्वेद का बहिरंग परिचय तो किसी उद्भट मनीषी के लिए शक्‍्य भी हो सकता है; परन्तु अन्तरंग परिचय और समीक्षण तो वे ही कर सकते हैं, जो उसके स्मारक वा कर्ता हैं। वेदज्ञान असीम हैं और असीम को कोई कंसे शब्द-सीमा में बाँधेगा ?'

भारतवष् में कुछ विद्वान ऐसे है, जिनका उपर्युक्त मत हूँ। वे यह भी कहते हें कि वेद अध्यात्म-विद्या का अनन्त आगार है। उसमें विदव के सनातन नियम प्रतिपादित हैं। वह देशकालातीत नियमों का वर्णन करता है। वह विश्व का नियामक है। वह सग्ग-स्थिति- प्रठझय के शाश्वत नियम बताता! उसके एक-एक मन्त्र में निगढ़ रहस्य है क्‍या कोई ऐसा भाष्यकार हो सकता है, जो “इदं विष्णु वि- ' चक्मे त्रेधा निदंधे पदम्‌” (२३.१७) मन्त्र के आधिभौतिक, आधि- देविक और आध्यात्मिक अर्थों को समझाते हुए अर्वाचीन विज्ञान के

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सृष्टि-विद्या-संबन्धी सिद्धांत और पुराणों की त्रिविक्रम (वामन) विष्णुवाली कथा की संगति छगा सके ? यदि नहीं, तो वेद का भाष्य (टीका) हो ही नहीं सकता ।'

तो क्‍या वेद-संहिताओं को मंजूषा में बन्द करके रख दिया जाय और उन्हें दीमक चाट जाय॑? इन पंक्तियों के लेखक का मत ऐसा नहीं है लेखक यह अवश्य मानता है कि वेद-वारिधि अगाध हूँ और इसकी अगाधघता' इसलिए और भी अगम्य हो पड़ी है कि मन्त्र- गत विषयों का सिलूसिलेवार विवरण नहीं हैँ। यही. त्रिविक्रम के परिक्रमण की बात, एक स्थान पर नहीं है--कितने ही अध्यायों और सूकतों में, सैकड़ों मन्‍्त्रों में अन्यान्य विषयों का कथन करते-करते, बीच-बीच में, जाती हैं। ऋग्वेद का दशराज्ञयूुद्ध' अत्यन्त प्रख्यात है; परन्तु इसका विषय भी एक स्थान पर नहीं है, यत्र-तत्र बिखरा हुआ हैं। अगणित मन्त्रों का अन्तर दे-देकर यह विषय कहा गया है। जिन-जिन मन्त्रों में यह विषय आया भी है, थे मन्त्र इतने अस्पष्ट हें कि उनसे दाराश्नयुद्धां की संगति बेठाना बहुत ही श्रम-साध्य हो पड़ता है। प्रायः सभी विषयों की यही दशा हैँ। किसी भी विषय का क्रमबद्ध विवरण कदाचित्‌ ही मिलता हैँ। बात यह है कि विभिन्न समयों में विविध ऋषियों ने नाना विषयों के मन्त्रों का स्मरण वा सृष्टि की और अपने-अपने मन्त्रों का उन्होंने सक्‍त-रूप में अलग-अलग संकलन किया। प्रत्येक सृक्‍त में एक-एक विषय के प्रतिपादक मन्‍्त्रों का संकलन या संग्रह भी नहीं हे। एक ही सूक्‍त में अनेक विषय हैं। कितने ही सूक्‍तों के तो अनेक ऋषि भी हूँ और अनेक देवता (वर््ये विषय ) भी हें। प्रसंग और प्रकरण का ठिकाना नहीं है। इन सुकतों को पढ़कर विषयों की संगति छगाना इसीलिए दुरूह हो जाता है।

दूसरी बात यह हूँ कि वेद-भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा हैं; इसलिए वैदिक व्याकरण (प्रातिशाख्य ), वैदिक कोष (निघण्टु-निरुक्‍्त ) और ब्राह्मण-ग्रन्य आदि का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किये बिना संस्कृत का उद्भट विद्वान्‌ भी वेद-मन्त्रों का अर्थ नहीं समझ पाता। हक इन ग्रन्थों में भी मन्‍्त्रों और अर्थों का क्रमिक विवरण नहीं है, अनेक शब्दों का अर्थ भी नहीं मिलता, अनेक शब्द नानार्थक बताये गये हैं और अनेक शब्दों के अर्थ संदिग्ध हेँ। इसलिए मन्त्रार्थ दुर्वोष्य हो पड़े हैँ

तीसरी बात यह हैं कि छापाखाना तो अभी कर का है-- हजारों वर्षों से वेदाध्यायी ब्राह्मण सुन-सुनकर मन्त्रों को कण्ठस्थ करते

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आये हे---एक ने दूसरे से सुना, दूसरे ने तीसरे से और तीसरे मे चोथे से। इस तरह अनन्त काल से सुनते-सुनाते आते रहने से कितने ही' शब्द अशुद्ध हो पड़े--बहुत मन्त्रों के पाठान्तर हो गये। इसलिए शुद्ध पाठ खोज निकालना और उनका यथार्थ अर्थ कर देना दुरधिगम्य हो गया। ' चौथी बात यह है कि सुन-सुनाकर मन्त्र लिखनेवालों के दृष्टिदोष, प्रमाद, अल्पज्ञषता, अज्ञेता आदि के कारण भी मन्त्रों में पाठान्तर और . अशुद्धियाँ हो गयी हूँ। यह बात भी अर्थ-दुर्बोधता का कारण है।

पाँचवीं बात यह है कि उपर्यक्त विचार के छोगों ने मनमाने अर्थ कर डाले--सभी मन्त्रों में आध्यात्मिक आदि एक ही तरह का अथ ढूँढ डाछा वा एक ही मन्त्र के द्विविध, चतुविध वा सप्तविध अर्थ कर डाले; जैसे आजकल रामायण की चौपाइयों के विविध अर्थ किये जाते है! परन्तु किसी भी भ्रन्थकर्ता का एक सिद्धान्त रहता हैं, एक उद्देश्य होता हँ और वह उसी को किसी मन्त्र, इछोक, कारिका वा वात्तिक में व्यक्त करता है। कोई भी निर्माता वा केखक अपनी समूची कृति को इलेषालंकार का जामा' नहीं पहनाता फिर भी ऋषि सीधे-सादे-सच्चे, स्थिरबृद्धि और स्थितप्रज्ञ थे। उनके लिए यह संभव ही नहीं हैँ कि वे एक ही मन्त्र में द्विविध, त्रिविध, पंचविध वा सप्तविध उलझनों का जार फैलाकर संसार को संश- यात्मा बनावें। फलत: मन्त्रा्थों की मनमानी विविधता और एकदेशीयता माननेवालों के कारण भी मन्‍्त्रार्थ अज्ेय से हो रहे। ये बातें पहले भी' कही गयी हैं क्‍

लेखक के मत से किसी-किसी मन्त्र में एकाधिक विषय गये हूं, तो भी प्रत्येक मन्त्र का एक ही अर्थ है, एक ही उद्देश्य है। किसी मन्त्र का उद्देश्य आध्यात्मिक अर्थ बताना है, किसी का याशिक, किसी का आधिदेविक ओर किसी का आधिभौतिक। किसी भी मन्त्र का लक्ष्य इस सब अर्थों का बताना नहीं हैँ ओर ऋग्वेद के सभी मन्त्रों का ध्येय एक ही प्रकार का--आध्यात्मिक, आधिदेविक, आधि- भोतिक आदि केवल एक--अर्थ बताना है। यही मत सायण आदि भाष्यकारों का भी हँ---यद्यपि कहीं-कहीं, उपर्यूकत कारणों से, वे भी सन्देह में पड़ कर कई अर्थ कर बैठे हें।

पाठान्तरों का म्रम दूर करने के लिए पद-पाठ से लेकर घनपाठ तक का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। स्वरों का नियम-बद्ध ज्ञान पाने के लिए प्रातिशारुय का स्वाध्याय करना चाहिए। अर्थावगति के लिए

( ७१ )

ब्राह्मण-प्रन्थ, निरक्‍त और विविध वैदिक कोष आदि का अध्ययन करना चाहिए। फिस मन्त्र का किस प्रकार का अर्थ है, इसे जानने के लिए सायण आदि श्राचीन भाष्य देखने चाहिए। इतना सब करने पर भी मन्‍्त्रार्थ में यदि सन्देह ज्ञात हो तो इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि देखकर परम्परा-प्राप्त अर्थ ग्रहण करना चाहिए। परम्पराप्राप्त अर्थ सर्वाधिक प्रामाणिक है। प्रसंगतः यह बात भूमिका में लिखी भी जा रे हैँ

इन सब साधनों से वेद-मन्त्रों का तात्त्विक अर्थ समझ में जाता हू अवश्य ही डर ऐसे शब्द हें, जिनका अर्थ समझ में नहीं आता। ऐसे शब्दों का निषण्ट्‌-निरुक्‍त में अलग परिगणन किया गया है। परन्तु ऐसे शब्द असंख्य नहीं है, गिने-गिनाय॑ हें समग्र वैदिक वाइमय और _ संस्कृत-साहित्य का मन्‍्थन करके विद्वानों को इन परिगणित शब्दों का भी अर्थ खोज निकालना चाहिए। किसी भी मन्त्र को लेकर कई छायावादी कवियों की तरह उड़ान भरने से वा बेद को विचित्र ओर अनिरवेचनीय वस्तु समझ लेने से कोई छाभ नहीं है। बेद को 'हौवा' बनाना व्यर्थ हूं

इसमें संदेह नहीं कि वेद का एक-एक मन्त्र अत्यन्त सृक्ष्मतम सूत्र में कहा गया हूँ और एक-एक मन्त्र की अभिव्यण्जना-संपत्‌ और ध्वनिशक्ति महती हूँ एक-एक शब्द की विराट अभिधा है। एक-एक मन्त्र का जितना ही मनन किया जाता है, उत्तरोत्तर उतनी ही विशाल भावना मनःश्राणों को आनन्द-सागर में डुबोती जाती है यही' कारण हे कि वेद के एक-एक मन्त्र को छेकर एक-एक ग्रंथ की रचना की गई हैँ, एक-एक शब्द पर एक-एक इतिहास लिखा गया हूँ और एक-एक अक्षर पर एक-एक हजार इलोक रखे गये हैं।

इन दिनों देश भर में श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा की धूम मची हुई हैं; गीता हैँ भी ऐसी ही महत्त्व-पूर्ण पुस्तक। परन्तु शुक्ल यजुरवेंद की माध्यन्दिन-संहिता के ४०वें अध्याय के प्रथम दो मन्त्रों (“ईशा- वास्यमिद्म” और “कु्वन्नेवेह”) के आधार पर ही गीता के !्८ अध्याय और ७०० इलोक बने है। ऋग्वेद के मान्धाता, दधीचि, नहुष आदि एक एक शब्द को लेकर महाभारत, पुराण आदि में विस्तत इतिहास रचा गया है। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में २४ अक्षर हैं और एक-एक अक्षर को लेकर वाल्मीकि ने रामायण के एक-एक हजार एलोक बनाये इस तरह उन्होंने बाल्मीकीय रामायण के २४ हजार इलोक कहे-- चतुर्विशति-साहल्यं एलोहानामुक्तवानषिः।” इसी से कहा

( छर )

जाता हे--समस्त संस्कृत-साहित्य वेद की व्याख्या हे वेद-विरुद्ध एक शब्द तो कोई शास्त्रकर्ता सुनना चाहता है और एक भी आस्तिक हिन्दू धुनना चाहता है पी ओं में जो नास्तिक हे उनमें भी वेदत्व का इतना गहरा पंस्कार है कि वे भी बात-बात पर अपने प्राणों की आहुति' देते रहते हें और छोटे-मोटे कार्यों की प्तरमाप्ति पर “यज्ञ सम्पन्न” करते रहते हे उन्हें भी किसी उच्चतम भाव को व्यक्त करने के लिए आहुति' और “यज्ञ' शब्द से बढ़कर कोई शब्द नहीं मिलता। विश्व का उच्चतम कोटि का ऐतिहासिक यदि अपनी इतिहास-विद्या के संवर्धन में वेद का एक शब्द भी था जाता है, तो आनन्द के मारे नाचन छगता हूँ ।+ वेद के शब्दों में ऐसी ही ताजगी, तारुण्य, जीवट और प्रामाणिकता हूँ , इसी लिए अनन्त काल से वेद पर हिन्दू जाति की अविचल श्रद्धा हे लोकमान्य तिलक के शब्दों में वेद को स्वत: प्रमाण मानना हिन्दू होने करा अनिवाय॑ लक्षण है---प्रामाण्य- बुद्धिवेदेष्‌ ॥/ .._ वेद हिन्दू-धर्मे की मूल पुस्तक दँ--- वेदोडखिलो धर्मंमूलम्‌” (मन्‌- स्मृति २.६) | वेद हिन्दू-जाति के प्राचीन इतिहास, कला, विज्ञान, समाज-व्यवस्था, राष्ट्र-धर्मं, यज्ञ-रहस्थ, सत्य, त्याग आदि को दर्पण की तरह दिखाता है।

आर्य-जाति की संस्कृति, सदाचार, देशसेवा, वर्चस्व, वीरता, तेज, स्फूतति आदि समग्र सद्गुणावली जानन के लिए वेद प्रामाणिक और सुदृढ़ आधार हैँ इसी लिए मनुजी ने लिखा हं--ो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वेद पढ़कर किसी भी शास्त्र वा कार्य में परिश्रम करता है, वह जीते जी, अपने कुल के साथ, बहुत शीघ्र शुद्व हो जाता हे--

“योध्नधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्‌। जीवज्नेब शूद्र॒त्वमाश गच्छति सान्वय: ॥7 (२,१६८ )

जेमिनि ऋषि के मत से वेद की किसी एक संहिता का स्वाध्याय भी वेदाध्ययन माना जाता है। वेद का मम और रहस्य समझनेवाले मंनूजीने तो यह भी लिखा है कि वेद पढ़कर और यज्ञ करके जो मुक्ति पान की चेष्ट। करता है, वह नरक जाता है! (मन ६.३७ )। 'इस संसार में वेदाध्ययन ही तपस्या है' (मनु २.१६६) वेदाध्ययन करके ही गृहस्थाश्रम में जाना चाहिए! (३.२) मन्‌ ने ईदवर ने माननेवाले को नास्तिक नहीं कहा है, प्रत्यत वेद-निन्‍्दक को नास्तिक!

से

कहा है (२.११)। वस्तुतः वेद ऐसा ही अद्भुत ज्ञान हे

6 ७३ )

बैद संस्कृत-साहित्य का आकर है, हिन्दूर्म, हिन्दू-संस्क्ृति और हिन्दुत्व की थाती हैँ, आर्य-सभ्यता का उद्भव-स्थान है; इसी लिए हिन्दू वेद की महिमा-गरिमा बखानते हे, ऐसा नहीं ध्रमझना चाहिए। बेद के वेदत्व और वेद की सर्वागिपृर्णता पर संसार के वे सभी विद्वान्‌ मुग्ध हें, जिन्होंने विमल वेदिक ज्ञान की खोज में अपना समय और श्रम दिया है। क्यूजिन का मत है--'संसार की प्राचीन जातियों में ईदवर के लिए आये हुए सभी शब्द वैदिक देव' शब्द से निकले हें। दि बाइबरक इन इंडिया में जकोलियट लिखा हें--भर्म॑-मग्रन्थों में एकमात्र वेद ही ऐसा है, जिसके विचार वतंमान विज्ञान से मिलते हें; क्योंकि वेद में भी विज्ञानानुसार जगत्‌ की रचना का प्रतिपादन किया गया हैं ।| सिक्स और सेक्स-वारशिप (पृष्ठ ८) में वाल साहब ने स्वीकार किया है कि हिन्दुओं का धमे-प्रन्थ ऋग्ेद संसार का सबसे प्रान्रीनतम' ग्रन्थ है! रेगोजिन का कहना हें--कूग्वेद का समाज बड़ी सादगी, निष्कपटता और सुन्दरता का था ।' फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान वाल्टेयर का मत हूं- केवल इसी देन (ऋग्वेद) के लिए पृव॑ का पश्चिम ऋणी ४हेगा।' वैदिक साहित्य और विशेषतः ऋग्वेद पर अपने जीवन का अत्यधिक अमूल्य समय व्यय करनेवाले भंक्समुछर ने लिखा हें---

“यावत्स्थास्थन्ति गिरयः धरितवच महीतले। तावदुखवेद-महिमा लोके4. प्रचरिष्यति॥”

अर्थात्‌ जब तक पृथिवी पर नदियाँ और पव॑त रहेंगे, तब तक संसार के मनुष्यों में ऋग्वेद क्री महिमा का प्रचार रहेगा।

बहुत ठीक। परन्तु इस महानिधि की प्राण-पण से रक्षा किसने की ? ब्राह्मणों ने। हजारों हजार वर्षो से ब्राह्मण-जाति विराढू वैदिक वाह्म्मय और विद्याल संस्क्ृत-साहित्य को कण्ठस्थ कर सुरक्षित रखती रही हूं। क्या इन ब्राह्मणों से समय संसार और विशे- षत: हिन्दु-जाति कभी 'उऋण' हो सकती है ? इन ब्राह्मणों ने ऐस। नहीं किया द्ीता, तो क्या अपार आर्य-साहित्य हिन्दू-धर्म, हिन्दू-संस्क्ृति और आये-सम्यता का नाम भी दुनिया धुनती ? इस महत्काय॑ के लिए ब्राह्मणों ने त्याग और तपस्था का जीवन बिताया, भारतवर्ष का राज्य छोड़ दिया लक्ष्मी क्रो छात मार दी स्वेच्छया दरिद्र जीवन का वरण किया और ध्षरस्वती की अनन्य उपासन! की। यदि व्यास, वसिष्ठ, परशुराम, द्रोण चाणक्य और समर्थ रामदास की सोलह आने में एक आना भी कामना रहती, तो आज तक भारत- वर्ष पर केवल ब्राह्मणों का राज्य रहता। परन्तु--

( छ४ं )

“गह्मणस्य तु देहोड्यं क्षुद्रकामाय नेंष्यते। तु क्च्छाय तपसे श्रेत्यानन्तसुखाय चहा

अर्थात्‌ ब्राह्मण का यह शरीर विलासिता करने, धव बटोरले या राज्य करने जैसे छोटे कामों के लिए नहीं है। यह तो जीवन में घनघोर तप के रहिए और शरीरपात होने पर सच्चिदानन्द की प्राप्ति के लिए है।

प्रसिद्ध वेद-मक्त, धर्मे-प्राण और बरनली-राज्याधिपति कुमार कृष्णानन्द सिंह की सहायता से उनके विद्वान्‌ प्राइवेट सेक्रेटरी पंडित गौरीनाथ झा के द्वारा इन पंक्तियों के लेखक का किया हुआ ऋग्वेद का हिन्दी-अनु- वाद क्ृष्णगढ़, सुलतानगेज, भागलूपुर से, कई वष पहले, प्रकाशित हुआ था। उस संस्करण में मूल मन्त्र ऊपर छपे थे, अनन्तर संख्या-क्रम से प्रत्येक: मन्त्र का हिन्दी-अन॒वाद दिया गया था और सर्वान्त में महत्त्वपूर्ण स्थलों पर टिप्पनियाँ दी गई थीं। परन्तु भूमिका और विषय-सूची अतीव संक्षिप्त थीं, अब की बार भूमिका और विषय- सूची विस्तृत हैं। अत्यधिक परिश्रम करके विषय-सूची को सर्वागपूर्ण बताने की चेष्टा की गयी है ऋग्वेद-संहिता पर ऐसी ही सूचियाँ तैयार करके विद्वानों के द्वारा शोध और अनुसन्धान का श्रम-साध्य काये भी किया जा सकता है

जीवन भर लेखक का यह सुदृढ़ विचार रहा हैँ कि पक्षपात-शून्य होकर अपने विचार प्रकट किये जायें। तो भी हो सकता हूँ कि इस भूमिका और अनुवाद से किन्हीं वेद-विद्वानू का मत-भेद हो। यह भी' हो सकता है कि लेखक के दृष्टि-दोष, अज्ञता और अल्पज्ञता के कारण भी' इस ग्रन्थ में कोई त्रुटि रह गई हो। ऐसी त्रुटि और कमी के लिए लेखक क्षमा-याचक है

ऋगेद अपार, अगराध और अद्भुत ज्ञान-राशि हैँ यह ज्ञान- राशि विश्व-मानवों और भारतीयों के हृदय और मस्तिष्क को प्रोज्ज्वल और प्रदीप्त करे, वर्तमान जन-राज्य में इसकी महिमा और प्रसार बढ़े, इसकी आज्ञा और आदेश के अनुसार हम अपने जीवन- लक्ष्य को अधिगत करें, हमारा पथ निष्कंटक, मंगलमय और आपनन्द- वाहक हो--यही पावन प्रार्थना हम प्रसन्नात्मा प्रभु से प्रतिदिन करें।

ग्राम कूसी, रामगोविन् न्द्‌ डाकघर दिलदारनगर, रामगाविन्द त्रिबेदी जिला गाजीपुर धीरामनवमी, २०११ विक्रमाब्द

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११.

१२. १३.

१४, १५.

विषय झूच

&5५६ प्रथम अष्टक

अथम मथयडल शयम अध्याय

« स्वगें का उल्लेख « कल्याणकारी अग्नि * सोमरस अभिषुत होकर इन्द्र

और वायु के लिए तैयार

. ज्ञानरूपिणी सरस्वती का महत्त्व » गोदुग्ध-दोहन * ईनन्‍्द्रा का वीरत्व और बवृत्रा-

सुर का वध

* सोमरस-पान में इन्द्र की मुख्यता , ऋग्वेद और सामवेद का उल्लेख « इन्द्र के तेजस्वी और रकक्‍्तवर्ण

के हरि नामक दो अहृब

« इन्द्र द्वारा गुफा में छिपाई गायों

का उद्धार। थे गायें पणि नाम के दैत्यों ने चुराकर गुफा में छिपाई थीं।

ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का उल्लेख

बैल और गो-दल

पञ्चक्षिति (चार वर्ण और

निषाद)

सशस्त्र योद्धाओं की सुसज्जित सेना सुन्दर चासिकावाले इन्द्र

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( २)

सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र

बल देत्य (बेबीलोनाधिपति बेल ? ) का गो-हरण अरणि-मन्थन से उत्पन्न अग्नि सुखकर रथ

बारह नामों से बारह मन्त्रों में अग्नि की स्तुति सूर्य-धरकाशित स्वर्ग-छोक

रोहित नामक अइ्व

प्रस्तर से सोमरस बनाना

गोरे हरिण

सम्राट इन्द्र

मानवेश इन्द्र

उशिज के पुत्र कक्षीवान्‌

ऊधम मचानेवाले मनष्यों द्वारा डाह-भरी निन्‍्दा

वृष्टि-कर्ता मरुद्गण (वायु) मरुतों के द्वारा मेघ-माछा का संचालूव और साग्रर में जल ग्रिराना

द्वितीय अध्याय - ऋभुओं का जन्म (तपस्या करके

ऋणभु लोग देवता हो गये थे)

« ऋणभुओं के द्वारा मनोबल से हरि

अबवों की उत्पत्ति

- ऋभुओं के द्वारा माँ-वाप. को

तारुण्य देना सोमरस रखने का पात्र चमस

« उत्तम, मध्यम और अधम नामक

तीन रत्न तथा सप्तः हविय॑ज्ञ,

सप्त पाकयज्ञ और सप्त सोमयज्ञ

का संकेत

पृष्ठ १०

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२३. र४. २५.

२६- » समुद्री नौकाओं का मार्ग २८.

२९.

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« ऋभुओं की देबत्व-प्राप्ति

. राक्षस का मन्त्र में प्रथम उल्लेख . स्‍्वर्ग-लोक में कर्म-फल

3 के (कशा) का उल्लेख . सूर्योपासना

- देव-रमणियों का यज्ञ में आना « वामनावतार में बविष्णू का तीन

बार पाव-्क्षेप

- विष्ण का अद्भुत पराक्रम . तीन सोमरस

. आकाशस्थित इन्द्र

- सहस्राक्ष इन्द्र

- पृथिवी, आकाश वा मेघ के पुत्र

मरुत्‌ विद्युत्‌ से मरुतों की उत्पत्ति - किसान द्वारा बैलों से जौ (यब)

का खेत बार-बार जोतना

- छः ऋतुओं का उल्लेख « चन्द्रमा और जल में अमृत, औषध

और अग्नि

« मनस्मृति, रामायण, भागवत,

बिष्णुपुराण आदि में वर्णित शुनःशझोप ऋषि की कथा का उद्भव

वरुण के द्वारा सूर्य-पथ का विस्तार सप्तषि-मण्डल का उल्लंख असुर का अर्थ देवता और अनिष्ट हटानंवाला भी है

चिड़ियः और उनके घोंसले

बारह महीनों और मलमास (मल्म्लिच) का उल्लेख भविष्य का ज्ञाव

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पृष्द २६ श्र श्र र्र श्र र्ड्रे

२३ २३-२४

र्डं र्४ं र्४ र५ 4 र५ श्प २६-२८

रे २७

२७

र्‌ढं २८

२८ २८

शत हर

६९-२०

( ४)

पृष्ठ ३०. वरुण का स्वर्ण-धारण रद . ३१, गोशाल्ा का उल्ूुूंख रद ३२. पिता का पुत्र को, बन्धु का बन्ध्‌ को और मिन्न का मित्र को दान देना ३० ३३. अभिनव गायत्री छन्‍्द ३६ ३४, सोमरस के बनाने की विधि ३२-४३ ३५. काठ के ओखल और मूसलू ३३ ३६. असंख्य गौएँ और घोड़े ३७. कपोत और कपोती ३४ ३८. पुरातन निवास या स्वगें? ३४ ३९. लम्बी नासिकावाली गायें ३५ ४०. उपमालंकार ३५ ४१. सोने का रथ ३५ ४२. भन्‌ और पुरुरवा ३६ ४२३. पुरुरवा के पौत्ष नहुष की कथा। इला उपदेशिका और पुरोहित थीं। ३७ ४४. मन्‌ और ययाति राजा ३८ ४५. विश्वकर्मा द्वारा इन्द्र के वद्च का | निर्माण ३९ ४६. इच्द्र-बुत्र-युद्ध ३९-४० ४७. सप्त सिन्धु” का उल्लेख ४० ४८. इयेन (बाज) पक्षी ४९. उपमा्ंकार ४० | . तृतीय अध्याय १. इन्द्र द्वारा पीठ पर धनुष्‌ धारण करनेवाले सेनापतियों को... पुरस्कार-प्रदाव ४१ २. वुत्र-बध ४१-४३ ३. सुवर्ण और मणि ४२ ४. कुत्स ओर दशद्यु डरे

स्तर १३ १६

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३-१५ १२ श्ड

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१६- « मरुभूमि

१८.

१९.

२०.

( ४६ )

« रधिम-यूक्‍्त दिच और हिम-युक्‍्त रात्रि

« चन्द्रमा और उनकी पत्नी वेना

की विवाह-यात्रा के समय पहले पहल देवों ने अश्विद्वयय के रथ (विभाव ? ) को जाना

« रात्रि और दिन में तीन बार पुष्टि-

कण भोजव

. सप्त सिन्धू” . तवेंतीस देवों का उल्लेँंख। थिलोक-

चारी रथ (विभान ? )

सूर्य उदय से मध्याकह्न तक ऊदृध्बें- गामी और उसके बाद सायं तक अधोगामी द्वोते हें। सुर्य के श्वेत अश्व

यमपुरी जाने का मार्ग अन्तरिक्ष (जिलोक का उल्लेख)

सूर्य की आकर्षण-शक्ति--चन्द्रमा आदि ग्रह-वश्षत्रों द्वारा सुर्य का अवलम्बच

आठ दिशाएँ (चार दिद्याएँ धौर चार उनके कोने ) +॥ तीच लोक (ुलोक, अन्तरिक्ष और पृथिवी ) संसार और सप्त सिन्धु”

सू्यें का ग्रति-विवरण, रथ-संचा- छन आदि

तुर्वेश, यदू, उग्रादेव, वववास्त्व, बुहृ४थ ओर तुर्वीति

वुद्ध और जीर्ण राजा

गायत्री छन्‍्द पर्वत और वनस्पति विद्युत्‌ के द्वारा वर्षा का छाना

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पृष्ठ २१. चोर और कपटी ५५ २२. श्रेष्ठ देव रुद्र ५८ २३. भेंड, भेंडा आदि ५८ २४. ग्राम और उसके पारुक ५९ २५. तेंतीस देवता ६० २६. समुद्र और बृहत्‌ समुद्री नौका श्र चतुर्थ अध्याय १. ब्रिछोक में वत्तमान रथ (विमाव ?) श्र २. दानवीर राजा सुदास ६३ ३. अश्विनीकुमारों के सात घोड़े दे ४. उषा का महत्त्व-पूर्ण विवरण ६४-६६ ५. समुद्र में नाव चलाना दर्द ६. सौ रथों का उल्लेख श्५ ७. अरूुणवण्ण गाये ६५६ . <. द्विपद. चतुष्पद और पक्षी ६६ ९. सूर्य के सात धोड़े ६७ १०. सूर्य की सात धोड़ियाँ ६७ ११. हृदय-रोग और पीतवर्ण रोग ६७ १२. शक तथा सारिका पक्षी और हरि- तार (हरिद्वा ) वृक्ष ६८ १३. सूर्योपासन। के तीन मन्त्र ६७-६८ १४ शतद्वार' नाम का अस्त्र ६८ १५. शुष्ण शम्बर और अर्बृद नामक राक्षस तथा राजा दिवोदास ६९ १६. राज्ि शार्यात ७० १७. राजा कक्षीवान और उनकी पत्नी बुचया राजा वृषणशव और उनकी कन्या मेना छ० १८ नदियों का समद्र-गमन ७१ १९. बल नाम का असुर और त्रितका कृप-प्रपात ७.१ २० इन्द्र के ढ्वारा भूलोक की सृष्दि ७२

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(७०)

ऋषि नमी और मायावी नमृचि राजा अतिथिग्व और ऋजिश्वान्‌ तथा करण्ज, पर्णय और वंगृद नाम के असुर एवम्‌ सौ नगर

बीस नृपतियों के साथ राजा सुश्रवा और साठ हजार निनानदे अनुचर (सैनिक

राजा तूवयान (दिवोदास ?) और पुरुरवा-पुन्र आयु

नये, तुवंश, तुर्वाति और यदु राजा, रथ और एतश ऋषि तथा शम्बरासुर के निनानबे नगरों का ध्वस्त किया जाना

साँड़ की सींग की तरह इन्द्र का वा रगड़ना

ताराओं का उल्लेख

व्यापारियों का समुद्र के चारों ओर घुमना और छलनाओं का पर्वत पर चढ़कर फूल चुनन!

लोहे का कवच पहनना

ढंद्रों और कक गों का उल्लेख भुगवंशी छोगों के पास अग्नि का आनयन

घोड़े का रथ में जोता जाना देवपत्नियों का उल्लेख

तुर्वीति ऋषि की रक्षा

नोधा ऋषि की शक्ति-प्राप्ति गोतम-गोतजीय ऋषिगण

पंचम अध्याय

* अंगिरा लोगों ने पणि द्वारा अपहृत

गौ का उद्धार किया

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« सरमा कुक्क्री ने अपने बच्चे के

लिए इन्द्र से दूध पाया

« शस्योत्पादक मेघ

. काली और लोहित गायें

« कुत्स ऋषि और दस्यु

« पुरुकुत्स ऋषि, सात नगरों का

विध्वंस और सुदास

. रुद्र-पुत्र मरत्‌ तरुण और अजर हें « मरुद्गण बरसने के लिए मेघ को

प्रेरणा देते हें

« हस्ती या हाथी का उल्लेख १०. ११. श्रेः १३. १४. १५. १६- १७. » प्रजा-वत्सल राजा १९. २०. २१. र्र. र३. २४.

सिंह और हरिण

रथ के पहिये सोने के सौ वर्ष का जीवन

हंस की जल में स्थिति परिपक्व जौ (यव) सेना का उल्लेख

पिता का आज्ञाकारी पुत्र संसार-हितैषी पुरुष

वद्ध पिता से पुत्र की धन-प्राप्ति विज्ञाल सात नदियों का उल्लेख अमृत-तुल्य है वेधा (बह्या) के मंत्र देवता अमर हैं सात पाकयज्ञ, सात ह॒वियेज्ञ और सात सोमयज्ञ

पत्ति-सेविता और अभिनन्दनीया स्त्री

2६. पैतुक धन का स्वामी पुत्र

रहगण-वंशीय गोतम

१८८. गायत्री द्वारा तुष्टि

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८९ ९५०

९१ ९१

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१०२ १०३ १०७ १०७

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नब्बे नदियों के ऊपर विस्तत इन्द्र- वज्य हजार मनुष्यों द्वारा एक साथ इन्द्र-पजा | इन्द्र का लौहमय वज्ञ

प्रजापति मन्‌, अथर्वा और उनके पुत्र दष्यछू ऋषि

पच्ठ अध्याय

- मण्डलाकार सर्प - स्वराज्य' का उल्लेख « गौरवर्ण और नाना वर्णों (रंगों)

की गायें

. दधीचि की हडिडयों से इन्द्र ने

८१० बार असुरों को मारा था शर्यणावत्‌ सरोवर

सूर्य की ही किरण से चन्द्र प्रकाशित होते है

गौओं का गौरठ

भग, मित्र, अदिति, दक्ष, अरग्रेमा, वरुण, सोम, सरस्वती

माता पृथिवी पिता द्यलोक

» स्थावर और जंगम के अधिपति

इन्द्र और पृषा

- पृक्ष के पुत्र गरुड़ ? » सो वर्ष की आय - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र थौर

निषाद

. पृषा और « नत्तेंकी 3328: » व्याध की स्त्री

» स्वर्णमय रथ १८,

पर्वत और बाज पक्षी

पृष्ठ १०९ ११० १११

११५ ५35.

११५

११६ ११६

११६ ११९

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२०

वृषभ और पताका सिन्धु का उल्लेख

सप्तम अधष्याध

- का््ठ-घर्षण से अग्नि की उत्पत्ति * दिक, काल (ऋतु) का निर्माण « विद्युदरप अग्नि

. सिन्ध और नौका

रुद्-पुत्र मस्त

« चार वर्ण और निषाद

- रैयामवर्ण और लोहितवर्ण अदव

तथा राजषि ऋजाशव

- वृषागिर के पुत्र ऋजाइव, अम्बरीष, सहृदेव, भयमान, सुराधा - इन्द्र द्वारा, ऋजिश्वा राजा के साथ,

कृष्णासुर की गर्भवती स्त्री का विनाश किया जाना

इन्द्र के द्वारा व्यंस, पिश्रु और शुष्ण असुरों का विनाश '

सात नदियाँ (सप्त सिन्धु” नहीं) तिगुनी हुई रस्सी

_कुयव, शुष्ण, वृत्र आदि का वध

शिफा नदी अंजसी, कुलिशी और वीर-पत्नी नदियाँ

सुन्दर चन्द्रिका के साथ चन्द्रमा का

आकाश में दौड़ना

सपत्नियों (सौतों) और चूहे का

उल्लेख

सूर्य की सात किरणें, आपृत्य त्रित ओर कूप

बूक या अरण्य-कुक्कुर (तेंदुआ वा भेंड़िया)

नित का कुएँ में गिरना

पृष्ठ १३१२ १२२

१३३ १३३ १३५ १२७ १३८ १३९

११९

२४०

१४०

६४९१ १४२ १४३ १४५ १४५

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२१. २२. २३. २४.

श्

२६. २७. - ऋषभुओं ने अश्विद्दय के लिए रथ बनाया २९. ३०, ३१.

३२.

३३. ३४.

शेप. ३६.

३७. ३८.

३९. ' ४०.

४१.

४२.

( २१ ))

कुत्स ऋषि का कृप-पतन

तुर्वेश, हर . अनु और पुरु

जामाता और द्यालक (साला)

ऋणभुगण के पिता सुधन्वा

तीक्ष्ण अस्त्र मानदण्ड से खेत मापता ऋषभुओं ने माँ-बाप को युवा बनाया ऋतभुओं द्वारा नई गाय का निर्माण

विभू और बाज का सोम-पान अश्विनीकुमारों का शंख बजान!

अशिवनों ने कृप-पतित रेभ, बन्दन और कण्व की रक्षा की

कूप-पतित राजर्षि अन्तक की रक्षा, तुग्र- पुत्र भुज्यु को नौका-द्वार। समुद्र से बचाना तथा ककेन्धु और बय्य मनुष्यों की रक्षा शुचन्ति, दह्ममान अचन्ि, पृश्िनिग और पुरुकुत्स की रक्षा

अश्विद्वय ने 5 ऋषि को पैर दिये, अन्धे ऋजाश्व को दृष्टि दी और श्रोण को जानू दिया

वसिष्ठ, कुत्स, श्रुतर्य और नर्य॑ की रक्षा खेल ऋषि की पत्नी युद्धाथिनी विश्पला को जंघा दी गयी और अश्व ऋषि के पुत्र वश की रक्षा की गयी

दीघेतमा, दीर्घेश्रवा, उशिज्‌ और कक्षीवान्‌ अद्वरहित रथ (विमान ? ) का संचालन और कण्वपुत्र त्रिशोक

राजर्षि मान्धाता और भरद्वाज की रक्षा जल-मध्यस्थ दिवोदास और पुरुकुत्स-पुत्र सदस्यु की रक्षा

विखनः:-पुत्र वम््र, कलि ऋषि और पृथि राजपि की रक्षा

शयू, मनु ओर स्युमरश्ति

पृष्ठ १५० १५२ १५३ १५४ १५४ २५५ श्५५्‌ श्५ए्‌ १५६ १५६

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( १२ )

. राजधि पढठर्वा और राजा शर्यात

. श्र मन्‌ को बचाना

» विमद ऋषि और पिजवन-पुत्र राजा सुदास

- भुज्यु, अश्विगु और ऋतस्तुम ऋषि

- ऊकैशानू, पुरुकृत्स, मधु और मध्‌मक्षिकाएँ - कुत्स तुर्बीति, दधीति तथा ध्वसन्ति और

पुरुषन्ति ऋषि अष्टम अध्याय

- कपर्दी और संहारकारी रुद्र

- दुढांग वराह

- स्थावरु और जंगम की आत्मा सूर्य

. स्वयंवर का उल्लेख

« रथ-वाहक गर्दभ

- राजषि तुग्न ने अपने पुत्र भुज्यु को, सेना के

साथ, शत्रु-जय के लिए नौका द्वारा समुद्र- स्थित द्वीप में भेजा

सौ चक्‍कों और &छ: घोड़ोंवाला रथ

तौ डॉड़ोंबाली नौका पर भुज्यु को बैठाना राजर्षि पेढुको श्वेतवर्ण अश्व की प्राप्ति सुरा और शत कुम्भ

शतद्वार-पीड़ा-यंत्र-गृह ('काली कोठरी” ? ) अशिवनों ने बूढ़े च्यवन ऋषि को युवा बनाकर विवाह कराया

दर्धीचि, अश्व-शिर और मधु-विद्या वध्यिमती को पुत्र-प्रदान

खेल ऋषि की पत्नी को जंघा दी गयी “दक्ष भिषक्‌ अश्विद्वय ने ऋणादव की आँखें बनायीं

धुड़दौड़ में अश्विनीकुमारों का बाजी (४2७६ काष्ठखंड के पास पहुँचन पर

वृषभ और ग्राह को रथ में जोतवा

पृष्ठ १५९ १५९ १५९ १५९ १५९

१६०

१६३ १६४ १६५ १६६ १६६

१६६ १६७ १६७ १६७ १६७ १६७

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१५८. २९. ३०. ३१. १२. ३३. ३४, ३५.

३६- ३७.

( ११ )

महषि जहन

राजा जाहुष को घेरे से बचाना

वश ऋषि और पृथुश्रवा राजा ऋचत्क-पुत्र शर तथा श्रान्त शय ऋषि विश्वकाय ऋषि और विष्णाप्थ

रेभ ऋषि का दस रात नौ दिन जल में पड़े रहना

मधु और शत कुम्भ

अविवाहिता घोषा का कोढ़ दूर करना इ्याव ऋषि का कोढ़ दूर करना, नृषद- पुत्र को कान देना और कण्व ऋषि को आँखें देना

कुम्भ-पुत्र अगस्त्य, भरद्वाज और विश्पला बुक, वत्तिका पक्षी, जाहुष और विष्वाह्ः

असुर

पा बुकी के लिए ऋजाइव का सौ भेंड ना

शयु ऋषि और राजा पुरुमित्र

हल द्वारा खेत जोतना और जौ बोना

दधीचि ऋषि और अश्व का शिर

तीन भागों में विभकत श्याव ऋषि को

जिलाना

मन के समान वेगवान्‌ और वायु की तरह

गतिशील रथ (वायुयान ? ) | श्येन तथा

गुध्च का उल्लेख

“सहस्रकेतु” या हजार पताकाएँ

अदिविद्वय का अश्व-रहित रथ (वायुयान ? ) द्विपद, चतुष्पद और मनुष्य ३९.

नब्बे नदियों का पार करना

पृष्ठ १६९ १६९ १६९ १६९ १७०

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द्वितीय अष्टक

प्रथम अध्याय

. तुणीर का उल्लेख , श्वेत-त्वचा-रोग से ग्रस्ता और ब्रह्मवादिनी

घोषा

. यक्ष्मा रोग का उल्लेख , दस इन्द्रियाँ, इष्टाश्व और इष्ट-रश्मि नाम

के राजा (जेन्द-धर्मी ? )

. मशर्शार राजा के चार पुत्र और अयवस

राजा के तीन पुत्र

. सूर्य से उषा तीस. पोजच आगे चलती हे

अर्थात्‌ सूर्योदय से आघा घंटा पहले उषा का उदय होता है , सायणाचाये के मत से सूर्य प्रतदिग ५०५९ योजन चख्ते हैं। कुछ थ्रोपीयों के मत से सूर्य प्रतिदिन २०००० मील चलते हे

. गृह में गृहिणी पहले जागकर सबको जगाती

है। अभिसारिका का उल्लेख

, स्वनय राज! का रत्न लाना दीर्घतमा

और रत्न-राजि

» दक्षिणा देनवाले दीर्घायू पाते और अजर-

अमर होते हें ब्रतशाली जरा-ग्रस्त नहीं होते सिन्ध-वासी भाव्य के पुत्र स्वनय ने हजार सोम-यज्ञ किये ऋषि कक्षीवान्‌ ने १०० निष्क (स्वर्णे- मुद्रा, आभरण या स्वर्ण का माप), १०० थोड़े और १०० बैल पाये... भूरे रंग के अश्ववाले दस रथ और उन पर अवस्थित वधुएँ १०६० गायें हजार गायें, दस रथ, चालीस लोहित-वर्ण अरव स्वर्णाभरण-युक्‍त घोड़े

पृष्ठ १८३

१८४ १८४

१८५

१८५

१८६ १८८ १८९

१९० १९०

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२२. २३. २४.

२५. २६. २७. २८. २९. ३०.

३१.

३२. श३. रे४. ३५.

३६. ३७. ३८. ३९.

( १९ )

ग्यारह रथों की प्राप्ति

नकुली का उल्लेख गान्धारी भेंड़

. भ्राह्मण का उल्लेख काटनवाला परशु (फरसा) घनदुर्धर पुरुष

निर्भव राज-पथ

अरणि द्वारा अग्नि-मन्थन करनेवाले भृगु-

गोन्रीय चोर की निन्‍्दा

परमेश्वर ने इन्द्र को उत्पन्न किया दिवोदास राजा के लिए इन्द्र द्वारा

९० नगरों का नष्ट

किया जाना

यजमान आयें ; क्ृष्णासुर का वध

कथि उशन। की रक्षा सस्त्रीक यज्ञ करना

परिखा (खाई) से वेष्टित नगरी इन्द्र के वज्प्र की महत्ता

शत्रु-सेना और ऐरावत (इन्द्र का हाथी)

इन्द्र द्वारा १५० सेनाओं का विनाश

पिशाच का उल्लेख इन्द्र के २१ अनुचर

इन्द्र के लिए गायों का दूध और घी देना जिस घर में घी रहता है, वहां देवागमच

होता हूँ जौ (यव) का हव्य

सित्र और वरुण के, लिए धी

नीचे मूँह करके मित्र और वरुण का सोमपान

अरयेगा और भग देवता

दुग्ध-मिश्रित सोम

« दधि-मिश्वित सोम

द्वितीय अध्याय

पृष्ठ १९१ कक १९१ १९१ १९२ १९३

१९३

१९७ १९८

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१६ )

पृष्ठ ३. प्रस्तर-खंड द्वारा सोम का बनाया जाना २१० ४. ऊंट का उल्लेख | पृषा का वाहन बकरा २११ ५. सोने का रथ २१२ ६. जन्मान्तर की बातें जाननेवाले दधीचि, अति, मनु, कण्व कौर अंगिरा २१३

७. तैंतीस देवता--द्युलोक में ११, अन्तरिक्ष में ११ और पृथिवी पर ११ २१४ ८. दस दिशाएँ २१६ ९. वाचाल और दँसानेवाला विदृषक २१७

१०. उत्साहीं, अनप्रिय और विद्याध्ययच में प्रवीण पुत्र के लिए प्रार्थवा २१८

११. सारथि के छयाम की तरह अग्नि घृत-धारा प्रहण करते है २२२

१२. धन्‌र्धारी का तीर चछाना २२६

१३. स्वामी और सेवक २२७

१४. हन्द्रियों में मन अग्रगामी हैँ २२९

१५, देव-निन्दक का विनाश्ष २२९

१६. रातह॒व्य राजा की दुग्धवती यायें २११

१७. विष्णु के वामनाबतार की बात २३१

१८. विष्णु की अपार महिसा। ९४ कालावयब---

संवत्सर, दो अयन, पाँच ऋतु (हेमन्त

और शिशिर एक में बा बारह मास,

चौबीस पक्ष, तीस अहोरात्र, आठ पहुर

और बारह राशियाँ २३३--२३४

१९. अश्विनीकुमारों का तीन पहियों कर तीन बन्धनों का रथ २३४ तुंतीय अध्याय

१. उचथ-पुत्र दीर्घंतमा २३५ २. त्रैतन द्वारा ममता के पुत्र दीर्घतमा का शिर

ना

काटना, दास' द्वारा हृदय पर आघात २१६

- तन्‍्तु (ऊन) का उल्लेख २३६

सन्त

२-४ इे-४

तथा ३-०५ रे

९७ )

| 'पृष्ठ ४. स्वर्णाभरण-विभूषित अहव (अहवमेध- ; यज्ञ ) | अश्व नहीं मरता-इक्कीसबाँ मंत्र २४००-४३ ५. वाहन-रूप रासभ (गर्देभ ? ) २४३ ६. इ्येन और हरिण २४३ ७. गन्धवें का उल्लेख २४३ ८. सोने का सिर और छोहे का पैर ४४ ९, हंसों को पंक्ति २४४ १०. छाग (बकरे) का अश्व के आगे गमन २४५ ११. प्रसिद्ध अस्य वामीय” सूक्‍त (कण्ठाग्र करन योग्य सब मंत्र) . . २४५-२५३ १२५ एक ही अश्व सात नामों से सुयें का रथ ढोता हैं रड५्‌ १३. आत्मा और परमात्मा २४६ १४ १२ राशियाँ, ३६० दिन और ३६० राजियां. २४७ १५. बारह मास और छ: ऋतुएँ (हेमनत कौर शिशिर को एक करके पंच ऋतु” भी कहते थे ) ५४ २४७ १६. मन के उत्पत्ति की जिज्ञासा २४८ १७. अभोक्‍ता परमात्मा और भोकक्‍ता जीवात्म! (मन्त्र में रूपकातिशयोक्ति अलंकार हे). रष्ट १८, ग्रायत्री छंद, साम, त्रिष्टप, अनुवाक, सप्त छंद आदि २४ १९. जगती छंद, रथन्तर साम भर सर्वश्रेष्ठ गायत्री छंद रड २४९ २०. अमर जीवास्मा २५० २१. चार प्रकार की वाणी २५२ २२. प्रभु एक हे, तो भी उन्हें अनेक कहा गया है यरुड़ और यम्र का उल्लेख है २५२ चतुर्थ अध्याय १. औरस पुत्र 2 २५६ २. हम्ये (अट्ठालिका) २५६ ३. वज्-सदुष्च क्रायुध के साथ क्षुर (चाक्‌ ) २५७

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( १८ )

. कवि मान्दयें . परिचारिका. हस्तत्राण (दस्ताना ? ) और

कत्तंन ऋष्टि (व्थायुध-विशेष )

. सामवेद का आकाशब्यापी गान ; . सात पुरियों का विनाश और पुरुकृत्स के

लिय वृत्र-वध

. सिंह की उपमा . दास क्री शय्या। दुर्योणि राजा के लिये . क्रुयवाचका वध सीरा नाम की नदी ; तुर्वेसु और यदु . इन्द्र ईवर हूं

कोपाम॒द्रा और अगस्त्य का विचित्र संवाद

. मनष्य बहुत कामनावाला होता है

. नराकार अश्विनीकृमार

. आकाश-विहारी रथ (विमान ?

- अध्विद्गय ने सूर्य और चन्द्र के रूप से जन्म

ग्रहण किया था

- परीतवण्णे रथ : कुत्त का जघन्य दब्द

कक

पंखोंवाली तौका

- गौतम, पुरुमीढ़ और अन्नि

पंचम अध्याय

« केंवि मान्य

-. भारती सरस्वती और इला (इड़ा)

- कल्याण-वाही बृहस्पति

* शर, कुणर, दर्भ, सैये, मुख्ज, वीरण नाम

की धासों मे विषधर प्राणी

» शौण्डिक के घर चर्ममय सुरा-पात्र ,. « शकुन्तिका पक्षी

« विष-नाशक २१ प्रकार के पक्षी « विषनाशक निनानबें नदियाँ

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पृष्ठ २५९ २६०

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( ६९ )

स्त्रियों का घड़ों में जल भरना २१ मयूरी और नदियाँ विष दूर करनेवालढी नकुल और छोढ़ा (लोष्ट्र)

वृश्चिक (बिच्छू) का उल्लेख

दिवीय मण्डल

हजार, सौ और दस

स्त्रियों का कपड़ा बुनना गृत्समद-वंशीय ऋषि उकथ (ऋणछ -मंत्र)

षष्ठ अध्याय

« दास प्रजा . देनु-पुत्र वुत्र और ऊर्णनाभि कीट .., - आये को इन्द्र ने ज्योति दी, आये के द्वारा

शत्रु-नाश

इन्द्र ने पृथिवी को दृढ़ किया, पर्वतों को नियमित किया, अन्तरिक्ष को बनाया तथा द्ुल्कोक को निस्‍्तब्ध किया

. इन्द्र ने ४० वर्षो में शम्बरासुर को खोजकर

मारा। अद्दि का विनाश

- सात नदियाँ रौहिण दैत्य ४5 . गृहस्थों द्वारा अतिथि को दान

- थ्षेत्ों में फल और फूछवाली शभ्रोषधि

. देस सौ घोड़े

१०. ११.

बलिण्ठ जातुष्ठिर तुर्वीति वथ्य और परावृज

भीक और बल असुर को नष्ट करना ननानबे बाहुवाल उरण और अर्बुद का विनाश शष्ण, पिप्नु, नमुचि और रुधिक्ता का विनाश

- वर्ची के सौ हजार पुत्रों का विनाश, ,

क्काण्डा क+«ू

२८९ २८९ २८९

२९० २९५ २९७ ३००

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३०७ ३०७ ३०८ ३०८ ३०५ ३०९ ३०९ ३१०

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१६. . हर्षकारक वा मदकारक सोम «»« १८,

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२०. २१.

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२४. २५.

२६. २७.

२८. २९.

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३४ श्५्‌

(६ २० )

कुत्स, आयु और अतिथिग्व हर

दभीति ऋषि को दान + द्यति, इरावती और परुष्णी नदियाँ सिन्ध वदी

परावृज को पैर और आँखें देना

चुमुरि और धुनि का विवाश। वेत्रधारी द्वारपाल

आमरण पितृ-गृह में रहनेवाली पुत्री पितु- कुछ से अंश पाती थी

चार तरह के प्रस्तर, तीन प्रकार के स्वर,

सात प्रकार के छंद और दस प्रकार के पात्र

दो, चार, छ&:, आठ और दस हरि वामक घोड़े

बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ और सत्तर हरि

अस्सी, वब्बे और सौ घोड़े (हरि) कुत्स के लिये शुष्ण, अशुष और कुयव को वश में करना तथा राजा विवोदास के लिये शम्बरासुर के निनानबे नगरों का भग्न किया जाना हे देव-शून्य पीयु। सप्तपदी सख्यता

अइन के प्राचीन नगरों का चष्ट किया जाना

कृष्ण-जन्मा (द्रविड़?) दास-सेचा का विनाश

लौहमयी पुरी

देव-निन्दकों के विनाश के लिये प्रार्थना ऋण का परिशोध

देवशन्य मन की निनन्‍्दा आये छोगों का धन ब्रह्मचय-तेज

२३१६

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२३१७ २३१७

११८ २३१८

३१९

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२०. २१. २२.

२३. २४,

( २१ )

सप्तस अध्याय

- नवीन स्तुति बज - धनुष्‌, वाण और ज्या रे

« राजमाता अदिति, अर्यमा, मित्र और

वरुण

. पूर्व पुरुष सौ वर्षों की आयु का उपभोग

करते थे

- बछड़े का बन्धन रस्सी . ऋण-कर्त्ता की दयनीय दशा

किसी से दीचता प्रकट करना दुर्भाग्य

. गष्त-प्रसविनी स्त्री का उल्लेख

, पक्षि-वधिक व्याध

. शण्डिकों के प्रधान शण्डामर्क का वध

- सूर्या के स्वामी अध्विनीकुमार

. नवीन स्तोत्र

- राका (पुणिमा की रात्रि) | सूची (सुई)

और बनना

. सिनीवाली (अमावास्या वा देवपत्नी )

कुहू, इन्द्राणी और वरुणानी -आयुध शड

- सोने का शिरस्त्राण (पगड़ी) - वीणा और अरुण-बर्ण अलंकार

« वीणा-विशेष वाद्य। प्राण, अपान,

समाच, व्यान और उदान नाम के पंच वायु समुद्रस्थ अग्नि (वड़वानल)

इला, सरस्वती और भारती देवियाँ

समुद्र से उत्पन्न उच्चेःअ्रवा नाम का अद्व (इन्द्र का घोड़ा)

गव्य और मेषलोममय दशापर्व_..

ब्राह्मण ऋत्विक्‌ ५३

पुष्ठ ३२२५ ३२२६

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३३० शे३२ ३३३ ३३३ हेड रे शैरे४ श्३५ ३३६ २३६

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विलीन धघ्चर नदी), आपया (कुरू-

अष्टम अध्याय पृष्ठ १. उस्त्र बुननेवाली रमणी ३४८ २. धृद्ध-यात्रा करनेवाला राजा ३४८ ३. चक्रवाक-दम्पती का उल्लेख ६४ ३४९ ४. क्रुक्कुर। धर्म (कवच) ३४९ ५. उपमालंकार की भरमार »» २४९-३५० ६. छः ऋतुएँ और मलरमास ३५० ७. हजार रथ मर ३५१ , ८. हजार स्तम्भ हे ३५२ . ९. कपिव्जल कि ३५३ १०. शकुनि पक्षी। कर्करि (एक तरह का बाजा ) ३५४ तृतीय मयडल ११. विश्वामित्र-वंशधर मर ३५७ १२. कुठार (कुलिश ) से रथ का संस्कार . . ३५८ १३. भृगुवंशीय ऋषि ३५८ १४. तलवार को तीखी करन। ३०९ १५. सिंह-गर्जन ३५९ १६- भारती लोग (सुर्य-सम्बन्धी) ३६२ तृतोय अष्टक प्रथम अध्याय १. पुरुष की एक स्त्री ३६७ २. यूप-काष्ठ का वर्णन ३६९-७० ३. गृहा-स्थित सिंह डर ३७१ ४. तीन हजार तीत सौ उन्तताछीस देवता ३७१ ५. दासों के नब्बे नगर ३७४ ६. खोदाई करनेवाले हथियार ३८३ ७. भरत के पुत्र देवश्रवा और देववात . . ३८२ <. दृषद्वती (राजपूताने की सिकता में

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( २३ )

क्षेत््थ नदी) और सरस्वती (कुरु- क्षेत्रीय नदी )

. परमात्मा के अर्थ में अग्नि , देक्ष की पुत्री इला (वा यज्ञभूमि ? ) . «

द्वितीय अध्याय

. सुन्दर शिरस्त्राण » वड़वानल अं स्थ अग्नि) . कुंशिकनन्दन (विश्वामित्र-वंशीय )

पुत्र के अभाव में दौह्विच्र का ग्रहण उचित

, सरमा नाम की कुक्‍्कुरी है.

सूर्य के कारण अहोराश् का प्रवत्तेन .. दिन मास और वर्ष

02% मध्यतन और अधनातन स्तोत्र

[ (व्यास नदी) ओऔर शुतुद्री (सतलरूज नदी)

. भरतवंशीयों का व्यास और सतरूज

पार करना

. ब्राह्मणों के द्वारा नदियों की स्तुति - आये-वर्ण (ब्राह्मणादि जातियाँ)

. कैश-यकक्‍त गन्धवें ३3% . यमज अदिविनीकुमार कड़े तृतीय अध्याय गव्य-मिश्रित और जौ मिला सोमरस . . इन्द्र के घोड़े आकाश-मार्ग से चलते थे , हरिद्र्ण आयूध मयूरों के पिच्छ +३ . अंकुश (लग्गी) बड़े

, त्वष्टा नामक असुर

याज्ञिक भोज (अंगिरा, मेधातिथि आदि) सुदास राजा के याजक ««»

पृष्ठ

३८३ ३२८६ ३८८

३९२ ३९४ २९४ २९५ ३९६ ३९८ ४०० ४0००

४०९१

४०३ ४०३ ४०४ ४९१० ४११

४१५ ४१६ ४१७ ४१८ ४श्८ ४२

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१०. ११. १२.

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१७०. ११.

( २४ )

» पिजवन-पुत्र सुदास का यज्ञ विश्वा-

मित्र ने कराया

* अनाय-देश कीकट (जहाँ दुर्देशा-

ग्रस्त गायें रहती थीं) जमदग्नि-वंशीय दीर्घायु होते थे खदिर और शीशम (शिशपा) शाल्मली-पुष्प स्थाली में पाक करना। विश्वामित्र का अपमान भरतवंशीयों की शिष्टों के साथ संगति नहीं है वामनावतार की बात गत बल के अर्थ में असुर शब्द का प्रयोग। देवों की शक्ति एक ईइवर हें कक दो-दो मास की एक-एक ऋतु--सब छ; परन्तु हेमन्‍त और शिशिर को मिला देने पर पाँच ही ऋतुएँ होती हे

चतुर्थ अध्याय

- जह्वावी नदी - सुधन्वा के पुत्रों के साथ इन्द्र का सोमपान - बृहस्पति-वाहुन विद्वरूप हु

नयी प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र

स्तुति चतुर्थ मगडल

» वरुणकृत जलोदर रोग

उष्ण दुग्ध स्पृहणीय होता हैं सुवर्णनिमित सज्जा (काठी) के साथ अश्व *क सात पुरुष (वामदेव और छ: अंगिरा]: धौंकनी (भाथी) ४७

जमदग्नि ऋषि के द्वारा मित्रावरुण की

४२८ ४२८ ४२९ ४२९ ४४३०

४३० ४३२

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» एतश , कुषवा नाम की राक्षसी ३६ , जीवनोपाय के अभाव में वामदेव द्वारा

२५ )

अयेमा और भग 5 अमात्य-वेष्टित गज-स्कन्ध पर आखूढ राजा मत चल्षूविहीन दीघेतमा

4

पचस अध्याय

. छादन (छप्पर) वाला स्तम्भ .- . विपथगामिनी और पति-विद्वेषिणी स्त्री

यज्ञहीन, सत्य-रहित तथा असत्यवादी नरक पाते हैं

« अप्सवान्‌ (भृगृवंशीय) ने अग्नि को

प्रदीप्त किया का

. युलोक में स्तम्भ-स्वरूप सूर्य स्वर्ग का

पालन करते हूं

. सहदेव के पुत्र सोमक राजा ने अश्व

दिया। दीर्घायू की कामना के

- पिप्रुऔर मृगय असुर। विदीथ का पूत्र

ऋणजिश्वा | इन्द्र द्वारा पचास हजार काले हि | का मारा जाना हे ऋषि को युद्ध से निवारित करना

कुत्ते का मांस पकाकर खाना... षष्ठ अध्याय

. पूर्णमासी के दिन वृत्रासुर (ब्राह्मण)

का वध *

अग्नू-पुत्र को दीमक से बाहर निकालना

सत्री-अभिमानी स्त्री की प्रशंसा करता है

. गौर मुग और गवय मृग कप . परुष्णी (राबी) और इन्द्र रद » वलगा (लगाम) ४३

» भूना ,_आ जौ (यव)

पृष्ठ अपर

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१०.

११.

१२. १३. १४.

१५. ५१७. २८. १९.

२०. २१.

२२. २३,

२४, २५.

२६. २७.

( २६ )

दीघेतमा के पुत्र कक्षीवान्‌ और अर्जुनी-

पुत्र कुत्स तथा ब्रसिद्ध उशना कवि .

« आये को पृथ्वी का दान और शस्य के

लिये वष्टि-दान हर

दम्बरासुर के ९९ नगर्रों का ध्वंस और राजधि दिवोदास के निवास के लिये सौ नगर देना इयेन (बाज) पक्षी के द्वारा घुलोक से सोम लाना ४.६ अयुत (दस सहस्र ? ) यज्ञ | परमात्मा से सारे देवों की उत्पत्ति «.« धनूष्‌ पर प्रत्यञ्चा चढ़ाना और शर- क्षेपण » अनेक सहस्न सेनाओं का विनाश ««

- कमें-हीन मानव गहित हे २४ सहस्रसंख्यक अश्व *० शकट और चक्र ५२

विपाशा (व्यास) के तट पर शकट का गिरना

कुलितर का पुत्र शम्बर पर्वत पर मारा गया

बाॉचि नामक दास के हजार सैनिकों का

वध +

अग्रू का पुत्र परावृत्त स्तोता के राजा तुवंश और यद्ु को ययाति का शाप | शचीपति इन्द्र

सरय नदी के पार रहनेवाले अर्ण और चित्ररथ राजा का वध

दिवोदास राजा को शम्बर के पाषण- निर्मित प्तौ नगर मिले त्रिशत-सहस्र-संख्यक राक्षसों का विनाश सोने के दस कलश स्

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